Friday, 17 November 2017

रियली वी मिस यू इटली इन रशिया

                          

रियली वी मिस यू इटली इन रशिया

  'द आर्किटेक्ट' के नाम से प्रसिद्द इटली के आंद्रे पिरलो दुनिया के महानतम मिडफ़ील्डरों में से एक हैं।वे इटली की उस टीम के सदस्य थे जिसने 2006  में चौथी और आख़िरी बार फुटबॉल विश्व कप जीता था।वे 2001  से 2011 तक वे एसी मिलान के लिए खेले और सान सीरो उनका अपना पसंदीदा होम स्टेडियम था। 6 नवम्बर को जिस समय वे अपने 18 साल के गौरवशाली प्रोफेशनल कॅरियर की समाप्ति की घोषणा कर रहे थे उस समय उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि ठीक आठ दिन बाद 14 नवम्बर को उनका अपना सान सीरो स्टेडियम फुटबॉल महाशक्ति के रूप में अर्जित इटली के गौरव की कब्रगाह बन रहा होगा और उसकी प्रतिष्ठा धूल धूसरित हो रही होगी।केवल इटलीवासियों का ही नहीं बल्कि इटली की फुटबॉल के लाखों प्रसंशकों के भी दिल टूट रहे होंगे और वे हतप्रभ से हताश-निराश हो रहे होंगे।2018 के विश्व कप फाइनल्स में बहुत कुछ होगा पर इटली नहीं होगा। वो इटली जो फुटबॉल को जीता है और फुटबॉल में जीता है। जो अपने बेजोड़ अभेद्य रक्षण के लिए जाना जाता है। रक्षण जो 'कैटेनेसिओ' यानी 'द चेन ' के नाम से जग प्रसिद्द है। रक्षण जिसने जीनो डॉफ और बुफों जैसे गोलकीपर दिए और फ्रैंको बरेसी,पाओलो माल्दीनी,फैबिओ कैनावरो और चेलिनी जैसे डिफेंडर भी। 

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 उस दिन सान सीरो स्टेडियम में इटली की टीम 2018 के विश्व कप में खेलने की अहर्ता पाने के लिए अपना अंतिम मैच स्वीडन से खेल रही थी। स्वीडेन की टीम ने पहले चरण में स्टॉकहोम में इटली पर  1-0 की बढ़त बना ली थी और अब इटली को क्वालीफाई करने के लिए ये मैच हर हाल में जीतना था।पर मैच 0-0  से अनिर्णीत रहा। जैसे ही मैच समाप्त हुआ,75 हज़ार दर्शकों से खचाखच भरा सान सीरो स्टेडियम में गहरा सन्नाटा पसर गया,दर्शकों के चहरे शोक से मलिन हो गए,इनमें बहुत से चहरे ऐसे भी थे जिनकी आँखें अपने हीरो और इटली टीम के कप्तान 39 वर्षीय जियानलुइगी बुफों की आँखों की तरह ही बरस रही थी।बुफों इटली के ही नहीं विश्व के श्रेष्ठ गोलकीपर हैं।उनकी आँखों  से दुःख और ग्लानि बह रहे थे और ठीक वैसे ही उनके समर्थकों की आँखों से भी। इटली की टीम 1958 के बाद 60 सालों में पहली बार विश्व कप फाइनल्स की दौड़ से बाहर हो चुकी थी।

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आखिर ऐसा क्या हुआ कि रोबर्टो बैजियो,डिनो रॉस,डेल पिएरो,फैबिओ कनवारो,माल्दीनी,फ्रांसिस्को टोटी, पाओलो रोसी,डीनो जॉफ,क्रिस्चियन विएरी जैसे खिलाडी देने वाले देश की टीम को।वो शायद उनका दिन नहीं था। उस अनिर्णीत मैच में 24 के मुकाबले 76 प्रतिशत समय में गेंद पर कब्जा इटली का रहा,उन्होंने  कुल मिलाकर 27 शॉट गोल दागे और 40 क्रॉस शॉट लिए पर गोल नहीं कर पाए।   उनके पास कोई शानदार फिनिशर नहीं था और जो था उस पर कोच वेंचुरा का विश्वास नहीं था। लोरेंजो इन्सिग्ने नेपोली की टीम से खेलने वाले इटली के सबसे प्रतिभावान अटैकिंग मिडफील्डर हैं। उन्हें वेंचुरा ने स्वीडन के खिलाफ मैदान में उतारा ही नहीं और प्रथम चरण के मैच में भी उन्हें 14 मिनट खेलने का मौक़ा दिया। जिस समय टीम को जीत चाहिए थी उस समय वेंचुरा ने रक्षात्मक रणनीति अपनाई और इसी कारण वे भीषण आलोचना का केंद्र भी बने। 
                            
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दरअसल 2006 में विश्व कप जीतने के ही टीम अपने रंग में नहीं है। अगले दो विश्व कप 2010 और 2014 के लिए क्वालीफाई तो किया पर पहले  आगे नहीं बढ़ सकी। यूरोपियन कप में भी 2008 और 2016  में क्वार्टर फाइनल से आगे नहीं बढ़ सकी। 2006 के बाद एकमात्र उल्लेखनीय उपलब्धि 2012 के यूरोपियन कप के फाइनल तक पहुंचना था। जब 2016  में विश्व कप के लिए इटली ने अपना अभियान शुरू किया तो जियान पिएरो वेंचुरा को कोच बनाया जो इटली के अब तक के सबसे उम्रदराज़ कोच हैं।वे अपनी टीम को प्रेरित करने में खासे नाकाम रहे। दरअसल उनमें वो जज़्बा और जोश था ही नहीं जो टीम को प्रेरणा से भर सके। वे टीम के लिए नयी और चातुर्यपूर्ण नीति नहीं बना सके।वे नए ऊर्जावान प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को टीम में  शामिल करने से बचते रहे  और उनकी टीम वेटेरन खिलाड़ियों से भरी रही।
                                            

बुफों जिन्होंने विश्व कप फाइनल्स के बाद संन्यास लेने की घोषणा की थी,इस हार के बाद तुरंत अपने रिटायरमेंट के घोषणा कर दी। ये अजब संयोग था कि इटली के दूसरे महान गोलकीपर  कप्तान डीनो जॉफ ने भी अपने अंतिम मैच में स्वीडन से 2-0 से हारने के बाद संन्यास की घोषणा की थी। बुफों के साथ ही डिफेंडर आंद्रे बरजागली और मिडफील्डर डेनियल डी रोस्सी ने भी खेल को विदा कह दिया। ये तीनों ही 2006 विश्व विजेता टीम के सदस्य थे। साथ ही एक और वेटेरन डिफेंडर चेलिनी ने भी संन्यास की घोषणा कर दी है।इनसे जो वैक्यूम टीम में बनेगा उसे भरने के लिए तमाम युवा और जोशीले खिलाड़ी खड़े हैं जिनमें दोन्नारुममे,गैग्लिआर्डिनि,फेडेरिको चैसा,आंद्रे कोंटीऔर लोरेंजो पैलेग्रिनी प्रमुख हैं।जो भी हो ये खेल है। खेल में उतार चढ़ाव आते रहते है।ये आशा की जानी चाहिए कि इतावली फुटबॉल के इस विध्वंस से ही पुनर्निर्माण का रास्ता निकलेगा और एक बार फिर इतावली फुटबॉल शिखर पर पहुंचेगी। 
       
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जो हो ये भविष्य के गर्त में है। फिलहाल सत्य यही है चमकीली रॉयल ब्लु रंग की जर्सी वाले मॉडल सरीखे इतावली खिलाड़ी 2018 में रूस के मैदानों में पसीना बहाते नहीं दिखाई देंगे और ना ही 'फ्रैटेली डी इटालिया' कानों में गूंजेगा। रियली वी मिस यू इटली इन रशिया 2018,वी मिस यू। 


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दास्तान-ए-फुटबॉल विश्व कप 2018_1 

Sunday, 5 November 2017

जीना




                                                 जीना


कुछ चीजें बहुत कठिन होते हुए भी 
बेहद सरल होती हैं 
और 
सरल सी चीजें  उतनी ही कठिन 

जैसे समझना 
कि 
कुछ उन्मुक्त खिलखिलाहटें 
दिल के आसमा को 
उजास से भर जाती हैं 

कि 
स्निग्ध से कुछ शब्द
अभिव्यक्ति को 
नए अर्थों से भर देते हैं 

कि  
मदमाती देह गंध
मन में घुल कर 
मुलामियत का 
अहसास जगाती हैं 

कि 
कोई उजली सी आस
सपनों की दुनिया में 
खो जाने देती है 

कि 
स्नेह का मीठा सा स्पर्श
पूरे वज़ूद को ही 
स्पंदित कर जाता है 

गर ना हो ऐसा 
तो जीना भी क्या जीना है 
साँसों का आना जाना 
तो बस एक जैविक क्रिया का  
होना है। 
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अक्सर आसान चीजें कठिन और कठिन चीजें आसान सी क्यूँ लगती हैं ?

Sunday, 29 October 2017

लड़कियों की अंडर-16 चौथी एशियाई फीबा बी डिवीज़न प्रतियोगिता


लड़कियों की अंडर-16 चौथी एशियाई फीबा बी डिवीज़न प्रतियोगिता

ज़िंदगी के तमाम रंजोग़म,दुश्वारियों,वर्जनाओं,प्रतिबंधों से बेफ़िक्र इन लड़कियों के चेहरों से छलकता उल्लास एक ऐसा बयान है जो कहता है कि ये खेल के मैदान से सफलता की ऊंची उड़ान की आश्वस्तकारी तैयारी है। पर अफ़सोस इस तरह के चित्र और उनके कारक इवेंट राष्ट्रीय मीडिया के लिए तो खबर नहीं ही बन पाती,स्थानीय प्रतिभागिता के बावजूद स्थानीय मीडिया का ध्यान आकर्षित करने में भी विफल रहती हैं। शायद ये मीडिया की मज़बूरी और चलन है कि सफलताओं से उपजी इन चेहरों की निश्छल हंसी से ज़्यादा उन्हें ग्लैमरस चेहरों और 'सेलेबल' खबरों की आवश्यकता है।

पिछले दिनों खेलों की बड़ी खबरों मसलन अंडर 17  फुटबाल,क्रिकेट,प्रो कबड्डी और बैडमिंटन  के सामने बंगलुरु में आयोजित लड़कियों की अंडर-16 चौथी एशियाई फीबा बी डिवीज़न प्रतियोगिता और उसमें भारत की सफलता खबर ही नहीं बन पाई। ये प्रतियोगिता बंगलुरु में 22  से 28 अक्टूबर तक खेली गयी। इसमें भारत की लड़कियों ने शानदार प्रदर्शन किया। ग्रुप स्टेज पर उन्होंने नेपाल को 106-37 से,श्रीलंका को 86-58 से ईरान को 97-53 से,सेमी फाइनल में कज़ाकिस्तान को 77-40 से और फाइनल में मलेशिया को 64-48 से हराकर बी डिवीज़न लीग जीत ली और ए डिवीज़न में एलिवेट हो गई है जहां अगली प्रतियोगिता में एशिया की टॉप टीमों चीन,जापान,ऑस्ट्रेलिया और कोरिया जैसी टीमों के साथ खेलेगी।

इस टीम में एक लड़की इलाहाबाद से भी थी-वैष्णवी यादव।

वैष्णवी ने पूरी प्रतियोगिता में शानदार खेल दिखाया। वो शूटिंग गार्ड(SG) की पोजीशन पर खेलती है। उसने शानदार शूटिंग की। उसने 20.4 की औसत से अंक बटोरे और असिस्ट का औसत भी प्रति गेम 6.2 था। ये सबसे अधिक था। इसके अलावा प्रति गेम उनकी कुशलता(efficiency)का औसत भी सबसे अधिक 26.8 रहा।उसने फाइनल में भी शानदार खेल दिखाया। इस मैच में उसने 14 अंक बनाये,12 रीबाउंड लिए और 7 असिस्ट की। दो साल पहले जब वो पहली बार भारतीय टीम में चुनी गयी और 2015 में मेदान इंडोनेशिया में आयोजित अंडर 16 फीबा कप खेल कर वापस लौटी तो उसको मैंने इंटरव्यू किया था। उसने बताया था वो वहां केवल एक मैच खेली थी जिसमें उसने दो अंक अर्जित किये थे। ये शायद उस तरह का आग़ाज़ नहीं था जैसा कोई भी शुरू करने वाला चाहता है। लेकिन उस समय वो उत्साह से लबरेज़ थी। भविष्य के प्रति अत्यधिक उत्साहित और आशावान भी। उस समय उसने वायदा किया था वो और अधिक मेहनत करेगी। उसकी मेहनत रंग लाई। अब वो भारतीय टीम की अहम् सदस्य है। उसके लौट पर उससे आकाशवाणी के लिए एक इंटरव्यू तो बनता ही है।इंतज़ार कीजिए।
 फिलहाल वैष्णवी और पूरी टीम को इस सफलता                                     पर बधाई। 





Monday, 16 October 2017

टीम हॉकी इण्डिया



टीम हॉकी इण्डिया 


दीपावली से ऐन चार दिन पहले वाले रविवार को यदि आपकी पत्नी घर की साफ़ सफाई में हाथ बटाने से मुक्ति देकर आपको टीवी के सामने बैठकर अपने पसंदीदा खेल देखने की सहमति प्रदान कर दे तो आप अपने को ज़रुरत से ज़्यादा भाग्यशाली मान सकते हैं। मैं भी उन भाग्यशालियों में से था कि आज रविवार को दो बड़े खेल इवेंट देख पाया।
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आज शंघाई मास्टर्स टेनिस का फाइनल था। यों तो ये कोई बहुत बड़ा इवेंट नहीं था। दरअसल कई बार इवेंट को भाग लेने वाले खिलाड़ी बड़ा बना देते हैं। आज फाइनल में राफा और फेड एक बार फिर आमने सामने थे। ये कुल मिला कर 38वां और इस साल का चौथा मौक़ा था जब ये दोनों खिलाड़ी एक दूसरे से ज़ोर आज़माइश कर रहे थे। सफलता फेड को मिली। पिछले 5 मुकाबलों में फेड ने राफा को हराया। 36 साल की उम्र में जैसी टेनिस फेड खेल रहे हैं वो अविश्वसनीय है। टेनिस,राफा और फेड पर साल भर चर्चा हुई है। तो आज बात दूसरे इवेंट की।
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ढाका में चल रहे 10वें एशिया कप हॉकी में पूल ए के एक मैच में भारत और पाकिस्तान आमने सामने थे। खेल कोई भी हो भारत पाक की टीमें आमने सामने हों तो खिलाड़ी ही नहीं बल्कि दर्शक भी पूरी तरह चार्ज्ड होते हैं। और इस चिर प्रतिद्वंदिता का कारण खेल नहीं बल्कि खेल से इतर कारण रहे हैं जिसे हम सब जानते हैं। आज के मैच में एक बार फिर भारत ने अपनी श्रेष्ठा सिद्ध की और पाकिस्तान को 3-1  से हरा दिया। ये भारत की पाक पर लगातार पांचवी जीत थी। अभी लंदन में संपन्न हॉकी वर्ल्ड लीग सेमीफाइनल में पाक को दो बार 7-1  और 6-1 से हराया था। ये जीत भारतीय टीम के समर्थकों को भावनात्मक संतुष्टि तो प्रदान कर सकती है। लेकिन इससे ज़्यादा और निहितार्थ नहीं निकाले जा सकते हैं।

भारत की तरह पाकिस्तान की हॉकी भी अपनी पुरानी प्रसिद्धि की छाया मात्र रह गयी है,ये हम आप सभी अच्छी तरह से जानते हैं। जिस तरह के वहां अंदुरुनी हालात हैं उसमें वहां खेल के विकास की बात करना बेमानी है। स्क्वैश,क्रिकेट और हॉकी ये तीन ऐसे खेल हैं जिनसे पाकिस्तान की पहचान थी और ये तीनों ही अब दुर्दशा के शिकार हैं और अपनी निम्नतम अवस्था में हैं। अतः इस जीत पर भारत को बहुत ज़्यादा खुश होने का कोई कारण नहीं बनता।

पिछले कुछ वर्षों से भारत हॉकी के रिवाइवल का प्रयास कर रहा है। उसमे कुछ हद तक सफल भी रहा है। पर एक सीमा तक। पिछले कुछ सालों में उसकी रैंकिंग 6 से 10 के दायरे में घूमती रही है। निसंदेह एशिया की बात करें तो भारत श्रेष्ठ है लेकिन विश्व स्तर पर कहीं नहीं ठहरता। आज भी आप उससे किसी बड़े टूनामेंट जीतने की उम्मीद नहीं रख सकते। सेमीफाइनल में पहुंचना भी अभी सपना सा है,जीतने की बात तो छोड़िये।

हाल के वर्षों में हॉकी को ऊपर लाने के लिए दो प्रयास किये गए। एक हॉकी लीग शुरू की गयी और विदेशी कोच लाये गए। इनके परिणाम सीमित रहे हैं। आप ब्रासा,टेरी वाल्श, ओल्टमंस और मरीने तक अनेक प्रसिद्द विदेशी खिलाड़ी लाये मुँहमाँगी तनख्वाह पर। जब क्रिकेट जैसे खेल में विदेशी कोच नहीं चल सके तो हॉकी में क्या चलेंगे। दरअसल विदेशी कोच के साथ सबसे बड़ी समस्या खिलाड़ियों के साथ सामंजस्य की है। उनकी भाषा और तौर तरीकों के साथ खिलाड़ियों का सामंजस्य बैठाना बड़ा मुश्किल काम है। क्रिकेट में अपेक्षाकृत अधिक एलीट बैकग्राउंड वाले खिलाड़ी आते हैं जो कुछ हद तक विदेशी कोचों की भाषा और तौर तरीकों से वाकिफ होते हैं और वहां वे फेल हो जाते हैं तो हॉकी जैसे खेल में,जहां अपेक्षाकृत निम्न पृष्ठभूमि और आदिवासी क्षेत्रों से खिलाड़ी आते हैं,वहां वे विदेशी कोचों से किस तरह से सामंजस्य बैठते होंगे,ये समझा जा सकता है।इसी तरह लीग में खिलाड़ियों को पैसा जरूर मिला लेकिन जितना एक्सपोज़र देशी खिलाड़ियों को मिलना चाहिए था नहीं मिला। अनेक खिलाड़ी पूरी लीग में बिना खेले या कुछ मैच खेल कर रह जाते हैं। इस सब के बावजूद ये मान भी लिया जाए कि ये उपाय कारगर हो रहे हैं कि पिछले कुछ सालों में इन्ही की वजह से हॉकी में कुछ सम्मानजनक स्थिति में आये हैं तो भी एक मूलभूत समस्या को जब तक एड्रेस नहीं किया जाता तब तक आप एक सीमा से ज़्यादा उठान हॉकी का नहीं ही कर सकते। ये समस्या कृत्रिम घास के मैदानों की है।

दरअसल इस उपमहाद्वीप की हॉकी की दुर्दशा कृत्रिम घास के मैदान के साथ साथ आयी। प्राकृतिक घास के मैदान और कृत्रिम घास के मैदान के खेल में जमीन आसमान का अंतर है। खेल की बेसिक्स में ही अंतर है। कृत्रिम मैदान पर खिलाड़ी में स्टेमिना,गति और ताकत चाहिए। वहां घास के मैदान की तरह बाल पर ड्रिब्लिंग से नियंत्रण नहीं बनाये रख सकते। वहां आपको गेंद जल्द से जल्द रिलीज करनी होती है। भारत में कृत्रिम टर्फ के हॉकी में आने के इतने साल बाद भी गिने चुने शहरों में इसकी सुविधा है। ज्यादातर बच्चे घास के मैदान पर हॉकी खेलना सीखते हैं,उसी की बेसिक्स उनमें विकसित होती है और जब बड़े होते हैं तो कृत्रिम टर्फ पर खेलना पड़ता है। अब उन्हें नई तकनीक सीखनी होती है। बेसिक्स पर फिर से काम करना पड़ता है। सब घाल मेल होता जाता है। सिर्फ बेसिक्स पर ही नहीं शारीरिक संरचना(शरीर का बायो मेकेनिज्म) के एडजस्टमेंट में भी समस्या आती है। घास के मैदान पर खेलने की शारीरिक आवश्यकताएं  अलग होती हैं। खिलाड़ियों का शारीरिक विकास उसी के अनुरूप होता है। लेकिन बाद में कृत्रिम टर्फ पर शरीर को एडजस्ट करने में खासी दिक्कत आती है। इसीलिये एक सीमा तक तो आप प्रगति कर सकते हैं उससे आगे बहुत मुश्किल है। अगर शुरुआत से खिलाड़ी उसी सतह पर नहीं खेलेगा जिस पर उसे प्रतिस्पर्द्धात्मक हॉकी खेलनी है आप वांछित परिणाम शायद ही पा सकें चाहे जितना प्रयास कर लें।
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 फिलहाल तो इंडिया एशिया कप के सुपर फोर में पहुँच गयी है और गोल औसत के आधार पर पकिस्तान भी। तो एक और महा मुकाबले देखने की तैयारी कीजिये और ये उम्मीद रखिये कि कम से कम एशिया  में तो अपना परचम लहराने में टीम इण्डिया सफल होगी।

















Friday, 29 September 2017

बने रहें ज़िंदगी में रंग


ताकि बने रहें ज़िंदगी में रंग 


वे ख़्वाहिशें 
जो सबसे छोटी होती हैं 
होती हैं हमारी पहुँच के अंदर 
कि कर सकते हैं 
उन्हें सबसे सुगमता से पूर्ण 
उनका पूरा होना 
होता है सबसे भयावह। 


उन छोटी ख़्वाहिशों से 
जुडी होती हैं 
हमारी सबसे बड़ी ख़्वाहिशें 
कि छोटी ख्वाहिशों के पूरा होने पर 
अक्सर खिसक जाती है बड़ी ख़्वाहिशों की ज़मीन 
कि टूट कर बिखर बिखर जाती हैं किरचें 
लहूलुहान हो जाती है आत्मा।।


मेरी अब सबसे बड़ी ख़्वाहिश है 
कि सबसे छोटी ख़्वाहिश 
कभी ना बन सके हक़ीक़त
ताकि फलती फूलती रहे बड़ी ख़्वाहिशें 
बने रहें ज़िंदगी में रंग 
बनी रहे तरलता 
और बनी रहे गति।।। 

Sunday, 17 September 2017

एक अनिर्णीत संघर्ष जारी है



एक अनिर्णीत संघर्ष जारी है 


यकीन मानिए बैडमिंटन चीन और इंडोनेशिया के बिना भी उतना ही रोमांचक और शानदार हो सकता है जितना उनके रहते होता है। इस बात की ताईद वे सब कर सकते हैं जो एक बार फिर नोजोमी और पुरसला के खेल के जादू में डूबते उतराते अभी भी उनके शानदार खेल के हैंगओवर से बाहर नहीं आए होंगे। एक महीने के भीतर ये दूसरा अवसर था जब जब ये दोनों खिलाड़ी एक बार फिर कोर्ट में आमने सामने थे। फ़र्क़ केवल जगह का था। वे यूरोप की धरती छोड़ अपने महाद्वीप में आ चुकी थीं। इस बार संग्राम स्थल ग्लास्गो से बदल कर सियोल हो गया था।
      सियोल में मुकाबला ठीक वहीं से शुरू हुआ जहां ग्लास्गो में ख़त्म हुआ था। ग्लास्गो में स्कोर था 21-19,20-22,22-20 नोजोमी के पक्ष में।अब यहां सियोल में पहले अंक से ही तय हो गया था ये ग्लास्गो का मुकाबला आगे खेला जा रहा है। हर पॉइंट के लिए वैसा ही संघर्ष। पहले गेम के अंत में स्कोर 20-18 . नोजोमी के पास दो गेम पॉइंट। पर इस तरह के क्लासिक संघर्ष में चीज़े आसान नहीं होतीं।पुरसला ने लगातार चार अंक जीते और गेम 22-20 से अपने नाम किया। ये हार नोजोमी के लिए सोए शेर को जगाने जैसी थी। आखिर वो विश्व चैम्पियन थी। दूसरे गेम में उन्होंने नेट पर शानदार खेल दिखाया और कुछ शानदार स्मैशेस लगाए। ऐसा लगा पुरसला थक गई हैं। गेम 21-11 से नोजोमी ने जीता। दरअसल इन दो मैचों में ये एक गेम ऐसा था जो इस क्लासिक प्रतिद्वंदिता की धार को कुछ भोथरा कर रहा है,थोड़ा डाइल्यूट कर रहा था। लेकिन इस गेम को एक क्षणिक व्यवधान माना जाना चाहिए। शायद उस गेम में पुरसला अपनी शक्ति और अपनी एकाग्रता पुनः संचित कर रही थीं। तभी तो अगले गेम में पुरसला ने शुरू से ही बढ़त बना ली और अंत तक उसे कायम रखा। इस गेम में संघर्ष एक बार पुनः चरम पर था। फिर बड़ी बड़ी रैलियाँ खेली गयी। 19-15 के बाद वाले पॉइंट के लिए 56 शॉट्स की रैली हुई। एक बार बैडमिंटन का खेल ऊंचाइयों पर था। इस बार पुरसला ने धैर्य बनाये रखा और गेम 21-18 से जीत कर कोरियाई सुपर सीरीज का खिताब अपने नाम कर लिया।





 अगर विश्व कप वाला मुकाबला 110 मिनट चला तो ये भी 83 मिनट चला। निसंदेह ये विश्व कप जैसा मैच नहीं था फिर भी लगभग उस जैसा ही था-क्लासिक,शानदार ,संघर्षपूर्ण,रोमांचक जिसमें खेल ऊंचाइयों को छूता है। निसंदेह ये भी ग्लास्गो की तरह निर्णायक जीत नहीं है। ये एक शानदार नयी प्रतिद्वंदिता का आग़ाज़ भर है। अंजाम  देखना बाकी है। और अगली बार जब वे फिर कोर्ट में आमने सामने होंगी तो वो इस मैच का एक्सटेंशन भर होगा,इस अनिर्णीत संघर्ष का अगला पड़ाव भर। फिलहाल तो पुरसला की इस जीत और ग्लास्गो की हार के 'स्वीट रिवेंज' पर बल्ले बल्ले। 
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और हाँ आज चेन्नई में क्रिकेट की याद मत ही दिलाइयो 

Saturday, 16 September 2017

कम बैक मैन ऑफ़ इंडियन क्रिकेट




कमबैक मैन ऑफ़ इंडियन क्रिकेट


कुछ फोटो अपनी अंतर्वस्तु में इतने समृद्ध और शक्तिशाली होते हैं कि आइकोनिक बन जाते हैं। वे केवल एक चित्र भर नहीं होते। वे एक पूरी कहानी कहते हैं।वे एक युग का, एक पूरे काल खंड का,एक सम्पूर्ण प्रवृति का प्रतिनिधित्व करते हैं।मोहिंदर अमरनाथ की हुक वाली इस फोटो को देखिए।ये केवल मोहिंदर का या उनके एक शॉट का फोटो भर नहीं है।ये मोहिंदर के पूरे खेल का,उनकी बैटिंग कौशल का, उनके चरित्र का,उनके साहस और आत्मविश्वास का,उनके संघर्ष करने के ज़ज़्बे का,किसी भी परिस्थिति में हार न मानने की ज़िद का और साथ ही साथ क्रिकेट के एक पूरे काल खंड का भी प्रतिनिधित्व करता है।एक ऐसा काल खंड जो क्रिकेट में बल्लेबाज़ों के लिए सबसे कठिन काल माना जाता है।तेज़ गेंदबाज़ों के खौफ का काल।तेज़ गेंदबाज़ों के उस खौफनाक समय में जब सुरक्षा उपकरण अपनी आदिम अवस्था में थे,ये चित्र उस खौफ के विरुद्ध बल्लेबाज़ों के अदम्य साहस का चित्र है।

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कुछ पीछे जाइए।अपनी स्मृति के घोड़े दौड़ाइए। सत्तर और अस्सी के दशक में गौते लगाइए। क्रिकेट को सोचिए और पांच दिनी टेस्ट मैचों को हेराइए। आने को तो बहुत कुछ याद आएगा। लेकिन अगर सबसे ज़्यादा कुछ याद आएगा तो अनिर्णीत और बोरिंग होते टेस्ट मैचों में तेज़ गेंदबाज़ों की रफ़्तार याद आएगी। याद आएगा ये वही समय था जब वेस्ट इंडीज़ की टीम की अपने तेज़ गेंदबाज़ों के दम पर तूती बोलती थी।ये एंडी रॉबर्ट्स,माइकेल होल्डिंग,गार्नर और मेल्कॉम मार्शल की कहर बरपाती गेंदों का समय था। ये जेफ़ थॉम्पसन और डेनिस लिली की आग उगलती गेंदों का समय था। ये इमरान खान,सरफ़राज़ नवाज,कपिल देव,इयान बॉथम,डेरेक अंडरवुड,रिचर्ड हेडली की घातक और मारक इन/आउट कटर/स्विंगर का समय था। गनीमत थी कि दक्षिण अफ्रिका उस समय तक क्रिकेट बिरादरी से बाहर था। और उस पर तुर्रा ये कि बॉलर चाहे जितनी बाउंसर फेंके कोई प्रतिबन्ध नहीं और सुरक्षा उपकरण ना के बराबर।

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यों तो उस समय भी तमाम महान बल्लेबाज़ हुए,पर मोहिंदर उन सब से अलग थे। दरअसल तेज़ गेंदबाज़ों के विरुद्ध उनकी जो अप्रोच थी वो सबसे अलग थी जो उन्हें अपने समकालीन सब बल्लेबाज़ों से अलहदा स्पेशल बनाती है। (सामान्यतः तेज़ गेंदबाज़ जो बाउंसर फेंकते हैं उसके पीछे बल्लेबाज़ के मन में खौफ पैदा करना होता है।बल्लेबाज़ उछाल वाली गेंदों को या तो गेंद की लाइन से अलग हट कर या नीचे बैठ कर विकेट के पीछे जाने देते हैं। ये सबसे आसान और प्रचलन वाला तरीका है। और जब बल्लेबाज़ उसे डक कर जाने देता है तो गेंदबाज़ों के लिए बल्लेबाज़ों का ये जेस्चर उन्हें सबसे सुकून देने वाला होता है।लेकिन मोहिंदर ने ये तरीका नहीं अपनाया।) वे बाउंसर को डक नहीं करना चाहते थे बल्कि हर उछाल वाली गेंद को खेलना चाहते थे और खेलते थे। इसीलिये हुक उनका सबसे पसंदीदा शॉट होता था। ये निसंदेह बहुत साहस की बात होती है।और केवल साहस की बात ही नहीं थी बल्कि तेज़ गेंदबाज़ को सबसे माकूल जवाब भी होता है,सबसे बेहतर काउंटर अटैक। एक तेज़ गेंदबाज़ के लिए इससे ज़्यादा चिढ़ वाली और कोई बात नहीं हो सकती कि उसके सबसे बड़े अस्त्र के विरुद्ध आप डक कर उसकी ताकत को मानने के बजाय आप उसकी आंखों में आँखें डाले खड़े हैं और उसे हुक करके उसको उल्टी चुनौती पेश कर होते हैं,उसके मर्म को भेद रहे होते हैं। मोहिंदर ऐसा ही करते थे,ये जानते हुए भी कि सीने या उससे ऊंची गेंदा की लाइन में आना और उस पर हुक खेलना निसंदेह खतरे से भरा शॉट होता है क्यूँकि चूकते ही बॉल से चोट लगने की  बहुत ज़्यादा संभावना होती है। ये उनका साहस और जिद थी। वे हर परिस्थिति में हुक शॉट खेलते थे और हुक शॉट उनका ट्रेडमार्क बन गया था। 
                                     उन्हें हेडली की गेंद पर सर में हेयर लाइन फ्रेक्चर हुआ,इमरान खान की गेंद पर बेहोश हुए,मेलकॉम मार्शल की गेंद ने उनका दाँत तोड़ दिया और जेफ़ थॉमसन की गेंद ने उनका जबाड़ा ही तोड़ दिया। पर इनमें  से कोई भी  उन्हें अपना हुक शॉट खेलने से नहीं रोक पाया। 
                                       बात 1982-83  के वेस्ट इंडीज़ दौरे के ब्रिजटाउन टेस्ट की है। मोहिंदर को सर में होल्डिंग की गेंद से चोट लगी और टाँके लगवाने के लिए उन्हें मैदान छोड़ना पड़ा। वापस मैदान में आने पर माइकेल होल्डिंग फिर सामने थे। स्वाभाविक था उन्हें डराने के लिए होल्डिंग ने बाउंसर फेंकी। कोई भी दूसरा बल्लेबाज़ होता तो डक करतापर वे मोहिंदर थे।उन्होंने बॉल को हुक कर गेंद को चार रन के लिए सीमा रेखा से बाहर का रास्ता दिखाया। हुक उनका सबसे पसंदीदा शॉट था और 1984-85 में इंग्लैंड के विरुद्ध दिल्ली के फ़िरोज़ शाह कोटला मैदान पर खेले गए टेस्ट मैच के दौरान उनका हुक शॉट वाला ये चित्र एक क्लासिक प्रतिनिधि चित्र है।

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दरअसल मोहिंदर अमरनाथ भारत के सबसे बेहतरीन बल्लेबाज़ों में से एक थे।खासकर तेज़ गेंदबाज़ों के विरुद्ध। 1983 में विश्व कप जीतने वाली टीम के वे हीरो थे। वे सेमीफाइनल और फाइनल के मैन ऑफ़ द मैच के अलावा मैन ऑफ़ थे टूर्नामेंट भी थे। वे बहुत ही ज़हीन खिलाड़ी थे। बहुत ही नफ़ासत से खेलने वाले खिलाड़ी। उनके खेल में गज़ब का ठहराव था।एक अलसायापन था। उनके पास तेज़ से तेज़ गेंद खेलने के लिए पर्याप्त समय होता था। वे तेज़ गेंदों को भी इतने आराम से खेलते प्रतीत होते मानों स्पिन खेल रहे हैं। सचिन के बारे में कहा जाता है कि उनके पास किसी भी गेंद को खेलने के लिए दो शॉट होते थे। पर मोहिंदर को खेलते देखकर ऐसा लगता मानो उनके पास एक साथ दो बॉल खेलने का समय होता था। उनका खेल इतना नफासत भरा होता कि उनके शॉट को देख कर लगता ही नहीं वे गेंद पर प्रहार कर रहे हैं। ऐसा लगता मानो वे गेंद को पुचकार रहे हों।उनके हुक जैसे शॉट भी। 
                              दरअसल वे जेंटलमैन गेम के प्रतिनिधि खिलाड़ी थे।शांत,उत्तेजनाविहीन,अलसाएपन  के बावजूद एक खास किस्म के ओजपूर्ण अभिजात्य से युक्त। उनके खेल को देखना दरअसल संगीत को विलंबित लय में सुनना है। एक ऐसी रचना जो सिर्फ और सिर्फ विलम्बित में बज रही है जो ना मध्यम में जाती है और ना द्रुत में। ये बात उनकी बैटिंग में ही नहीं बल्कि बॉलिंग में भी थी।हल्का सा तिरछा रन अप।धीमे धीमे दौड़ते हुए,सहज,प्रवाहपूर्ण।वे मध्यम तेज़ गति के गेंदबाज़ थे। पर लगता ही नहीं था कि वे माध्यम तेज़ गति से गेंदबाज़ी कर रहे हैं।बैटिंग की तरह बॉलिंग में भी वे विलम्बित से शुरू करते हुए विलम्बित पर ही ख़त्म होते । 


                   उनको भारतीय क्रिकेट में वो मुकाम हासिल नहीं हुआ जिसके वे हकदार थी। वे अपनी तमाम योग्यताओं के बावजूद टीम में अंदर बाहर होते रहे। वे जब जब बाहर होते हर बार वे अपने को सिद्ध करते और टीम में शामिल होते। इसीलिये वे 'भारतीय क्रिकेट के कमबैक मैन' कहे जाने जाते हैं। वे कुछ अलग  थे और शायद इसीलिये ऐसे लोग काम भी कुछ अलग हट के करते हैं। वे अपने साइड ऑन बैटिंग स्टांस के लिए जाने जाते हैं।तभी तो  वे एकमात्र भारतीय क्रिकेटर हैं जो 'हैंडलिंग द बॉल' और 'ऑब्स्ट्रक्टिंग द फील्ड' तरीकों से आउट हुए हैं और विश्व में एकमात्र जो इन दोनों तरीकों से आउट हुए हों। 


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24 सितम्बर को मोहिंदर अमरनाथ भारद्वाज का जन्मदिन है। अपने सबसे पसंदीदा क्रिकेटर 'जिमी' को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाइयाँ। 





Tuesday, 12 September 2017

टेनिस इस साल

आज सुबह फ्लशिंग मीडोज के आर्थर ऐश सेंटर कोर्ट की खूबसूरत नीली प्रो डेको सतह पर यूएस ओपन के फाइनल मैच में राफ़ा ने अंतिम सर्विस काफी डीप की और फिर केविन एंडरसन के रिटर्न को नेट पर आकर किशोर सुलभ मुस्कान और चालाकी के साथ बॉल हलके से क्रॉस कोर्ट टैप भर करने के साथ ही एक और ग्रैंड स्लैम ख़िताब अपने नाम कर लिया। ये उनका 16वां खिताब था। इस सोलहवें शब्द की फितरत ही कुछ ऐसी है उसके ख्याल भर से मन उमग उमग जाता है।शायद उस 16वें खिताब के ख्याल भर ने राफा के मन को कैशोर्य उमंग से भर दिया होगा जो मैच के  उस आख़िरी शॉट को खेलते समय राफा के चहरे से छलक छलक जाती थी। और इस तरह राफा ने जितना शानदार सत्र का आग़ाज़ किया था उससे कहीं शानदार समापन किया।
                               
  दरअसल टेनिस में ये साल केवल और केवल राफेल नडाल और रोजर फेडरर के और उनके खेल इतिहास के सबसे शानदार 'कमबैक' के साल के तौर पर जाना जाएगा। अगर राफा के लिए 2015 और 2016 चोटों और असफलताओं का काल था तो फेड के लिए पिछले कई सत्र भी बिलकुल राफा के इन दो सालों जैसे ही थे। लेकिन इस साल दोनों ही अपनी असफलताओं की कहानी को पीछे छोड़ कर नए जोश और जज़्बे के साथ ऑस्ट्रेलियन ओपन में दाखिल ही नहीं हुए बल्कि फाइनल में पहुंचे। और तब टेनिस इतिहास के सबसे रोमांचक मुक़ाबले में से एक हुआ। बाज़ी फेडरर ने मारी। पर फेडरर कहने के मज़बूर हुए 'काश!ये मैच ड्रा हुआ होता'।ये शायद विधि का उवाच था जिसे साल के अंत में सही सिद्ध होना था। दोनों ने दो दो ग्रैंड स्लैम ख़िताब आपस में बाँट लिए। स्कोर रहा 2-2 ।ऑस्ट्रेलिया फेड ने जीता,फिर फ्रेंच राफा ने,विंबलडन फेड ने जीता तो यूएस राफा ने। हाँ राफा इस मामले में आगे रहे कि उन्होंने तीन फाइनल खेले और फेड ने दो। अगर फेड ने विंबलडन रिकॉर्ड आठवीं बार जीत कर अपने खिताबों से स्विस भूमि के खूबसूरत शुभ्र श्वेत हिमाच्छादित जैसे लगभग अजेय पर्वत की रचना की जिसे देख कर टेनिस प्रेमी आह्लादित और आनंदित होते रहेंगे पर शायद ही कोई खिलाड़ी उसे पर करने की हिम्मत जुटा सके तो राफा ने फ्रेंच ओपन रिकॉर्ड 10वीं बार जीत कर खूबसूरत 'ला डेसिमा' कविता की रचना कीजिसे शायद ही और कोई दूसरा रच पाए।
              अगर पुरुषों में ये साल राफा और फेड के नाम रहा तो महिलाओं में ये साल जैज़ संगीत की धुनों से स्पंदित होती एफ्रो अमेरिकन बालाओं के नाम रहा।साल के पहले ही ग्रैंड स्लैम ऑस्ट्रेलियाई में विलियम्स बहनों के पावर गेम के सामने कोई टिक नहीं सका। 37 वर्ष की वीनस और 35 वर्ष की सेरेना के बीच फाइनल में बाज़ी सेरेना के हाथ रही। यदि अगर मगर की गुंजाइश हो तो ये साल सेरेना के डोमिनेशन के लिए जाना जाता क्यूंकि वे जिस तरह की टेनिस खेल रही थी उसमे और किसी के लिए स्पेस बचता ही नहीं था। लेकिन अपनी प्रेगनेंसी के चलते वे टेनिस से अलग रही और एक वैक्यूम बना जिसे चारों और से अलग अलग खिलाड़ियों ने भरा। फ्रेंच जेलेना ओस्टोपेन्को ने जीता,विंबलडन मुगुरुजा ने जीता और यूएस स्लोअने स्टीफंस ने। यूएस ओपन के सेमी फाइनल में वीनस सहित चारों अमेरिकी खिलाड़ियों में तीन एफ्रो अमेरिकन्स थी। निसंदेह 1957 में पहली बार किसी एफ्रो अमेरिकन्स महिला खिलाड़ी एल्थिया गिब्सन द्वारा यूएस ओपन जीतने की 60वीं वर्षगाँठ का एफ्रो अमेरिकी  खिलाड़ियों द्वारा इस शानदार ट्रिब्यूट बेहतर और कुछ नहीं हो सकता था।  

           जो भी हो पुरुषों में राफा और फेड को कोई चुनौती नहीं दे सका। डोमिनिक थिएम,अलेक्सेंडर ज़्वरेव,डोलगोपोव,एंडरसन जैसे युवा खिलाड़ी कोई कड़ी चुनौती पेश नहीं कर सके। युवा जोश अनुभव के सामने घुटने टेकता नज़र आया। वहीं महिलाओं में कही ज़्यादा कड़ी प्रतिस्पर्द्धा दिखाई दी और चार ग्रैंड स्लैम में चार अलग विजेता बनी।  

Sunday, 10 September 2017

स्लोने स्टीफेंस



ये एक अद्भुत दृश्य था जिसमें  दो प्रतिद्वंदी खिलाड़ी मैच के खत्म होने पर एक दूसरे को इस तरह से जकड़े थीं मानो अब जुदा ही नहीं होना है और दोनों की आँखों से अश्रुओं की ऐसी अविरल धारा बह रही थी जैसे सावन बरस रहा हो।वे एक अद्भुत दृश्य भर नहीं था बल्कि टेनिस इतिहास की और एफ्रो अमेरिकन्स इतिहास के एक अविस्मरणीय क्षण की निर्मिति भी कर रही थीं। आज से ठीक साठ बरस पहले 1957 में पहली बार किसी एफ्रो अमेरिकन्स महिला खिलाड़ी एल्थिया गिब्सन द्वारा यूएस ओपन जीतने की 60वीं वर्षगाँठ का पहले एफ्रो अमेरिकी पुरुष एकल यूएस ओपन विजेता आर्थर ऐश कोर्ट पर दो एफ्रो अमेरिकी खिलाड़ी मेडिसन कीज और स्लोने स्टीफेंस फाइनल खेल कर जश्न मना रही थीं। 

               
और जब स्टीफेंस ने कीज को 6-3,6-0से हरा कर अपना पहला ग्रैंड स्लैम खिताब जीत रही थीं तो ये निसंदेह एक कल्पना का हक़ीकत में तब्दील होना या किसी सपने का साकार होना या फिर किसी असंभव का संभव में बदल जाने जैसा था। 24 वर्षीय स्टीफेंस खाते में इससे पूर्व केवल तीन खिताब थे। वे इस प्रतियोगिता से पहले 11 महीने पैर  की चोट के कारण मैदान से दूर थीं और यूएस ओपन से पहले उनकी  83वीं रैंकिंग थी। दरअसल ये अपने पर भरोसे की जीत है। हौंसले और ज़ज्बे की जीत है। स्टीफेंस की इस शानदार जीत को सलाम !

Thursday, 7 September 2017

ये कमबैक ड्रीम रन' का उदास अंत है


ये कमबैक ड्रीम रन' का उदास अंत है 


ज़िंदगी में कुछ ऐसे जिंक्स होते हैं जिनसे पार पा पाना बहुत मुश्किल होता है। रोजर फेडरर के लिए जुआन डेल पोत्रो को एक ऐसा ही जिंक्स माना जा सकता है जिसे तोड़ने में फेडरर एक बार फिर नाकामयाब रहे और यूएस ओपन के क्वार्टर फाइनल में फिर पोत्रो से 5-7,6-3,6 -7(8-10),4-6 से हार गए। 

पोत्रो की जीत और फेडरर की हार दो मायनो में महत्वपूर्ण है। 

एक,खेल इतिहास के सबसे शानदार 'कमबैक ड्रीम रन' का अंत कर पोत्रो ने फेडरर को एक बार फिर इतिहास बनाने से रोक दिया ठीक वैसे ही जैसे 2009 में किया था। पिछले साल की चोटों से उबर कर इस साल फेडरर ने शानदार वापसी की थी।फेडरर पहले ऑस्ट्रेलियन ओपन और उसके बाद विंबलडन जीत कर 36 साल की उम्र में एक साल में तीन ग्रैंड स्लैम जीतने का अविश्वसनीय इतिहास रचने की राह पर थे।वे इस हार से पहले इस साल ग्रैंड स्लैम के लगातार 18 मैच जीत चुके थे। याद कीजिए2 009 के यूएस ओपन के फाइनल को। तब एक शानदार संघर्षपूर्ण मैच में पोत्रो ने फेडरर को 3-6,7-6,4-6,7-6,6-2 से हरा कर फेडरर के यूएस ओपन के लगातार 41 मैचों की जीत के सफर को ही नहीं रोका था बल्कि ओपन एरा में लगातार छठवें खिताब को जीतने से रोक कर दुर्लभ इतिहास बनाने से भी रोक दिया था। उस साल यदि फेडरर जीत जाते तो 1969 में रॉड लेबर के बाद एक कैलेंडर ईयर में फ्रेंच,विंबलडन और यूएस जीतने और ग्रास,क्ले और हार्ड कोर्ट पर खिताब जीतने वाले पहले खिलाड़ी होते। 

दो, नडाल और फेडरर के बीच संभावित ड्रीम सेमीफाइनल की संभावनाओं को समाप्त कर दिया। अगर यहाँ फेडरर जीतते तो नडाल और फेडरर यूएस ओपन में पहली बार आमने सामने होते। इस हार ने ना केवल दोनों महान खिलाड़ियों के बीच एक और क्लासिक मुकाबले से वंचित किया बल्कि फाइनल से पूर्व एक और फाइनल के रोमांच को भी समाप्त कर दिया। फिलहाल इस हार ने फेडरर की 20वां ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने की संभावना को तो खारिज कर दिया पर अभी भी नडाल के 16वें ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने की संभावनाएं बरकरार है।

देखिए आगे आगे होता है क्या। 

Tuesday, 29 August 2017

चश्मे का भार

       



        भ्रम 
            आसमाँ की ओर 
            थोड़ा उठा सा मुँह 
            उसका 
            ऐसे लगता मानो 
            दो कान 
            और एक नाक 
            चश्मे का भार 
            नहीं सँभाल पा रहे हैं 

         हक़ीक़त
            दरअसल ये उसका चश्मा नहीं 
            उसकी आँखों में 
            छलक छलक जाते 
            अनगिनत सपने हैं  
            जिन्हें संभालने के फेर में 
            ऊंचा हो जाता हैं मुँह 
            और छूट जाती हैं जमीं  
            कि ठोकर खाती है बार बार
            सपने बचाने की एवज में । 
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तो क्या दिखने वाला हमेशा सच नहीं होता ?

Monday, 28 August 2017

विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप 2017

                       
विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप 2017
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                 कुछ मैचों को देखते हुए लगता है कि इसमें कोई हारा तो है ही नहीं,निर्णय हुआ ही कहाँ कि कौन श्रेष्ठ तो फिर ये ख़त्म क्यों हो गया,क्यों दो खिलाड़ी हाथ मिलाते हुए मैदान से विदा ले रहे हैं,एक मुस्कुराते चहरे और शहद से  मीठे पानी से डबडबाई आँखों के साथ तो दूसरा उदास चहरे और  खारे पानी में डूबी आँखें लिए।सच में,कुछ मैचों में  कोई हारता नहीं है।ऐसे में या तो दोनों खिलाड़ी जीतते हैं या फिर खेल जीतता है। कल रात जब ग्लास्गो के एमिरेट्स एरीना में विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप के महिला फाइनल में भारत के पुरसला वी सिंधु और जापान की नोजोमी ओकुहारा खेल रही थीं तो कुछ ऐसा ही घटित हो रहा था। रिकार्ड्स में भले ही ये दर्ज़ हो गया हो की इस मुक़ाबले में ओकुहारा ने सिंधु को 21-19,20-22,22-20 से हरा दिया, पर स्कोर देखेंगे तो पाएंगे कि ये मैच अधूरा रहा गया और अगली बार वे दोनों कोर्ट में जब भी आमने सामने होंगी तो ठीक वही से शुरू करेंगी जहाँ खेल कल रात अधूरा छोड़ा था।   
                       सिंधु और ओकुहारा बीच खेला गया ये मुक़ाबला अविस्मरणीय था जो अब तक खेले गए बैडमिंटन के सबसे शानदार चुनिंदा क्लासिक मुकाबले में से एक होगा। और इस प्रतियोगिता का तो निसंदेह सर्वश्रेष्ठ मैच ही होगा। एक सौ दस मिनट तक चला ये मैच प्रतियोगिता के इतिहास का सबसे लंबा मैच था जिसमें बैडमिंटन खेल अपनी सम्पूर्णता के साथ मौजूद था। हर तरह का आक्रमण,हर तरह  रक्षण,हर तरह का शॉट,हर तरह की रणनीति,जोश,जूनून,जज़्बा,धैर्य,मानसिक संतुलन ,मानवीय क्षमता और कौशल,तनाव सब कुछ अपने उच्चतम स्तर पर। संघर्ष का बेजोड़ प्रदर्शन।एक-एक अंक के लिए अनथक संघर्ष।हार ना मानने का संकल्प।परिणामस्वरूप लम्बी लम्बी रैलियां।दूसरे गेम के अंतिम अंक के लिए संघर्ष तो अविश्वसनीय था। इस रैली में 73 शॉट्स लिए गए जिसमें  वो सब कुछ था जो बैडमिंटन में हो सकता है। जोरदार स्मैशेस,शानदार प्लेसिंग और कुछ अविश्वसनीय रिटर्न्स। केवल ये एक रैली किसी भी खिलाड़ी को  बैडमिटन का पूरा खेल सिखाने  के लिए शायद पर्याप्त हो। 
                       अगर ये विश्व कप चीन के पराभव का विश्व कप था तो भारत के उभार का। पहली बार भारत ने इस प्रतियोगिता में दो पदक जीते। पिछले साल साइना ने सिल्वर मैडल जीता था। इस बार फिर शानदार प्रदर्शन कर सेमीफाइनल  पहुंची  कांस्य पदक पक्का किया। किदाम्बी भले ही पदक नहीं जीत पाए पर उनका प्रदर्शन उम्मीद जगाता है। निसंदेह आने वाले समय में बैडमिंटन में भारत बड़ी ताक़त होगी। इस बार पोडियम पर दो भारतीय खिलाड़ी थे। ये पहली बार था। और ये उम्मीद जगाता है।  
 


Thursday, 24 August 2017

विदा रूनी




विदा रूनी

                 इंग्लैंड के स्टार फ़ुटबाल खिलाड़ी और देश के लिए सर्वाधिक गोल करने वाले फॉरवर्ड वायने रूनी ने जब कल अचानक अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं को विदा कह दिया,बावजूद इसके कि टीम मैनेजर गेरेथ साउथगेट ने कहा कि आपको माल्टा और स्लोवाकिया के विरुद्ध होने वाले विश्व कप क्वालीफायर मैचों के लिए टीम में शामिल किया जा रहा है, तो सबसे पहले यही बात दिमाग में आई कि क्या आप भारत में इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि टीम मैनेजर कहे आपकी टीम को ज़रुरत है और आप अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं को विदा कह दें। और वो भी इसलिए कि आप को लगने लगे कि आप अपने चयन के साथ न्याय नहीं कर सकते और अब अपना सौ फीसदी नहीं दे सकते। यहां तो खिलाड़ी उस समय तक खेलते रहते हैं जब तक उन्हें प्रबंधन द्वारा कह नहीं दिया जाता कि आप सम्मानपूर्वक विदा ले लीजिये या फिर उन्हें धकिया कर बाहर ही नहीं कर दिया जाता। सिर्फ खिलाड़ी ही नहीं हर क्षेत्र में यही हाल है। अब सिनेमा को लीजिये। पचास के ऊपर हुए अभिनेता भी तब तक रोमांटिक युवा किरदार निभाना नहीं छोड़ते जब तक जनता उनकी फिल्मों को धोबी पछाड़ दाँव लगाकर मिट्टी नहीं सुंघा देती। 
                                               31 वर्षीय रूनी भले ही आपको लीजेंड ना लगे। भले ही वो एलन शीयरर,गैरी लिनेकर,बॉबी चार्लटन,शिल्टन या डेविड बेकहम जैसा महान खिलाड़ी ना लगे। पर सच्चाई ये है कि वो इंग्लैंड की तरफ से खेलने वाला सबसे शानदार खिलाड़ी था जिसने देश के लिए 119 मैचों में से 71 जीते 29 ड्रा किए और 19 में हारे। इन मैचों में कुल 53 गोल किए।इंग्लैंड के लिए रिकार्ड सबसे ज़्यादा। 2003 में जब वो ऑस्ट्रेलिया के विरूद्ध मैदान में उतरा तो 17 साल और 111 दिन का देश के लिए खेलने वाला सबसे कम उम्र का खिलाड़ी था। अगले साल युरो कप में खेला और बुलंदियों को छूने लगा। कहा जाता है अगर उसे क्वाटर फाइनल में चोट ना लगी होती तो इंग्लैंड उस साल यूरो कप विजेता होता। उसके खेल में शक्ति और कला का बेहतरीन संगम था। वो निर्द्वन्द होकर खेलता था। उसने ब्रिटेन और यूरोप के सभी खिताब जीते। लेकिन ये उसकी सबसे बड़ी त्रासदी है कि वो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर सका।दरअसल उसने तीन विश्व कप के 11 मैचों के केवल एक गोल किया। 2014 में ब्राज़ील में पैराग्वे के खिलाफ।यही वो एक वजह है वो महान ब्रिटिश खिलाड़ी चार्लटन जिसके नाम एक विश्व कप है से एक पायदान नीचे खड़ा दिखायी देता है। 
                        भले ही उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर वो प्रसिद्धि ना मिली हो जिसकी हक़दार उसकी प्रतिभा थी पर ये तय है कि वो ब्रिटेन की ओर से खेलने वाला सबसे शानदार खिलाड़ियों में शुमार रहेगा। 2018 में रूस में तुम्हारी कमी महसूस होगी और तुम शिद्दत से याद आओगे। विदा रूनी।