Wednesday, 25 September 2013

रिश्ता




जब भी गाँव जाता हूँ मैं

मिलना चाहता हूँ सबसे पहले

कृशकाय वृद्ध महिला से

जो रोज़ सुबह आती है दरवाज़े पे

ओढ़नी से काढ़े लंबा सा घूंघट

और लिए एक टोकरा सर पर और कभी कमर पर टिकाये  

खटखटाती है सांकल

ले जाती है दैनंदिन का कूड़ा

इसे गाँव कहता है चूढी(जमादारिन )

पर माँ मेरी कहती है 'बीवजी '

मैं बुलाता हूँ अम्मा

देखते ही मुझे जब  पूछती है वो

"कैसा है बेट्टा"

तो मन में बजने लगते हैं वीणा के तार

 कानों में घुल जाता है  शहद

दुनिया भर की माओं का प्यार उमड़ आता  है इस एक वाक्य में    

तब मेरी बेटी  पूछती है  मुझसे

किस रिश्ते से ये तुम्हारी अम्मा लगती हैं

तो मैं समझाता हूँ उसे

कि बहुत से रिश्ते गाँव की रवायतें बनाती हैं

जो अब मर रहीं हैं

और ये ऐसे रिश्ते हैं शब्दों  में बयां नहीं हो सकते

उन्हें सिर्फ और सिर्फ महसूसा जा सकता है।

स्त्री


वो हमेशा से दो सीमांतों पर ही रहती आयी  है  

इसीलिए हाशिये पर बनी हुई है 

वो या तो  "यत्र नार्यस्ते पुज्यन्तू....."वाली  देवी  है 

जौहर और सती होकर"देवत्व"को प्राप्त करती हैं  

या फिर दीन हीन होकर रहती है 

ढोल और पशु के समान 

ताड़ना की अधिकारी बनती है 

आखिर कब वो संतुलन के केंद्र में आएँगी 

केवल मनुष्य कहलाएंगी 

अपनी  समस्त

सम्वेदनाओ,

भावनाओं,

इच्छाओं,

राग विरागों,

कमियों और खूबियों से लैस 

हाड मांस का साक्षात्

साधारण मानव बन पाएगी। 


ख़तरा आ चुका है






ट्रेन के इंतज़ार में खड़ा स्टेशन पर

कि अचानक एक छोटा सा लड़का सामने आया

मांगने के लिए  हाथ बढ़ाया 

गरीबी को समझाया 

भूख की दुहाई दी 

माँ की बीमारी का वास्ता दिया 

और खूब ही गिडगिडाया 

पर मेरे आदर्शवाद ने उसकी सारी  दलीलों को ठुकराया 

मैं बोला पढ़ो लिखो और काम करो 

उसने पूछा आपके साथ चलूँ 

मैं सकपकाया और जल्दी से एक नोट उसके हाथ थमाया

नोट थामते ही उसकी आँखे बोल उठी 

 मेरी तरह अपने स्टैंड पर दृढ रहो 

और सफलता के लिए लगातार प्रयत्न करो

 सफलता मिलती है 



फिर वो  गया और जल्दी ही पास की स्टाल पर प्रकट हुआ 

 पेप्सी  और चिप्स का  पैकेट हाथ में लिए 

उसने कुछ घमंड और उपेक्षा भरी नज़रों से देखा 

मानो कह रहा हो उपभोग करना सिर्फ तुम्हारा अधिकार नहीं 

उपभोग को मैंने भी अच्छी तरह से सीख  पढ़ लिया है 



मैं सिहर उठा 

पानी सर से ऊपर जा चुका है 

शत्रु निकट से निकटतर आ चुका है 

बाज़ार का जादू उसके ही सर चढ़ कर बोल रहा है 

और दिल के रस्ते दिमाग को जकड चुका है 

जिसके लिए कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो रची गयी 

और बन्दूक की नली से क्रांति करी गयी। 

Wednesday, 18 September 2013

फ़ुटबाल_और कितने नीचे

                      12 सितम्बर को जब अर्जेंटीना ,इटली ,हालैंड ,अमेरिका और कोस्टारिका जैसी टीमें 2014  के विश्व कप फुटबाल के लिए क्वालीफाई कर रही थीं उसी समय काठमांडू नेपाल के दशरथ रंगशाला स्टेडियम में भारतीय फ़ुटबाल की दुर्दशा की  एक और इबारत लिखी जा रही थी। सैफ फ़ुटबाल टूर्नामेंट के फाइनल में अफगानिस्तान ने भारत को 2 -0 से हरा दिया।  दो साल पहले भारत ने अफगानिस्तान को 4 -0 से हरा कर ये टूर्नामेंट जीता था। इस क्षेत्रीय टूर्नामेंट में विश्व की एकदम निचली रैंक वाली टीमें भाग लेती हैं।इस पूरे टूर्नामेंट में  भारत का बहुत ही लचर प्रदर्शन रहा। लीग स्टेज में पाकिस्तान को 1-0 से हराया,बांग्लादेश से 1-1 से ड्रा खेला,और नेपाल से 1-2 से हारी। किसी तरह सेमीफाइनल में पहुँची जहाँ मालदीव को 1-0 से हराया।
        दक्षिण एशियाई देशों के इस टूर्नामेंट में भाग लेने वालों देशों में भारत सबसे बड़ा और सबसे अधिक संसाधनों वाला देश है। लेकिन सीमित संसाधनों वाले इन छोटे देशों ने भारत की अपेक्षाकृत बेहतरीन फुटबाल खेली। विशेष तौर पर अफगानिस्तान की तारीफ करनी होगी जिसने सीमित संसाधनों और आतंकवाद से जूझते हुए भी शानदार खेल का प्रदर्शन किया और पिछले दो तीन सालों में खेलों में शानदार प्रगति की। टूर्नामेंट से पहले उसकी फीफा रैंकिंग 139 थी जबकि भारत की रैंकिंग 145 थी। अफगानिस्तान टीम के कम से कम 7 खिलाडी जर्मनी और अमेरिका की निचली फुटबॉल लीग में  खेलते हैं। ये बात काबिलेतारीफ़ है कि अफगानिस्तान इन परिस्थितियों में भी खेलों में इतनी प्रगति कर रहा है। इस हार के बाद फीफा रैंकिंग में भारत 10 स्थान नीचे खिसक कर 155 वें और अफगानिस्तान 7 स्थान ऊपर चढ़ कर 132 वें स्थान पर आ गया है।
      भारतीय फुटबॉल की ऐसी स्थिति हमेशा नहीं थी। हॉकी की तरह फ़ुटबाल का भी एक  स्वर्णिम इतिहास रहा है।भले ही वो हॉकी जितना चमकदार ना हो। ये समय है 1948 से 1964 तक का। 1948 का लन्दन ओलिंपिक। पहली बड़ी प्रतियोगिता थी जिसमें भारत ने भाग लिया। यहाँ उनका मुकाबला फ्रांस से था। वे 1-2 से मैच हारे जरूर । पर दर्शकों का दिल जीत लिया। ज्यादातर खिलाडी नंगे पैरों से खेल रहे थे। पर शानदार खेल दिखाया। यदि उन्होंने दो पेनाल्टी को गोल में तब्दील कर दिया होता तो कहानी कुछ और होती। इसी समय सैयद अब्दुल रहीम भारतीय फ़ुटबाल परिदृश्य पर उभरते हैं। कोच के रूप में उन्होंने भारतीय फुटबॉल को नई ऊँचाई तक पहुँचाया। 1951 में पहले एशियाई खेल नई दिल्ली में आयोजित किये गए। यहाँ टीम ने स्वर्ण पदक जीता। क्वार्टर फाइनल में इंडोनेशिया को 3-0 से और सेमी फाइनल में अफगानिस्तान को 3-0 से हराया। फाइनल में ईरान को 1-0 हराकर स्वर्ण पदक जीता। मेवालाल साहू जीत के नायक रहे। उन्होंने सर्वाधिक 4 गोल दागे। लईक, वेंकटेश ,अब्दुल लतीफ़ और मन्ना टीम के अन्य सितारे थे। इसके बाद भारतीय फुटबाल की एक नई गाथा लिखी जानी थी। सन 1956 मोंट्रियाल ओलिंपिक। पहला मैच - हंगरी से वॉक ओवर मिला। दूसरा मैच क्वार्टर फाइनल। मेजबान ऑस्ट्रेलिया को 4-2 से हराया। नेविल डीसूजा मैच के हीरो - हैट ट्रिक बनाने वाले पहले एशियन बने और इस तरह ओलिंपिक फुटबॉल के सेमी फाइनल में पहुँचने वाली पहली एशियाई टीम बनी। सेमी फाइनल यूगोस्लाविया से। पहला हाफ गॉल रहित। दूसरा हाफ - 55वें मिनट में नेविल डिसूजा ने भारत को बढ़त दिलाई। पर इस बढ़त को कायम न रख सके। अंततः 4-1 से हारे। प्ले ऑफ मैच में बुल्गारिया से 3-0 से हारे और चौथा स्थान प्राप्त किया। 1951 के बाद 1962 के जकार्ता एशियाई खेलों में भारतीय खिलाडियों ने शानदार खेल दिखाया और पुनः स्वर्ण पदक जीता। हाँलाकि लीग स्टेज में साउथ कोरिया से 0-2 से हारे पर थाईलैंड को 4-1 से और जापान को 2-0 से हरा कर सेमी फाइनल में प्रवेश किया जहाँ साउथ विएतनाम को 3-2 से हराया। फाइनल में साउथ कोरिया को 2-1 से हरा कर न केवल स्वर्ण पदक जीता बल्कि लीग में हार का बदला भी ले लिया। इसके बाद साल 1964 तीसरा  ए.एफ.सी.एशियन कप इस्रायल में आयोजित हुआ। यहाँ रजत पदक जीता। चुन्नी गोस्वामी, इन्दर सिंह और सुकुमार जैसे खिलाड़ी इस टीम के सदस्य थे। यहीं से भारतीय फुटबॉल के पतन की कहानी शुरू होती है जो सितम्बर 2012 में चरम पर पहुँच गयी जब भारत फीफा रैंकिंग में 169वें स्थान पर आ गया। 1964 में रजत पदक जीतने के बाद केवल दो बार  ए.एफ.सी.एशियन कप के बमुश्किल क्वालीफाई कर सकी 1984 और 2011 में। जबकि एशियाई खेलों में1982 में नई दिल्ली  में क्वार्टर फाइनल तक पँहुचे। इसके अतिरिक्त और कोई बड़ी उपलब्धि भारतीय फुटबॉल की नहीं है।
                भारत में फुटबॉल की खराब होती स्थिति को सुधारने के कुछ प्रयास भी हुए। पर कोई विशेष नतीजा नहीं निकला। 1982 में एक अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट नेहरु कप शुरू किया गया  जो अभी तक जारी है। हाँलाकि ये 1998  से 2006 तक स्थगित रहा। 1987 में टाटा स्टील ने जमशेदपुर में टाटा फुटबॉल अकादमी शुरू की। आल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन ने भी गोवा ,मुंबई और कोलकाता में तीन रीजनल फुटबॉल अकादमी और गोवा में एक इलीट फुटबॉल अकादमी स्थापित की है। 1996 में ए.आई.एफ.एफ. ने पहली  फुटबॉल लीग शुरू की।  2006 में  इसे समाप्त कर आई लीग की स्थापना की गयी। आई लीग में टॉप 14 टीम खेलती हैं। हर साल अंतिम दो टीम आई लीग (डिवीज़न दो) में आ जाती हैं और डिवीज़न दो की 21 टीमों में से टॉप दो टीम आई लीग में शामिल हो जाती हैं। इसी साल ए.आई.एफ.एफ. आई पी एल की तरह की एक और लीग शुरू करने जा रही है। विदेशी कोच भी नियुक्त किये गए। 2002 से 2005 तक स्टीफेन कांतेस्ताइन ,2006 से 2011 तक बॉब होटन और 2012 में विम कोवरमेंस कोच बने। लेकिन इन प्रयासों का कोई नतीज़ा निकलता दिखाई दे रहा है। स्थिति जस की तस बनी हुई है। 

Sunday, 15 September 2013

क्यों जाता हूँ गाँव



शहर में मची आपा-धापी से ऊब कर 

बार-बार लौट जाता हूँ गाँव  

खेत खलिहानों की हरियाली को निहारने

हल चलाने की कोशिश करने 

रहट चलाने

झोंटा बुग्गी हाँकने 

होल़े भुनकर खाने 

कोल्हू मे बनते ताज़े गुड को चखने

छप्पर पड़े घर में दुबकने

बड़े से घेर में उछल कूद मचाने

घी-दूध की नदियो में मचलने 

रागिनियाँ सुनने 

 सांग देखने 

चौपाल पर बैठने 

हुक्का गुडगुडाते बाबा से नसीहते सुनने 

अखाड़ो  में भाई बन्धुओ को जोर आजमाइश करते देखने 

बच्चों के साथ कंचे और गुल्ली डंडा खेलने 

कली पीती दादी माँ का दुलार पाने 

चरखा कातती ताई-चाची से आशीर्वाद  लेने  

साँझी को सजाने

बरकुल्लों को होलिका पर अर्पण करने

यारों से मिलने

बचपन की यादों के कोलाज़ सजाने

और भी ना  जाने क्या क्या करने ,देखने,सुनने और गुनने



लौट आता हूँ मैं गाँव बार-बार 

क्योंकि मैं भूल जाता हूँ 

कि अब हो रहा है भारत निर्माण 

और बदल रही है गाँव की तस्वीर

घरों की जगह ईंट सीमेंट से बने दड़बों ने ले ली है

 गाँव बन गया है पॉश कालोनियों से घिरा  टापू

जहाँ विकास की रोशनी पहुँचती है थोड़ी बहुत छनकर

 मैकाले की फ़िल्टरेशन थ्योरी की तरह

पर और बहुत सारी ग़ैर ज़रूरी चीजे पहुँच जाती आसानी से

बिना किसी रोकटोक के भरपूर

 पब्लिक स्कूल उग आये है कुकुरमुत्तों की तरह

जहाँ दुखहरन मास्टरजी नहीं ,पढ़ाती हैं टीचरजी

दारु के ठेके भी  देर रात तक रहते हैं गुलज़ार

कुछ शोह्देनुम लोग भी दिखाई पड़ने लगे हैं गाँव में

चौपालों पर तैरने लगे हैं राजनीतिक षड़यंत्र

गलियों में कुत्तों के साथ साथ घूमने लगे है माफिया

और इन्ही लोगों के साथ-साथ चुपके से बाज़ार ने कर ली है घुसपैठ




फिर भी लौट लौट जाता हूँ गाँव

जैसे बाबा हर बार अपने बेटे के पास से लौट आते थे गाँव

जीवन की सांध्य बेला में पिताजी को भी नहीं रोक सकी शहर की

कोई सीमा

वैसे ही

जड़ों से उखड़ने के बाद  शहर की भीड़ के बियावान में गुम

अपनी पहचान की तलाश में

अपनी जड़ो की और लौटता हूँ मैं भी

उन्हें सींचने और बनाने मजबूत

लौटता हूँ गाँव बार बार। 


(                                               (भूमि अधिग्रहण के बाद उजाड़ पड़ा गाँव )

बेटी



मेरे आँगन में गौरय्या

फुदकती चहकती

करती तृप्त अपनी स्वर लहरियों से

चाह उसमें उड़ने की उन्मुक्त 

आकाश में

पंख फैलाकर उड़ती है अनंत गगन में



पर लौट आती है

लहुलुहान होकर

गिद्धों से भरा पड़ा  है पूरा आसमान

जिनकी (गिद्ध )दृष्टि क्षत विक्षत देती है उसकी आत्मा  को

तार तार कर देती हैं उसकी सारी उमंगें 

पस्त कर देती हैं उसके सारे हौंसले



वो लौटती है हाँफती  हाँफती

आ बैठती है मेरे कन्धे  पर

उदास उदास सी  

आँखों में प्रश्न लिए देखती है मेरी और

क्या होगा मेरा जब तुम नहीं रहोगे।

नेता (मुज़फ्फरनगर के दंगों के संदर्भ में )




सूअर है  

आदत जाती नहीं गंदगी फ़ैलाने की 

और जब गंदगी फ़ैल जाती है चारों ओर 

और सारा वातावरण भर जाता है सडांध  से 

तो गिरगिट की तरह रंग बदलकर 

बन जाता है कुत्ता 

और अपनी पूँछ से साफ करने कोशिश करता है उस गंदगी को 

जो उसने फैलाई थी 

हिलाता है दुम 

दिखाता है स्वामीभक्ति 

मानो वो ही है उनका रक्षक 

ताकि सौंप दी जाये उसे सत्ता 

साँप की तरह कुंडली मारकर करेगा उसकी रक्षा।


Sunday, 1 September 2013

साइना दा जवाब नी

         
         इंडियन बैडमिंटन लीग का पहला संस्करण हैदराबाद हॉटशॉट्स ने अवध वारियर्स को आसानी से ३ -१ सेहराकर जीत लिया। मोटे तौर पर देखा जाए तो ये पहला संस्करण काफ़ी हद सफल रहा। इस पूरी प्रतियोगिताके दौरान बड़ी संख्या में दर्शक मैच देखने आए और वो भी टिकट खरीद कर। भारत  में ऐसा सामान्यतयाकेवल क्रिकेट में ही होता है. अच्छा खेल देखने को मिला और कुछ बड़े अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़िओं को खेलते देखने  का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। लेकिन इतने भर से ही ये मान लेना कि इससे भारतीय बैडमिंटन में कोई बड़ा बदलाव आने वाला है, ये कहना अभी जल्दबाजी ही होगी। क्रिकेट में आईपीएल की सफलता के बाद
पहले हॉकी में और अब बैडमिंटन में लीग की शुरुआत हुई है। ये लीग खेलों को बहुत फ़ायदा पहुचाएंगे इसबारे में आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता। जिस लीग की तर्ज़ पर ये लीग शुरू की गयी हैं खुद उस आइपीएल ने क्रिकेट का कितना भला किया है, ये सभी जानते हैं। हाँ ये सफल जरूर रही है, पर उससे ज्यादा उसके साथ विवाद जुड़े हैं। इसके छठे संस्करण ने तो क्रिकेट की  विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया था। मुझे कोई भी एक बड़ा नाम याद नहीं आता जो आइपीएल ने भारतीय क्रिकेट को दिया हो। दूसरी बात ये कि ये लीग मुख्यतया इनके मालिकों और प्रायोजकों के लाभ अर्जन के लिए आयोजित-प्रायोजित की जाती हैं  और इस प्रक्रिया में खेलों का फायदा हो जाए तो उनके लिए सोने पे सुहागा। इंडियन बैडमिंटन लीग में महिला डबल्स को केवल इसलिए ड्राप कर दिया कि इससे टीम मालिकों को नुकसान हो रहा था। फलतः अश्विनी और ज्वाला गुट्टा जैसी शीर्ष खिलाड़ियो को आधा दाम मिला। इस एक उदाहरण से ये जाना जा सकता है कि प्राथमिकता क्या है। तीसरे इसमें मनोरंजन का तत्त्व प्रमुख होता है। न तो खिलाड़ी और न ही खेल आयोजक खेल के स्तर के प्रति बहुत गंभीर होते हैं। इस तरह की प्रतियोगिताओं में खिलाड़िओं में खेल के प्रति वो गंभीरता ,लगन ,प्रतिबद्धता नहीं आ सकती जैसी कि देश के लिए खेलते हुए आती है और जब खेल उचांई को नहीं छुएगा तो खेल का स्तर कैसे ऊँचा होगा।
                खैर मैं बात बैडमिंटन लीग की नहीं बल्कि साइना नेहवाल की करना चाहता हूँ। साइना ने इस पूरी प्रतियोगिता के दौरान शानदार खेल का प्रदर्शन किया और वे एकमात्र ऐसी खिलाडी रही जिन्होंने एक भी मैच नहीं हारा। ये बात इसलिए अधिक महत्त्वपूर्ण है कि लीग शुरू होने से पहले साईना को चुका हुआ करार कर दिया गया था और पी वी सिन्धु को हाईलाइट किया जा रहा था। इस लीग में साईना और सिन्धु के बीच होने वाले मुक़ाबले को मीडिया ने जबरदस्त हाइप दिया था। ये बात विश्व बैडमिंटन प्रतियोगिता के बाद तब शुरू हुई जब फेवरिट साइना सेमीफ़ाइनल में नहीं पँहुच सकी और सिंधु ने सेमीफाईनल में प्रवेश कर किसी भी भारतीय महिला खिलाडी द्वारा इस प्रतियोगिता का पहला पदक जीता। इस पूरी प्रतियोगिता में सिन्धु ने शानदार खेल दिखाया और  ऊँची रैंक की दो-दो चीनी खिलाड़िओं  को हराया। लेकिन किसी एक प्रतियोगिता या मैच के आधार पर किसी खिलाडी या टीम को सफल घोषित कर देना या खारिज़ कर देना ठीक नहीं। ये बात सही है कि प्रशंसक अपनी फेवरिट खिलाडी या टीम को हमेशा जीतते हुए देखना चाहते हैं और हारने  पर निराश होकर आलोचना करते हैं लेकिन मीडिया से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। अक्सर ऐसा होता है कि एक सफलता या असफलता से उसको सफल करार दिया जाता है या उसे खारिज कर दिया जाता है, जबकि कोई भी टीम या खिलाडी लगातार मैच नहीं जीत सकता। साइना के साथ भी ऐसा ही हुआ।
              इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि साइना महान  ख़िलाड़ी हैं। उन्होंने भारतीय बैडमिंटन को नई ऊंचाई दी है। वे विश्व रैंकिंग में दूसरे नंबर तक  पँहुच चुकी है और अभी भी नंबर तीन पर काबिज़ है। विश्व की अनेक प्रतियोगिताएँ उन्होंने जीती हैं और ओलिंपिक खेलों में बैडमिंटन का  पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाडी हैं । लेकिन ओलिंपिक के बाद वे कोई प्रतियोगिता नहीं जीत सकीं । उतार चढ़ाव हर खिलाडी के कैरियर में आते हैं और साईना का ओलिंपिक  के बाद का दौर उतार का दौर था। हो सकता है ओलिंपिक में पदक जीतने के बाद उनमें एक प्रकार का संतुष्टि का भाव आ गया हो। ये भारतीय खिलाड़ियों की हमेशा से कमी रही है। संतुष्टि भारतीय संस्कृति का प्रमुख तत्त्व है और शायद अपने इस जन्मजात संस्कार के कारण वो किलिंग स्पिरिट नहीं आ पाती जो विदेशी खिलाड़िओं में होती है। लेकिन विश्व प्रतियोगिता के बाद जिस तरह से उनको खारिज़ किया जाने लगा उससे शायद उनके अहं को चोट पंहुची हो और इसका जवाब उन्होंने कोर्ट में देने का निश्चय किया, ठीक वैसे ही जैसे कि तेंदुलकर अपनी हर आलोचना का जवाब अपने बल्ले से मैदान में देते हैं। सिन्धु के साथ पहले मैच में शुरुआत में वे थोडा लडखडाई जरूर लेकिन एक बार जब उन्होंने अपनी लय पाई तो फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस प्रतियोगिता में सिन्धु को  दो बार हरा कर और लगातार मैच जीत कर उन्होंने ये दिखाया कि उनमे अभी भी बहुत खेल बाकी है।
          यहाँ मैं सिन्धु को खारिज नहीं कर रहा हूँ। वे संभावाना जगाने वाली भविष्य की खिलाड़ी हैं  जिनसे भारत साइना से आगे बढ़कर उम्मीद कर सकता है। पर उनकी सफलता को साइना के साथ प्रतिद्वन्दिता के तौर पर नहीं बल्कि साथी के तौर पर प्रोजेक्ट किया जाना चाहिए। प्रतिद्वन्दिता और वो भी अपनी टीम के साथी के साथ ,एक तरह का नकारात्मक भाव उत्पन्न करती है। यदि इन दोनों के बीच  प्रतिद्वन्दिता बढ़ती गयी तो दोनों का ध्यान एक दूसरे को हराने पर ही केन्द्रित होगा और एक बड़ा लक्ष्य भारतीय बैडमिंटन को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर नई  ऊंचाईयों पर ले जाने का-पीछे रह जायेगा। साइना ने चाइना की दीवार को भेदने में कुछ हद तक सफलता पाई है,लेकिन चाइना की ये दीवार इतनी लम्बी है कि बिना साथियों के पूरी तरह से भेद पाना कठिन है। ये काम साईना और सिंधु सहयोगी के तौर पर आसानी से कर सकती हैं, प्रतिद्वंदी के तौर पर नहीं। हमें उम्मीद रखनी चाहिए ये दोनों मिलकर भारत के खाते में बहुत सारी उपलब्धियाँ दर्ज़ कराएंगी।