Monday, 24 July 2017

महिला विश्व कप





             समय सबसे बड़ी शै है। वक़्त पर भला किसका ज़ोर चला है। इसे आज लॉर्ड्स के मैदान पर इतिहास बनाने उतरी भारतीय बालाओं से बेहतर भला  कौन समझ सकता है। जिस टीम को आप राउंड रोबिन में हरा चुके हों और फाइनल में भी लगभग 40 ओवरों तक मैच आप की पकड़ में हो कि अचानक अपनी अनुभवहीनता और हड़बड़ाहट में हार जाते हो तो आप केवल एक मैच ही नहीं हारते बल्कि एक स्वर्णिम इतिहास रचने का मौक़ा भी हाथ से गँवा देते हो। एक ऐसी हार जो आपको लम्बे समय तक सालती रहेगी।एक पल की गलती की खता सदियाँ भुगतती हैं कि कुछ ओवरों की गलतियां लम्बे समय तक टीसती रहेगी।
            इस सब के बावजूद हार निराशाजनक नहीं है। ये तस्वीर का एक पहलू है। आप सेल्फी लेती लड़कियों के चहरे ध्यान से पढ़िए। ये चहरे खुशी और आत्मविश्वास से लबरेज हैं। उन्हें खुद पर भरोसा है। भरोसा अपनी काबिलियत पर कि आने वाले समय में अपने भाग्य की इबारत वे खुद लिखेंगी कि दुनिया उस पर रश्क़ करेगी। हार के बावजूद ये भारतीय टीम ही है जिसने ऑस्ट्रेलिया,इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के वर्चस्व में सेंध लगाई है। ये भारतीय टीम ही है जो इन टीमों के अलावा दो बार फाइनल तक पहुंची। पिछले संस्करण में वेस्टइंडीज फाइनल में पहुँचाने वाली एक और टीम बनी थी।

                           भारत में महिला क्रिकेट की वो स्थिति नहीं है जो पुरुष क्रिकेट की है। हांलाकि पहला महिला टेस्ट मैच 1934 में खेला गया था ऑस्ट्रेलया और इंग्लैंड के बीच। पर भारत में 1973 में महिला क्रिकेट की नींव पडी जब वूमेंस क्रिकेट असोसिऐशन ऑफ़ इंडिया का गठन हुआ और 1976 में पहला टेस्ट मैच खेला वेस्ट इंडीज़ के विरुद्ध।तमाम दबावों के बाद 2006 में वूमेंस एसोसिएशन का बीसीसीआई में विलय हो गया। इस उम्मीद के साथ कि महिला क्रिकेट की दशा सुधरेगी। ऐसा हुआ नहीं। बीसीसीआई ने भी इस और कोई ध्यान नहीं दिया। ना उन्हें पैसा मिला,ना मैच मिले,ना बड़ी प्रतियोगिताएं मिली और ना आईपीएल जैसा कोई प्लेटफार्म। घरेलु क्रिकेट का भी कोई ढांचा विकसित हो पाया। इस सब के बावजूद अगर लडकियां विश्व पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराती हैं और एक ताकत बन कर उभर रहीं हैं तो ये उनकी खुद की मेहनत है,लगन है। ये उनके भीतर की बैचनी और छटपटाहट है अपने को सिद्ध करने की,साबित करने की।कोई गल नी जी। इस हार से ही जीत का रास्ता बनेगा कि 'गिरते हैं शह सवार मैदाने जंग में..।कम ऑन टीम इंडिया।

Sunday, 23 July 2017

इस बरसात

3. 
इस बरसात
तेरी याद
आँखों से बरसी बन
कतरा कतरा।


4.
इस बरसात
तेरी याद में 
इतनी बरसी आँखें
कि बेवफाई से लगे
जख्मोँ के समंदर भी
छोटे लगने लगे।  

5. 
ये सावन 
तेरी यादों का ही तो घर है 
यहां अक्सर वे बादलों की तरह घुमड़ती हैं 
और बिछोह की अकुलाहट की उष्मा से 
पिघल पिघल 
बूँद बूँद बरसती है।  

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Sunday, 16 July 2017

तुस्सी रियली रियली ग्रेट हो यार

तुस्सी रियली रियली ग्रेट हो यार



ये मानव जीवन की विडंबना ही है कि उसके मन में पुरातन के प्रति खासा रोमान होता है और स्थापित के प्रति अत्यधिक आग्रह,जबकि परिवर्तन उसके जीवन का शाश्वत सत्य होता है।यही विरोधाभास द्वन्द का आकार लेता है,पुराने और नए के बीच का द्वन्द-अपने को स्थापित करने का और अपने को साबित करने का।पुराने के पास अनुभव होता है,उसकी जड़े गहरी होती हैं। नए में वेग होता है,जोश होता है। नया पुराने को विस्थापित कर खुद को स्थापित करने की लगातार चेष्टा करता रहता है तो पुराना अपनी जगह स्थापित रहने के लिए नए का लगातार प्रतिरोध करता रहता है। संघर्ष लगातार चलता रहता है और एक समय आता है जब नया पुराने को विस्थापित कर खुद स्थापित कर देता है। फिर कुछ और नया आता है और इस तरह ये द्वन्द लगातार चलता रहता है। जीवन के हर क्षेत्र में और निसंदेह खेल में भी। आज आल इंग्लैंड क्लब के सेंटर कोर्ट में भी कुछ ऐसे ही जबरदस्त संघर्ष की उम्मीद थी। नए और पुराने के बीच। अनुभव और जोश के बीच। लेकिन ये एंटी क्लाइमेक्स था। 
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आज जब आल इंग्लैंड क्लब के सेंटर कोर्ट पर पुरुषों के फाइनल के लिए 35 वर्षीय रोजर फेडरर और  28 वर्षीय मारिन सिलिच जब मैदान में उतरे तो निसंदेह अधिकाँश खेल जानकार और खेल प्रेमी फेडरर की जीत के प्रति आग्रही ही नहीं बल्कि आश्वस्त भी थे। इसके अपने कारण भी थे जिनके चलते ऐसा होना स्वाभाविक था। पिछले साल विंबलडन में चोट के बाद वे कॉम्पटीटिव टेनिस से दूर रहे,फिटनेस पर ज़बरदस्त काम किया और तरोताज़ा होकर ऑस्ट्रेलियाई ओपन में शानदार जीत हासिल की। उसके बाद वे जानते थे कि क्ले कोर्ट उनका फोर्टे नही है, यहां शक्ति जाया करना बेकार है,इसलिए उन्होंने फ्रेंच ओपन छोड़ दिया। । उन्होंने इस समय का उपयोग विंबलडन की तैयारी में लगाया और फिटनेस पर ध्यान दिया। जिस तरह की टेनिस इन दिनों वे खेल रहे थे निसंदेह वे सबसे प्रबल दावेदार थे। हालांकि फैबुलस फोर के बाकी तीन भी उतने बड़े दावेदार थे। लेकिन बाकी तीन और फेड में जो अंतर था वो फिटनेस का था। जब मरे,जोकोविच और राफा खराब फिटनेस और चोट के चलते एक एक करके हारते चले गए तब एक फेड ही ऐसे थे जो अपनी फिटनेस और फॉर्म के चलते शानदार तरीके से जीत दर्ज़ करते जा रहे थे।लेकिन यकीं मानिये जब सब फेड पर दांव लगा रहे थे तो कुछ ऐसे भी लोग थे जो नए की तरफ बड़ी आस से टकटकी लगाए थे।कुछ लोग इस उम्मीद से भरे बैठे थे कि पिछले 15 सालों से विंबलडन के सेंटर कोर्ट पर फैबुलस 4 के चले आ रहे वर्चस्व को कभी तो चुनौती दी जा सकेगी। वे इस उम्मीद से भरे बैठे थे कि वो कभी शायद आज हो।और ये आस यूँ ही नहीं थी। इसके पीछे अपने तर्क थे। सिलिच ने इस पूरी प्रतियोगिता में शानदार खेल दिखाया था। भले ही फेड के खिलाफ उनका रेकॉर्ड 1-6 का हो,लेकिन आखरी दो मैच उनकी जीत की संभावना को जगाते थे। 2014 के यूएस ओपन के सेमीफाइनल में फेड को हराया था और पिछले साल यहीं विंबलडन में वे लगभग जीत ही गए थे। वे पहले दो सेट जीत चुके थे और चौथे सेट में तीन मैच पॉइंट उनके पास थे। तब भी हार गए। शायद उनका दिन नहीं था वो। कुल मिलाकर कड़े मुकाबले की तो उम्मीद की जा रही थी ही। 

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एक ऐसे मैच में जिसमे कड़े संघर्ष की उम्मीद की जा रही थी,ऐसे संघर्ष की जो इस साल के ऑस्ट्रेलियाई ओपन के फाइनल वाली ऊंचाइयों को छुए,सब कुछ उम्मीद के उलट हुआ। सिलिच ने शुरुआत बेहतर की 2-2 की बराबरी की पर तीसरे ही गेम में सर्विस तुड़वा बैठे और उसके बाद दो बार और। सेट हारे 3-6 से। दूसरे सेट में 0-3 से पिछड़ गए। यहां पर उन्हें मेडिकल ऐड की ज़रुरत पडी। खेल बीच में ही ख़त्म हुआ चाहता था। सिलिच ने हिम्मत दिखाई, मैच पूरा करने की औपचारिकता की। फेड ने 6-3,6-1,6-4 से मैच जीता। आठवीं बार विम्बलडन और 19वां ग्रैंड स्लैम खिताब जीतकर इतिहास के पन्नों में अमर हो गए सार्वकालिक महानतम एथलीट के रूप में।
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ये एक ऐसी जीत थी जिसे शायद फेड भी पसंद नहीं करेंगे। लेकिन खेल में ऐसा होता है। फिटनेस आधुनिक खेलों का आवश्यक अंग है। अगर आपको जीतना है,अव्वल रहना है तो फिट रहना ही होगा। इस उपहार में मिली जीत से फेड की महानता पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। जैसे राफा क्ले कोर्ट के बेताज बादशाह हैं,ग्रास कोर्ट पर अब उन्हें कोई छू नहीं सकता। उन्होंने पीट सम्प्रास की स्मृतियों को धुंधला दिया। वे सम्प्रास जिन्होंने अपने शानदार सर्व और वॉली खेल से विंबलडन के हरी घास के मैदान पर सात बार जीत दर्ज़ कर सफलता के नए प्रतिमान गढ़े थे। फेड की ये उपलब्धियां इसलिए भी शानदार हैं कि ये उन्होंने उस उम्र में हासिल की हैं जब अधिकांश खिलाड़ी खेलने की सोचता भी नहीं है। वे कुछ दिन में 36 के हो जाएंगे। उन्होंने अपना आखरी ग्रैंड स्लैम 2012 में जीता था विंबलडन। उसके बाद का समय उनकी असफलताओं का समय था। मरे,राफा और जोकोविच के सामने लगता रहा कि उनका समय समाप्त हो गया है। अब अक्सर उनसे संन्यास के बारे में सवाल किये जाने लगे। पर उन्होंने संयम और धैर्य बनाये रखा,हिम्मत नहीं हारी,खेलते रहे। इस साल शानदार वापसी की। पहले ऑस्ट्रेलियन और अब विंबलडन जीत कर खेल इतिहास की नयी इबारत लिख दी।
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 ओये फेड!तुस्सी रियली रियली ग्रेट हो यार! तेनू लख लख सलाम! 














विंबलडन की नई रानी



विंबलडन की नई रानी 
            


                'इतिहास अपने को दोहराता है' बहुत सारे लोग इस उक्ति को आंशिक सत्य ही मानते हैं क्योंकि ऊपर से समान दिखाई पड़ने के बावजूद दो घटनाएं अपनी मूल प्रकृति में काफी अलग होती हैं। लेकिन आज विंबलडन के सेंटर कोर्ट पर जो कुछ घट रहा था वो इस उक्ति को अक्षरशः सत्य सिद्ध कर रहा था।उस पर संयोग ये कि 23 साल पहले जो कुछ उस्ताद ने किया था उसे आज शागिर्द दोहरा रहा था। याद कीजिये 1994 का विम्बलडन। 37 वर्षीया चेक गणराज्य की मार्टिना नवरातिलोवा ओपन एरा में किसी ग्रैंड स्लैम के फाइनल में पहुँचने वाली सबसे उम्रदराज़ खिलाड़ी थी जो अपना दसवां विंबलडन खिताब जीतने का दावा पेश कर रहीं थीं। उनके सामने थीं 22 वर्षीया स्पेन की कोंचिता मार्टिनेज़। कोंचिता ने नवरातिलोवा की हसरत पूरी नहीं होने दी। उन्होंने नवरातिलोवा को 6-4,3-6 ,6-3 से हराकर उनका सपना चूर चूर कर दिया।अनुभव पर युवा जोश भारी पड़ा था। आज एक बार फिर उसी सेंटर कोर्ट पर 37 वर्षीया अमेरिकी वीनस विलियम्स सबसे उम्रदराज़ खिलाड़ी के रूप में अपना छठवां विंबलडन खिताब जीत कर ना भुला देने वाली रोमानी दास्ताँ लिख देना चाहती थीं।उन्होंने अपना पिछला ग्रैंड स्लैम 9 साल पहले जीता था।उनके रास्ते में एक बाधा थी। एक बार फिर स्पेन की ही युवा 23 वर्षीया बाला गार्बिने मुगुरूजा।एक बार फिर किंवदंती बनाते बनते रह गयी। अनुभव जोश से हार गया और वीनस मुगुरुजा से। संयोग ये भी था कि मुगुरुजा के रेगुलर कोच सैम सुमिक विंबलडन में नहीं थे और उनकी कोच के रूप में काम कर रही थी कोंचिता। उस्ताद की निगेहबानी में शागिर्द उसी का कारनामा दोहरा रहा था। विंबलडन को एक नया चैम्पियन मिला और 'वीनस रोजवाटर डिश' चूमने वाले नए होठ और उठाने वाले दो हाथ। और हाँ ग्रैंड स्लैम के फाइनल में दोनों विलियम्स बहनों-सेरेना और वीनस को हारने वाली पहली खिलाड़ी भी। 
                    दरअसल ये मुकाबला दो आक्रामक शैली वाले दो खिलाड़ियों के बीच था। अंतर उम्र का था। जिस समय वीनस ने पहला विंबलडन जीता था उस समय मुगुरुजा मात्रा 6 साल की थीं। जिस खिलाड़ी को वो खेलता देखते बड़ी हुई थीं आज उनसे दो दो हाथ करने को तैयार थी।दोनों की ताक़त बेसलाइन से तेज आक्रामक वॉली थी हांलाकि दोनों ही नेट पर भी समान रूप से खेल को नियंत्रित करने में सक्षम। पहले सेट में दोनों में कड़ा संघर्ष हुआ भी। 4-4 गेम जीत कर दोनों बराबरी पर। वीनस ने अपनी पांचवी सर्विस बरकरार रखी और मुरगुजा की पांचवी सर्विस पर दो ब्रेक पॉइंट हासिल किए। यहां वीनस चूक गयीं। मौके का फ़ायदा नहीं उठा पाईं। मुगुरुजा ने ना केवल दोनों ब्रेक पॉइंट बचाए बल्कि पांचवां गेम जीत कर 5-5 की बराबरी की। इसके बाद मुरगुजा के शानदार वोली और फोरहैंड शॉट्स और उनकी चपलता का वीनस के पास कोई जवाब नहीं था। अगले दो गेम जीत कर पहला सेट 7-5 से अपने नाम किया बल्कि अगलेसेट में लगातार तीन बार वीनस की सर्विस ब्रेक कर 6-0 सेट जीतकर चैंपियनशिप अपने नाम की। 
                 निसंदेह इस जीत ने स्पेन वासियों की राफा की हार से मिली टीस को कुछ राहत पहुंचाई होगी। मुगुरुजा को बहुत बहुत बधाई। 

Thursday, 13 July 2017

ये दिल


ये दिल


अक्सर 
तुम्हारे 
अहसासों की मखमली दूब पर
विचरते हुए
आँखों से फैले उम्मीद के नूर में 
मासूम खिलखिलाहट से निसृत राग भूपाली 
सुनते हुए 
होठों से झर कर 
यहां वहां बिखरे शब्दों के 
रेशमी सेमल फाहों को 
चुनने में दिन यूँ 
लुट जाता है
कि अभी तो बस एक लम्हा गुज़रा 
और रात घिर आई 
कि दिल के आसमां पर  
तारों से टिमटिमाते सपनों की 
महफ़िल सज गयी है 
ये नादाँ दिल है 
कि डूब डूब जाता है 
बार बार
यादों के समंदर में । 
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ये हसीं रात हो के ना हो 

Thursday, 29 June 2017

उम्मीद का चाँद


उम्मीद का चाँद
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जब जब मैंने चाहा  
कोई एक हो 
सावन बन बरस
भिगा दे तन मन
वो रूठा मानसून बन गया 
जब जब चाहा
कोई एक हो
बन धूप 
ठिठुरन से राहत दे 
वो शीत लहर बन गया
जब जब मैंने चाहा  
कोई एक हो 
छाया बन 
ताप से राहत दे 
वो लू सा चलने लगा 

पर हर नाउम्मीदी के चरम पर 
एक वो आता है 
कि बिन मौसम बरसात सा बरस 
मिटा देता अभाव के हर सूखेपन को 
कि सूरज बन टँक जाता मन के आकाश पर  
उष्मा सा फ़ैल
हर लेता निराशा की ठिठुरन 
कि समीर सा बहने लगता 
और सुखा जाता दुःख के हर स्वेद कण को 

वो जानता है 
कि नाउम्मीदी में उम्मीद का चाँद बन जाने से बेहतर
कहीं कुछ नहीं होता। 
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आ बैठे चल चर्च के पीछे 

Monday, 26 June 2017

ये मोह मोह के धागे



                                 ये मोह मोह के धागे
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                     जब प्रसिद्द डच खेल पत्रिका 'फ़ुटबाल इंटरनेशनल' रोनाल्डो की तो बात ही छोड़िए माराडोना और पेले से आगे लियोनेस मेस्सी को सार्वकालिक महानतम फुटबॉलर बता रही थी तो मैं इस बात को प्रकारांतर से इस तरह समझ रहा था कि मेस्सी आगे आने वाले समय में एक मिथक के रूप में याद किये जाएंगे और उनसे जुडी हर बात किंवदंतियों के रूप में आने वाली पीढ़ी देखेगी और समझेगी। तो क्या भविष्य में उनकी प्रेम कहानी भी पौराणिक या लोक आख्यानों की किसी अमर प्रेम कथा की तरह लोगों के दिलो दिमाग पर कब्जा जमाए होगी।मेस्सी की प्रेम कहानी ? हाँ लियो और अंतोनेला रोक्कुज़ो की प्रेम कहानी।
                 असाधारण प्रतिभा वाले अद्भुत खिलाड़ी के किसी प्रसिद्ध मॉडल या सेलिब्रिटी से प्रेम की कहानी नहीं।आस पड़ोस की गली मोहल्ले के किसी लडके-लड़की की कहानी जो साथ साथ रहते,हँसते,बोलते,खेलते,जीते जन्मती है,पनपती है और एक खूबसूरत आकार में ढल जाती है।हर उस इंसान की अपनी कहानी है जिसमें एक दिल धड़कता है।एक साधारण सी प्रेम कहानी जो असाधारण रूप से साधारण है और इसीलिए असाधारण बन जाती है।एक ऐसी प्रेम कहानी जो एक दूसरी प्रेम कहानी के सामानांतर चलती जाती है एक दूसरे की आँखों में आँख डाले भी और हाथों में हाथ लिए भी। लियो प्रेम के द्वैत को जीता जाता है। बचपन के दो प्रेम एक साथ।फुटबाल से प्रेम और बचपन की साथी से प्रेम।
                          ये कहानी दक्षिणी अमेरिकी देश अर्जेंटीना के मध्य प्रांत सांता फे के मध्यमवर्गीय चेतना वाले सबसे बड़े शहर रोसारियो में जन्मती है। इस कहानी का एक किरदार साधारण से मज़दूर और सफाईकर्मी दंपत्ति के तीन बेटों और एक बेटी में से एक लियोनेल आंद्रेस मेस्सी है तो दूसरा किरदार एक सुपरमार्केट की मालकिन की बेटी अंतोनेला रोक्कुज़ो।लियो प्रतिभा संपन्न था। पांच वर्ष की उम्र में स्थानीय ग्रैंडोली क्लब में शामिल होता है और जल्द ही नेवेल्स ओल्ड बॉयज में। इसी दौरान एक और फुटबॉलर लुकास स्कैग्लिआ से दोस्ती होती है और स्कैग्लिआ के माध्यम से उसकी कजिन अंतोनेला रोक्कुज़ो से। पराना नदी के खूबसूरत पश्चिमी किनारे  पर खेलते कूदते जब दोनों बचपन से किशोरावस्था की और बढ़ रहे थे तो वे एक दूसरे के दिल की और भी कदम बढ़ा रहे थे। पर बाल सुलभ संकोच भी रहा होगा और फिर लियो तो बहुत ही शर्मीले स्वभाव का था। दिल की बात ज़ुबाँ पे आती तो कैसे। फिर हर प्रेम कहानी की तरह एक और मोड़ आना था। विछोह का। लियो को बीमारी होती है-ग्रोथ हार्मोन्स डेफिशिएंसी की। खर्चा बड़ा था जिसे ना परिवार उठा सकता था और ना क्लब। ऐसे में बार्सीलोना के खेल निदेशक कार्ल रिक्सेस ने लियो की प्रतिभा को पहचाना,उसके साथ अनुबंध किया और उसके इलाज का प्रबंध भी। परिवार यूरोप आ गया।ये सन 2000  था। दो दोस्त बिछड़ रहे थे। लियो के मन में अंतोनेला के लिए गहरी आसक्ति थी। वो इसे भले ही जुबां से ना कह पा रहा हो पर उसने एक पत्र लिखा था और उसमें  लिखा 'तुम देखना एक दिन तुम मेरी गर्लफ्रेंड बनोगी'।ये नियति थी। भविष्य में ऐसा होना था और हुआ। दुनिया नई सदी में प्रवेश कर रही थी। तमाम चीजों के साथ दुनिया को अब तक का सबसे बड़ा फुटबॉलर भी मिलना था।
                            लियो और अंतोनेला के रास्ते अलग हो चुके थे। लेकिन जो आकर्षण लियो के मन में अंतोनेला के लिए था उसे उससे कैसे अलग किया जा सकता था। लियो बार बार अपने शहर लौटता रहा। नियति में मिलना था तो था। चार साल बाद 2004 में जब लियो रोसारियो आया तो अंतोनेला अपने मित्र की मृत्यु से अवसाद में थी। लियो ऐसे में उस मित्र से मिलने गया जिसे वो बचपन से चाहता था और अपनी गर्लफ्रेंड बनाने का सपना देखा था। बचपन का वो प्रेम जो मन के किसी कोने में समय की बेरुखी से अलसाया पड़ा था कि दुःख की इस भीगी भीगी धरती पर उछाह लेने लगा। अलसाया प्रेम चैतन्य हो आया था। अब ये किसी के रोके रुकने वाला ना था। अब अंतोनेला भी बार्सीलोना आ जाती है। पराना नदी के किनारे जिस प्रेम नीर का बहाव शुरू हुआ था वो मेडिटेरियन सी के किनारे अपने अंजाम को आतुर था। तरलता ठोस रूप लेने लगी थी।सन 2012 का जून का महीना था। 2 तारीख थी। अर्जेंटीना इक्वेडोर के विरुद्ध खेल रहा था। जैसे ही लियो ने दूसरा गोल किया। उसने गेंद को अपनी शर्ट के अंदर डाला और दुनिया के सामने घोषणा की कि वे जल्द पिता बनने जा रहे हैं। ठीक पांच महीने बाद बेटे का जन्म हुआ।11 सितम्बर 2015  को दूसरे बेटे का जन्म हुआ। बचपन का वो आकर्षण जो छोटे से सोते के रूप में मन में बह निकला था अब समुद्र सा विशाल हो चला था। एक कमज़ोर सा आकर्षण ठोस आकार ग्रहण कर चुका था और परिपक्व भी हो चला। उसे एक नाम मिलना चाहिए था। ना भी मिलता तो कोई बात नहीं थी। दोनों ने शादी के बंधन में बंधने का निश्चय किया। 30 जून को वे शादी के बंधन में बंध जाएंगे। लियो रोक्कुज़ो को शादी बहुत बहुत मुबारक हो।और हाँ हम आगे आने वाले समय में बताएँगे कि ऐसा कुछ हमारे समय में घटित हुआ था। 
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ये इश्क़ नहीं आसाँ ये तो समझ लीजिये 
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है!