Saturday, 28 June 2014

फुटबॉल विश्व कप 2014_5

     

            ब्राज़ील में खेले जा रहे विश्व कप फुटबॉल का पहला दौर समाप्त हो चुका है और 16 टीमें नॉक आउट दौर में पहुंच गयी हैं। इसमें कोई शक नहीं अब जो खेल होगा उसका कोई जवाब नही होगा। पर अब तक जो बीता उसका भी जवाब नही।  इस पहले दौर में वो सब कुछ तो था ही जिसकी उम्मीद की जा रही थी। साथ ही वो सब भी हुआ जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। कुछ अर्श से फर्श पर आ गिरे,कुछ ज़मीं से उड़ आसमां में तैरने लगें। कुछ की उम्मीदें किरिच किरिच छितरा  गयीं। कुछ के सपने हक़ीक़त बन फिज़ां में उड़ने लगे। चैम्पियन ज़मींदोज़ हो गए नामालूम हीरो बन गए। किसी की आँख से दुःख की अश्रुधारा बही तो किसी के मन में हर्ष हिलोरे मारने लगा। 
           क्या कुछ नहीं था इस पहले दौर में। पिछले चैम्पियन स्पेन का नीदरलैंड और चिली के हाथों हारना;इटली,पुर्तगाल,इंग्लैंड,स्पेन का पहले दौर में ही बाहर होना;मुलर और शकीरी का हैट्रिक लगाना;पेपे का मुलर को सिर से मारना;स्विट्ज़रलैंड के हैरिस सेफरोविच का अंतिम क्षणों में इक्वाडोर के विरुद्ध यादगार गोल करना;ऑस्ट्रेलिया के टिम काहिल का नीदरलैण्ड के खिलाफ लाजवाब गोल दागना;इंग्लैंड के वाइने रूनी द्वारा  वर्ल्ड  कप में पहला गोल करना ; मेस्सी का फ्री किक से ट्रेड मार्का बेह्तरीन गोल करना;क्लोसे का विश्व कप में 15वां गोल कर रोनाल्डो के रिकॉर्ड की बराबरी करना;वेन पर्सी का हेडर से अविस्मरणीय गोल करना;ग्रुप ड़ी में इंग्लैंड,इटली और उरुग्वे को पीछे छोड़ कोस्टारिका का टॉप पर रहना;नेमार का शानदार खेल;सुआरेज का इटली के चेलिनी को काटना और उन पर 9 मैचों का प्रतिबन्ध लगना;रैफरियों के गलत निर्णय;गोल लाइन टेक्नोलॉजी पर विवाद;गर्मी से परेशान खिलाड़ियों के लिए पहली बार वाटर ब्रेक होना और भी बहुत कुछ। 
            प्री क्वार्टर फाइनल  लिए जो 16 टीमें क्वालीफाई की हैं उनमे से केवल 6 यूरोप से हैं-नीदरलैंड ,जर्मनी ,फ्रांस ,बेल्जियम ,स्विट्जरलैंड और ग्रीस। जबकि दक्षिण अमेरिका से 6 में से 5 टीमें-ब्राज़ील ,अर्जेंटीना ,चिली ,कोलम्बिया और उरुग्वे ने  क्वालीफाई किया केवल इक्वाडोर को छोड़ कर। जबकि मध्य और उत्तरी अमेरिका की 4 में से 3 टीमों-यू.एस.ए.,मैक्सिको और कोस्टारिका ने क्वालीफाई किया हैं। अफ्रीका की भी दो टीमें अल्जीरिया तथा नाइजीरिया आगे बढीं हैं। सबसे ख़राब प्रदर्शन एशिया की टीमों का रहा है। एशिया जोन से  क्वालीफाई करने वाली टीमों का आगे बढ़ना तो  दूर क़ोई टीम एक मैच तक  नही जीत  सकी।
          इससे एक बात साफ़ है कि स्थानीय परिस्थितियों और मौसम का खेल पर और टीमों के प्रदर्शन पर खासा असर पड़ता है। यूरोप की टीमें जो कि ठंडे मौसम में खेलने की आदी हैं,गर्मी से परेशान हैं और इसका असर उनके खेल पर पडा है। ब्राज़ील में इन दिनों काफी गर्मी पड रही हैं। ये पहली बार हुआ कि खेल के दौरान वाटर ब्रेक करने का प्रावधान किया गया। 2010 में दक्षिण अफ्रीका में हुए विश्व  कप में भी यूरोप से 6 टीमें क्वालीफाई की थीं क्योंक़ि वहॉं का मौसम भी कमोबेश ऐसा ही था। जबकि 2006 के जर्मनी और १९९८ में फ्रांस में हुए विश्व कप में यूरोप की 10-10 टीमें क्वालीफाई की थीं। 
        सही है कि खिलाड़ियों पर स्थानीय परिस्थितियों का असर पड़ता है। आप टीमों के खेलने के ढंग से पता लगा सकते हैं कि किस महाद्वीप की टीम खेल रही है। हर महाद्वीप से आने वाली टीमों की अपनी खास शैली होती है जो उनकी सांस्कृतिक,भौगोलिक और सामाजार्थिक परिवेश से जन्म लेती है और उनके खेल की विशेषता बन जाती है। आप यूरोपीय टीमों को खेलते देखिए। उनके खेल में एक खास तरीके का अभिजात्य देखने को मिलेगा। उन्होंने पूरे विश्व पर राज किया। वे अपने को सर्वश्रेष्ठ समझते हैं। शारीरिक बनावट के अनुरूप उन्होंने फुटबॉल को ही नहीं सभी खेलों के कलात्मक स्वरुप को बदल कर पॉवर प्ले में बदल दिया। लम्बे तकड़े शॉट,शक्ति और गति उनके फुटबॉल का मूलमंत्र है। बॉल पर अधिकाधिक नियंत्रण उनके खेल की कुंजी है क्योंकि हर चीज  पर नियंत्रण रखना उनकी मानसिकता है जो उनके सर्वश्रेष्ठ होने की थ्योरी से पैदा होतीं है जिसके हिटलर और मुसोलिनी सबसे बड़े प्रतिनिधि हैं। किसी भी मैच को देखिए बॉल पर नियंत्रण का सबसे अधिक प्रतिशत यूरोपीय टीम का होता है भले ही मैच हारे हों। इसके ठीक विपरीत अफ़्रीकी टीमों को देखिए। ग़ज़ब का जुझारूपन उनके खेल में देखने को मिलेगा। आसानी से हार ना मानना,अंतिम समय तक संघर्ष करना और जीतने के लिए सारी ताकत झोंक देना उनका मूलमंत्र है। अफ़्रीकी देश विश्व के सबसे गऱीब देशों  में हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और जटिल जातीय संरचना में जीते हैं। विश्व के सबसे कठिन गृहयुद्धों के बीच अपने अस्तित्व और अस्मिता को बचाए रखने के लिए उन्हें घोर संघर्ष करना पड़ता है। विपरीत से विपरीत स्थितियों में भी सर्वाइव करने और जीने की लालसा अफ़्रीकी फुटबॉलरों की शैली निर्मित करती हैं। केन्या और इथोपिया जैसे देशों ने मध्यम और लम्बी दूरी के जो महान धावक दिए हैं वे इसी जिजीविषा की उपज हैं। एशिया के देश मध्यम वर्ग जैसे हैं। ना बहुत अमीर ना बहुत ग़रीब। एक खास किस्म का आलस्य उनके स्वभाव में हैं जो शायद आर्द्र जलवायु की वज़ह से है और मध्य वर्ग की कृपणता भी मौजूद रहती है। तभी तो मैदान में छोटे छोटे पासों  खेलना और अपना सब कुछ झोंक कर जीतने के बजाए एक अभिजात्य आलस्य मैदान  पसरा दिखाइ देता हैं। दक्षिण और मध्य अमेरिका में समाजवाद की लम्बी परंपरा रही है-चे ग्वेरा  लेकर फिदेल कास्त्रो तक की। एक बड़ा तबका इस आंदोलन से जुङा हैं। एक बड़ा सर्वहारा वर्ग विद्यमान है। उनके भीतर एक आर्टिसनाशिप है,एक कलात्मकता है जिसे वे जीवन में ही नहीं बल्कि फुटबॉल के  मैंदान में भी उतार देते हैं और खेल को एक साकार कलाकृति का रूप दे देते हैं। विश्व के महानतम खिलाड़ी पेले ,माराडोना, रोनाल्डो, नेमार और मैसी  जैसे खिलाड़ी उसी क्षेत्र और वर्ग से आते हैं। दरअसल जब हम फुटबॉल देखते हैं तो हम केवल खेल ही नहीं  देखते बल्कि दो अलग अलग क्षेत्रों की संस्कृतियों ,जीवन प्रणाली और समाजार्थिक तथा भौगोलिक बुनावटों के बीच टकराहट भी देखते हैं। जब आप राउंड 16 के और आगे के मैच देखें तो इस बात को याद रखिए। यकीन मानिए मज़ा आएगा।























Thursday, 19 June 2014

फुटबॉल विश्व कप 2014_4

                     

                    स्पेन के लिए ये विश्व कप किसी दुःस्वप्न से कम न था। अब 2010 की विश्व विजेता टीम से बेहतर कौन समझ सकता है कि शीर्ष पर पहुँचने के बनिस्बत वहाँ बने रहना अधिक दुष्कर होता है। और ये भी कि जब चोटी से कोई गिरता है तो किस हद तक गर्त में गिरेगा इसका अनुमान लगाना मुश्किल ही नहीं असंभव होता है। जब स्पेन की टीम ने ब्राज़ील की धरती पर कदम रखा तो उसकी गिनती इस बार के संभावित विजेताओं में की जा रही थी। उस समय किसी को नहीं पता था कि विश्व चैम्पियन इस कदर बेआबरू होकर विश्व  कप से विदा होंगे। लेकिन होनी को कौन टाल सका है।  होनी होकर रहती है और हुई भी। जब स्पेन ने 23 खिलाड़ियों की घोषणा की तो वे एक कीर्तिमान बना रहे थे-विश्व चैम्पियन टीम के सर्वाधिक यानि 16 खिलाडियों को रिटेन करने का। उस समय उनको नहीं पता था की वे कुछ ऐसे अनचाहे कीर्तिमान के भागीदार होंगे जिसे कभी किसी ने नहीं चाहा है और ना कभी चाहेगा। अपने पहले मैच में  नीदरलैंड की टीम से 1-5 से हारे तो ये किसी वर्तमान चैम्पियन की अब तक की सबसे बड़ी हार थी। नीदरलैंड ने स्पेन को 2010 में उनके सपने को तोड़ने की सज़ा दे दी थी। लेकिन उस समय भी  किसी ने उनकी टीम को खारिज़ नहीं किया था। लोगों में खासकर उनके समर्थकों को उम्मीद थी कि स्पेन पलटवार करेगा।अगला मैच चिली से था। पलड़ा स्पेन का ही भारी था। चिली स्पेन के विरुद्ध खेले गए पिछले 10 मैचों में जीत नहीं सका  था। उसे 8 में हार मिली और 2 ड्रा खेले थे। जबकि स्पेन अक्टूबर 2006 के बाद से बैक टू बैक अंतर्राष्ट्रीय मैच नहीं हारे थे। और सबसे बड़ी बात ये कि इससे पूर्व विश्व कप में खेले गए दोनों मैचों में स्पेन ने चिली को हराया था।1950 में 2-0 से और 2010 में 2-1  से।
                लेकिन जहाँ अपने पहले मैच में नीदरलैंड से बुरी तरह हार कर स्पेन का  आत्मविश्वास टूटा था वहीं चिली की टीम अपने पहले मैच में ऑस्ट्रेलिया को 3-1 से हराकर उत्साह से लबरेज़ थी। ये सही है उम्मीद पर दुनिया टिकी है । पर उम्मीद तो उम्मीद होती है। हमेशा खरी उतरे जरूरी नहीं।उस पर तुषारापात भी होता है। इस बार स्पेन के साथ ऐसा ही हुआ। चिली ने 2-1 से हरा दिया। पहले हाफ में कहीं से नहीं लगा कि एक विश्व चैम्पियन टीम खेल रही है। 20वें मिनट में एदुआर्दो वरगास और 43वें मिनट में चार्ल्स अरंगुएज़ ने गोल कर स्पेन की हार की पटकथा लिख दी। स्पेन हार के साथ पहले ही दौर में इस विश्व कप से बाहर हो गई बल्कि ऐसी टीम बन गई जो वर्तमान चैम्पियन होते हुए पहले दो मैच हार गई।
                                                                                   कहते हैं इतिहास अपने को दोहराता है। एकदम सही ही कहते हैं।पहली बार 1962 का चैम्पियन ब्राज़ील 1966 में पहले ही दौर में बाहर हो गया था। 1998 में फ्रांस चैम्पियन बना पर 2002 में चैम्पियन पहले ही दौर  बाहर हो गया। इतिहास ने अपने को दोहराया 2010 में। 2006 में इटली चैम्पियन बना पर 2010 में चैम्पियन पहले ही दौर में बाहर हो गया। सिलसिला यहीं नहीं रूका। इतिहास ने 2014 में अपने को पुनः दोहराया। 2010 में स्पेन चैम्पियन बना। 2014 में चैम्पियन पहले ही दौर में बाहर हो गया। इतिहास एक और तरीके से अपने को दोहरा रहा था। 1950 में विश्व कप ब्राज़ील में हुआ। एक मैच चिली और स्पेन के बीच खेला गया रियो डी जेनिरो में। स्टेडियम था मराकाना। तारीख थी  29 जून 1950 । नतीजा 2-0 स्पेन के पक्ष में। 64 साल बाद विश्व कप एक बार फिर ब्राज़ील में हो रहा है। मैदान में वो ही दो टीमें आमने सामने थीं-स्पेन और चिली। मैदान भी वो ही रियो डी जेनिरो का स्टेडियम मराकाना। स्कोर लाइन भी वो ही 2-0।बस एक फ़र्क था इस बार विजेता चिली था। एक और तरीके का दोहराव था। तीन दिन पूर्व नीदरलैंड ने चार साल पहले की हार का बदला लिया था और अब चिली इतिहास बना रहा था। ईश्वर स्पेन समर्थकों को हार सहने की शक्ति दे !!!!!

                                   

Tuesday, 17 June 2014

फुटबॉल विश्व कप 2014_3




भारत ने क्रिकेट का भगवान दिया , हॉकी का जादूगर दिया ,शतरंज बिलियर्ड्स स्नूकर शूटिंग बैडमिंटन टेनिस जैसे खेलो के विश्व चैम्पियन दिए। लेकिन फुटबॉल में एक विश्व स्तरीय खिलाड़ी नहीं पैदा कर सका। सचिन, कपिल, गावस्कर जैसे नाम बच्चे बच्चे की जुबान पर हैं,विश्वनाथन,अमृतराज बंधु,सानिया,पेस, महेश,रोंजन सोढ़ी,जसपाल राणा,प्रकाश पदुकोने,सैय्यद मोदी,गोपीचंद ,साइना,राज्यवर्धन सिंह ,ध्यानचंद,अजीतपाल सिंह,मो.शाहिद,धनराज,गीत सेठी,माइकल फरेरा,पंकज आडवाणी तमाम चैम्पियन खिलाड़ी हैं जिनकी विश्व स्तर पर पहचान है। पर क्या आप किसी ऐसे फुटबॉल खिलाड़ी का नाम ले सकते हैं? शायद नहीं। चुन्नी गोस्वामी,पी. के. बनर्जी,साबिर अली या बाइचुंग भूटिया जैसे कुछ नाम हैं जिनका आप उल्लेख कर सकते हैं। पर विश्व स्तर पर इनकी क्या जगह बनती है आप खुद समझ सकते हैं।  
      फुटबॉल विश्व के हर देश  देश में खेला जाता है। इस विश्व कप फाइनल्स के लिए क्वालीफाइंग दौर में 200 से भी अधिक देशों की टीमों ने भाग लिया। ये एक ऐसा खेल है जो सबसे सस्ते खेलों में शुमार है। लेकिन क्या विरोधाभास है कि भारत जैसे विकासशील और कम संसाधनों वाले देश में महँगे खेलों में तो भगवान,जादूगर और चैम्पियन पैदा किये पर फुटबॉल में एक भी ऐसा खिलाड़ी नहीं दिया जिसकी विश्व स्तर पर कोई पहचान बन सकी हो। विरोधाभास ये भी है कि देश में फुटबॉल लोकप्रिय खूब है। इस समय फुटबॉल विश्व कप की धूम है। इसका जबरदस्त क्रेज़ है।लोग इसको लेकर उत्साहित हैं। मीडिया में भी खूब कवरेज है। दैनिक अखबारों के  पृष्ठ फुटबॉल की खबरों से भरे पड़े हैं। टी वी चैनल भी स्पेशल कार्यक्रम कर रहे हैं।ब्राज़ील से लेकर जर्मनी,इटली,अर्जेंटीना और स्पेन तक के दीवानगी की हद तक प्रशंसक हैं। रात रात भर जाग कर मैच देखते हैं। पर कोई फुटबॉल खेलना नहीं चाहता।
         आज भारत की फुटबॉल टीम की विश्व रैंकिंग अफगानिस्तान से भी नीचे है।1950 के आसपास जरूर ऐसा समय था जब फुटबॉल में भारत की विश्व स्तर पर कुछ पहचान थी ये समय है 1948 से 1964 तक का। 1948 का लन्दन ओलिंपिक। पहली बड़ी प्रतियोगिता थी जिसमें भारत ने भाग लिया। यहाँ उनका मुकाबला फ्रांस से था। वे 1-2 से मैच हारे जरूर । पर दर्शकों का दिल जीत लिया। ज्यादातर खिलाडी नंगे पैरों से खेल रहे थे। पर शानदार खेल दिखाया। यदि उन्होंने दो पेनाल्टी को गोल में तब्दील कर दिया होता तो कहानी कुछ और होती। इसी समय सैयद अब्दुल रहीम भारतीय फ़ुटबाल परिदृश्य पर उभरते हैं। कोच के रूप में उन्होंने भारतीय फुटबॉल को नई ऊँचाई तक पहुँचाया। 1951 में पहले एशियाई खेल नई दिल्ली में आयोजित किये गए। यहाँ टीम ने स्वर्ण पदक जीता। क्वार्टर फाइनल में इंडोनेशिया को 3-0 से और सेमी फाइनल में अफगानिस्तान को 3-0 से हराया। फाइनल में ईरान को 1-0 हराकर स्वर्ण पदक जीता। मेवालाल साहू जीत के नायक रहे। उन्होंने सर्वाधिक 4 गोल दागे। लईक, वेंकटेश ,अब्दुल लतीफ़ और मन्ना टीम के अन्य सितारे थे। इसके बाद भारतीय फुटबाल की एक नई गाथा लिखी जानी थी। सन 1956 मोंट्रियाल ओलिंपिक। पहला मैच - हंगरी से वॉक ओवर मिला। दूसरा मैच क्वार्टर फाइनल। मेजबान ऑस्ट्रेलिया को 4-2 से हराया। नेविल डीसूजा मैच के हीरो - हैट ट्रिक बनाने वाले पहले एशियन बने और इस तरह ओलिंपिक फुटबॉल के सेमी फाइनल में पहुँचने वाली पहली एशियाई टीम बनी। सेमी फाइनल यूगोस्लाविया से। पहला हाफ गॉल रहित। दूसरा हाफ - 55वें मिनट में नेविल डिसूजा ने भारत को बढ़त दिलाई। पर इस बढ़त को कायम न रख सके। अंततः 4-1 से हारे। प्ले ऑफ मैच में बुल्गारिया से 3-0 से हारे और चौथा स्थान प्राप्त किया। 1951 के बाद 1962 के जकार्ता एशियाई खेलों में भारतीय खिलाडियों ने शानदार खेल दिखाया और पुनः स्वर्ण पदक जीता। हाँलाकि लीग स्टेज में साउथ कोरिया से 0-2 से हारे पर थाईलैंड को 4-1 से और जापान को 2-0 से हरा कर सेमी फाइनल में प्रवेश किया जहाँ साउथ विएतनाम को 3-2 से हराया। फाइनल में साउथ कोरिया को 2-1 से हरा कर न केवल स्वर्ण पदक जीता बल्कि लीग में हार का बदला भी ले लिया। इसके बाद साल 1964 तीसरा  ए.एफ.सी.एशियन कप इस्रायल में आयोजित हुआ। यहाँ रजत पदक जीता। चुन्नी गोस्वामी, इन्दर सिंह और सुकुमार जैसे खिलाड़ी इस टीम के सदस्य थे। यहीं से भारतीय फुटबॉल के पतन की कहानी शुरू होती है जो सितम्बर 2012 में चरम पर पहुँच गयी जब भारत फीफा रैंकिंग में 169वें स्थान पर आ गया।
                इस हालत के जिम्मेदार लोग कौन हैं, इसकी शिनाख्त होना जरूरी है। 

Saturday, 14 June 2014

फुटबॉल विश्व कप 2014_2




     13 जून 2014 को हॉलैंड और स्पेन के बीच खेला गया मैच लम्बे अर्से तक याद रहेगा। ये मैच हार का बदला लेने का एक ऐसा उदाहारण बन गया है जिसे हमेशा उद्धृत किया जाता रहेगा। 11 जुलाई 2010 को जोहान्सबर्ग,दक्षिण अफ्रीका में जिस मैच को दोनों टीमों ने जहां ख़त्म किया था 13 जून 2014 का मैच ठीक वहीं से शुरू हुआ-स्पेन के डॉमिनेशन के साथ। बॉल पर स्पेन के कब्जे का प्रतिशत 58 था। ऐसा स्वाभाविक भी था। 2010 के मैच में दोनों टीमें चैम्पियन बनने के लिए खेल रहीं थी। दोनों टीमें समान रूप से उत्साहित थीं। पर स्पेन के इनेस्टा द्वारा अतिरिक्त समय में (116वें मिनट) में किये गए गोल ने हॉलैंड को निराशा के गहन अन्धकार में झोंक था। उनका विश्व चैम्पियन बनने का सपना तीसरी बार टूट गया था। इसीलिए  इस बार दोनों टीमें अलग मानसिकता के साथ खेल रहीं थीं। स्पेन के लिए पिछले चार सालों में कुछ नहीं बदला था। 2010 में भी वो रैंकिंग में नम्बर एक थी और आज भी। तीन बड़े खिताब उसके नाम थे। 2008 में यूरो कप जीता था, 2010 में फीफा कप और 2012 में फिर से यूरो कप। यहां फिर से चैम्पियन बनने की सबसे बड़ी दावेदार टीम थी। पर हॉलैंड की टीम इन चार सालों में दूसरे स्थान से 15वें स्थान पर आकर टिक गयी थी।हॉलैंड के मन में हार की टीस अंदर तक पैठ गयी थी। जरूर ही अपने सामने पहले मैच में ही स्पेन को पाकर 2010 में मिले घाव हरे हो गए होंगे।स्पेन ने एक बार फिर चैम्पियन की तरह खेलना शुरू किया। 27 मिनट बीतते बीतते स्पेन के इनेस्टा द्वारा 2010 में हॉलैंड को दिए घाव को जोबी आलेंसों ने गोल कर बेतरह कुरेद दिया था। कहते हैं जब दर्द हद से ग़ुज़र जाता है तो वो ख़ुद ही दवा बन जाता है। जोबी के गोल का शायद यही असर हुआ होगा। होलैंड ने अब अपने को संगठित करना शुरू किया। खेल में तेजी लाये। जल्द  नतीज़ा निकला। कप्तान रोबिन वेन पर्सी ने शानदार हेडर से गोल दाग स्कोर 1 - 1 से बराबर कर दिया। इसके बाद की कहानी अब ना भूलने वाला इतिहास बन गयी। दूसरे हाफ में एक के बाद एक चार गोल और। खेल ख़त्म होने पर स्कोर था 5 - 1,स्पेन के नहीं हॉलैंड के पक्ष में। एक बड़े कार्य को अंजाम दिया जा चुका था। चैम्पियन का पूरी तरह से मान मर्दन हो चुका था। इस बार इतिहास ने अपने को दोहराया नहीं था बल्कि एकरेखीय इतिहास की अवधारणा की तरह पिछली घटना के बाद की एक और घटना बन इतिहास को और आगे बढ़ा दिया। तिस पर विडम्बना देखिये कि स्पेन की विजेता टीम के एक नहीं दो नहीं पूरे 16 खिलाड़ी इस पराजय को देखने के लिए उस टीम के सदस्य बने खड़े थे। दरअसल जब स्पेन ने इस विश्व कप के लिए अपनी 23 सदस्यीय टीम की घोषणा की तो उसने 2010 टीम के 16 खिलाड़ियों को रिटेन था जो विश्व रिकॉर्ड था क्योंकि इससे पूर्व किसी भी चैम्पियन टीम ने अगले विश्व कप के लिए इतने अधिक खिलाड़ियों को रिटेन नहीं किया था। और इन खिलाड़ियों ने ही किसी चैम्पियन की इतनी बड़ी हार का रिकॉर्ड भी बनाया। 1950 के फ़ाइनल में ब्राज़ील की युरुग्वे के हाथों मरकाना स्टेडियम की हार ने एक नया शब्द प्रचलन में ला दिया था- माराकांजो।  हो सकता है ये हार कुछ इसी तरह का मिथक गढ़े।


Thursday, 12 June 2014

फुटबॉल विश्व कप 2014_1

                                                                                                                                                           
                                                     
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         अपनी बात शुरू करते हैं  छोटी सी कहानी से। बात २००६ की है। छोटे से अफ़्रीकी देश आइवरी कोस्ट ने जर्मनी में होने वाले फुटबॉल विश्व कप फाइनल्स के लिए क्वालीफाई किया। इस देश में २००२ से ही गृह  चल रहा था। उत्तर और  दक्षिण के लोग आपस में सत्ता के लिए लड़ रहे थे। फ़्रांसिसी सेना और सयुंक्त राष्ट्र संघ तमाम प्रयासों के बावज़ूद इस संघर्ष को समाप्त  कराने में असफल रहे थे। ऐसे में क्वालीफाई करने वाली टीम के हीरो दीदिएर द्रोगबा ने  अपने देशवासियों से एक मार्मिक अपील की-गृहयुद्ध रोकने की।  सप्ताह के भीतर उनकी ये इच्छा पूरी हो गयी। लड़ते गुटों में युद्धविराम हो गया और कुछ दिनों बाद शांति  समझौता भी। एक ऐसा  कार्य जो एक बड़े देश  सेना और विश्व संस्था नहीं कर सकी उसे उस देश की फुटबॉल टीम ने कर दिखाया। ये थी खेल की ताक़त और फुटबॉल की लोकप्रियता। और जब स्टीफेन हॉकिंग जैसे महान वैज्ञानिक इंग्लैंड के पिछले खेले गए मैचों का विश्लेषण कर उसकी जीत के सूत्र तैयार करते है तो आपके लिए इस खेल की लोकप्रियता का अंदाज़ लगाना कतई कठिन नहीं होना चाहिए। 
      विश्व के इसी सबसे लोकप्रिय खेल का सबसे बड़ा आयोजन है फीफा विश्व कप फाइनल्स। इसके ब्राज़ील में होने वाले बीसवें संस्करण में विश्व की चुनिंदा ३२ देशों की टीमें अपने खेल कौशल और इसमें महारत का परचम लहराने के प्रयास में अपना सब कुछ झोंक देने के लिए तैयार हैं। जी हाँ, ब्राज़ील में रोमांच और ज़ुनून का रंगमंच तैयार है जहाँ  अगले एक महीने तक हर दिन २२ जोड़ी पैर १२० मीटर लम्बे और ८० मीटर चौड़े मैदान में एक अदद गेंद से हैरत अंगेज़ कारनामे दिखाने  के लिए तैयार हैं। वहां जीत होगी तो  हार भी होगी। जोश भी होगा,जूनून भी। आँखें ख़ुशी से भी नम होगी और ग़म से भी। मानवीय कौशल की पराकाष्ठा होगी तो तकनीक की श्रेष्ठता के भी दिग्दर्शन होंगे। एक दूसरे से गले मिलते खिलाड़ी होंगे और एक दूसरे पर झपटते प्रतिद्वंदी भी।खेल अधिकारी होंगे ,रैफरी होंगे ,लाइन्समैन होंगे ,कैमरे होंगे ,फ़्लैश लाइटें होंगी ,पत्रकार होंगे ,साम्बा की धुन पर थिरकते दर्शक होंगे और पूरी ताक़त से बाज़ार भी होगा। और इन सबके केंद्र में होगा फ़ुटबाल का खेल और उसकी श्रेष्ठता का प्रतीक फीफा वर्ल्ड कप ट्रॉफी। तो आइए  बात करते हैं फुटबॉल खेल की और बीसवें फीफा विश्व कप फाइनल्स की। 
           आखिर ये उत्सुकता तो होती ही है कि इतने लोकप्रिय खेल का जन्म कब कहाँ और कैसे हुआ कैसे हुआ इसका जन्म इंग्लैंड में हुआ  माना जाता है। रास्ते में पड़ी किसी  वस्तु को ठोकर मारना या ऐसी इच्छा होना स्वाभाविक मानवीय प्रवृति है शायद इसी प्रवृति ने फ़ुटबाल खेल को जन्म दिया। वैसे इसका इतिहास ग्रीको रोमन काल तक जाता है.उस समय गेंद से खेले जाने वाले कई खेल थे जिनमे पैरों का इस्तेमाल होता था। फूटबाल का सबसे आरंभिक स्वरुप चीन में खेले जाने वाले शुजु में देखा जा सकता है। वैसे तो विश्व के अलग अलग क्षेत्रों में फ़ुटबाल से मिलते जुलते खेल खेले जाते थे, पर आधुनिक फ़ुटबाल नियमों का मुख्य स्रोत पश्चिम यूरोप और विशेष रूप से इंग्लैंड ही है। मध्य काल तक आते आते यूरोप में ये खेल इतना लोकप्रिय हो गया कि कई शासकों ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिए। इंग्लैंड के शासक एडवर्ड द्वितीय और तृतीय तथा हेनरी चतुर्थ ने इंग्लैंड में इस पर रोक लगाने के आदेश जारी किये। पर प्रतिबन्ध के बावजूद यूरोप में और विशेष  इंग्लैंड के पब्लिक स्कूलों में फुटबॉल दिनोंदिन लोकप्रिय होता गया। लेकिन इस समय तक खेल के निश्चित नियम नहीं थे। प्रत्येक टीम अपने अपने नियम बनाकर खेलती थी। इस दिशा में पहला प्रयास थ्रिंग और डेविंटन द्वारा १८६२ में किया गया और खेल के पहली बार नियम बने। १८६३ में उन्हें संशोधित किया गया। इसी वर्ष फुटबॉल एसोसिएशन ऑफ़ इंग्लैंड का गठन हुआ और १८६४ में नए नियम बनाए गए। 
                                            जैसे जैसे फुटबॉल की लोकप्रियता बढ़ने लगी वैसे ही इसके अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के प्रयास होने लगे। पहला अन्तराष्ट्रीय मैच १८७२ में ग्लासगो में इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के बीच खेला गया। १९०० और १९०४ के ओलम्पिक खेलों में फुटबॉल को प्रदर्शनी खेल के रूप में शामिल किया गया। इसी बीच फुटबॉल की बढ़ती लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए २१ मई १९०४ को सात राष्ट्रों के प्रतिनिधि एकत्र हुए और अंतराष्ट्रीय नियामक संस्था फेडरेशन इंटरनेशनल डी फुटबॉल एसोसिएशन यानि फीफा का गठन किया।  इसने ओलम्पिक से इतर अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिता कराने का प्रयास किया पर असफल रहे। १९१४ में फीफा ने ओलम्पिक खेलों में फुटबॉल को मान्यता दे दी। १९२० के ओलम्पिक में  स्वर्ण पदक बेल्जियम ने जीता पर अगले दो ओलम्पिक खेलों १९२४ और १९२८ में स्वर्ण पदक उरुग्वे ने जीता। इस बीच फीफा की बागडोर जुले रीमे के हाथ में आ गयी।  फुटबॉल के इतिहास में रीमे को वही स्थान प्राप्त है जो पियरे डी कूबर्तिन को ओलम्पिक आंदोलन में हासिल है। उनके प्रयास से  फीफा ने २० मई १९२८ को एमस्टर्डम में स्वयं अपनी विश्व प्रतियोगिता कराने का निर्णय लिया। मेजबानी सौंपी गयी १९२४ और १९२८ के फुटबॉल ओलम्पिक विजेता उरुग्वे को। १९३० वो साल था जब उरुग्वे अपनी आज़ादी के १०० साल पूरे होने का जश्न मना रहा था। तब से विश्व कप हर चार साल पर आयोजित होता है। 
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                        फुटबॉल विश्व कप की शुरुआत १९३० में हुई। उरुग्वे में आयोजित इस  वर्ल्ड कप में कुल १३ टीमों ने भाग लिया। इनमे से चार यूरोप की, दो उत्तरी अमेरिका की और सात दक्षिण अमेरिका की थी। पहले दो मैच १३ जुलाई को एक साथ हुए। एक में फ्रांस ने मैक्सिको को ४-१ से और दूसरे में यू.एस.ए. ने बेल्जियम को ३-० से हराया। कप का पहला गोल फ्रांस के लूसियन लॉरेन ने किया। मेजबान उरुग्वे ने फ़ाइनल में अर्जेंटीना को ४-२ से हराकर पहला विश्व चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया।अगले दो विश्व कप यूरोप में हुए।  दक्षिण अमेरिका से इन दोनों कप में भाग लेने वाली एकमात्र टीम ब्राज़ील की  थी।१९३४ का विश्व कप इटली में हुआ। उसने फ़ाइनल में चेकोस्लोवाकिया को २-१ से हराकर खिताब जीता। १९३८ में तीसरा विश्व कप फ़्रांस में हुआ जिसे फिर से इटली ने हंगरी को ४-२ से हराकर जीता। १९४२ और १९४६ में होने वाले विश्व कप दूसरे विश्व युद्ध की भेंट चढ़ गए। १९५० में विश्व कप एक बार फिर दक्षिण अमेरिका पहुँचा। इस बार मेजबान ब्राज़ील था। प्रतियोगिता नए फॉर्मेट में आयोजित की गयी। प्रारंभिक दौर के मैचों के बाद टॉप चार टीमों के मध्य राउंड रोबिन मैच खेले जाने थे जिसके आधार पर विजेता घोषित होना था। अंतिम मैच उरुग्वे और ब्राज़ील के मध्य हुआ। उरुग्वे ब्राज़ील से एक अंक पीछे था उसे सीधे तौर पर जीत की ज़रुरत थी जबकि ब्राज़ील को मात्र एक ड्रा की दरकार थी,लेकिन ब्राज़ील २-१ से हार गया। ये हार फ़ुटबाल इतिहास के बड़े उलटफेर में गिनी जाती है। १९५४ में स्विट्ज़रलैंड में विश्व कप का आयोजन किया गया जिसे पश्चिमी जर्मनी  ने  हंगरी को हराकर जीता। इस विश्व कप में अब तक के सर्वाधिक गोल हुए। प्रति मैच गोल औसत भी सर्वाधिक रही। १९५८ में स्वीडन में हुई  प्रतियोगिता को ब्राज़ील ने मेजबान को ५-२  हरा कर जीता। ये अब तक का एकमात्र अवसर था जब विश्व कप यूरोप में हुआ और कोई यूरोपियन टीम ख़िताब नहीं जीत सकी। चिली में १९६२ में आयोजित विश्व कप में  ब्राज़ील पुनः विजेता बना जिसने  फ़ाइनल में चेकोस्लोवाकिया को ३-१ से हराया। १९६६ में विश्व कप इंग्लैंड में आयोजित किया गया। जहाँ इंग्लैंड ने जर्मनी को ४-२ से हराकर नए चैम्पियन बनने का गौरव प्राप्त किया। १९७० में पहली बार विश्व कप यूरोप और दक्षिण अमेरिका से बाहर के देश मैक्सिको में आयोजित किया गया। यहाँ ब्राज़ील इटली पर ४-१ से  जीत दर्ज़ कर तीसरी बार विश्व चैंपियन बना।  इसीलिए चैम्पियन को दी जाने वाली जूले रीमे ट्रॉफी ब्राज़ील को स्थाई  रूप से दी गयी। इसके बाद नई ट्रॉफी बनाई गई जिसे फीफा वर्ल्ड कप ट्रॉफी कहा गया। १९७४ में पश्चिम जर्मनी अपनी मेजबानी में नीदरलैंड को  २-१ से हराकर दूसरी बार चैंपियन बना। १९७८ में अर्जेंटीना नया चैंपियन बना। मेजबानी करते हुए फ़ाइनल में उसने नीदरलैंड को ३-१ से हराया।   १९८२ में स्पेन में आयोजित विश्व कप में इटली  चैंपियन बना। फ़ाइनल में उसने पश्चिम जर्मनी को ३-२ से हराया। उल्लेखनीय  १९८२ में पहली बार २४ टीमों को शामिल किया गया। १९३४ से १९७८ तक विश्व कप में १६ टीम भाग लेती थीं  अपवादों को छोड़ कर। १९३८ कप शुरू होने से पूर्व जर्मनी ने ऑस्ट्रिया पर कब्जा कर जर्मनी में मिला लिया तो केवल १५ टीम बचीं। १९५० में भारत,टर्की और स्कॉटलैंड ने अपने नाम प्रतियोगिता से वापस ले लिया। १९८६ में विश्व कप एक बार फिर दक्षिण अमेरिका पहुंचा। अर्जेंटीना ने जर्मनी को ३-२ से हराकर  खिताब जीता।ये विश्व कप अर्जेंटीना के महान खिलाड़ी और कप्तान डिएगो मैराडोना के क्वाटर फ़ाइनल में इंग्लैंड के विरुद्ध विवादास्पद गोल के लिए याद किया जाता है जिसे हैंड आफ गॉड गोल नाम दिया गया। इस गोल को सदी का गोल चुना गया। स्टेडियम में दर्शकों की उठने बैठने की जो लहर दिखाई देती है और जिसे मेक्सिकन वेव के नाम से जाना जाता है ,इसी कप की देन है।  १९९० में इटली में प्रतियोगिता हुई।  दो बार ये कप आयोजित करने वाला इटली मैक्सिको के बाद दूसरा देश बना। अर्जेटीना को १-० से हराकर पश्चिमी जर्मनी  चैंपियन बना। य़े सबसे ख़राब टूर्नामेंट माना जाता है जिसमे कुल १६ रेड कार्ड दिखाए गए और सबसे कम गोल औसत रहा।
                                                               १९९४ में प्रतियोगिता यू. एस.ए में हुई। यहाँ पहली बार ३२ टीमें शामिल की गयीं। इटली को ३-२ से हराकर ब्राज़ील ने अपना चौथा ख़िताब जीता। य़े पहला मौक़ा था जब फ़ाइनल का निर्णय पेनाल्टी शूटआउट से हुआ। १९९८ में प्रतियोगिता फ़्रांस में हुई और १९७८ के बाद  फिर मेजबान देश ने कप जीता। फ़्रांस ने ब्राज़ील को ३-० से हराकर सातवें चैम्पियन बनने का गौरव हासिल किया।२००२ में  विश्व कप सयुंक्त रूप से दक्षिण कोरिया और जापान  हुआ। पहला मौका था जब ये प्रतियोगिता एशिया में हो रही थी। यहाँ ब्राज़ील ने जर्मनी को २-० से हराकर रिकॉर्ड पांचवी बार ख़िताब जीता। २००६  में ये विश्व कप जर्मनी में आयोजित हुआ और इटली ने फ़्रांस को ५-३ से हराया। २०१० में पहली बार ये कप अफ्रीका में संपन्न हुआ। देश था दक्षिणी अफ्रीका। यहां फुटबॉल को नया चैंपियन मिला। स्पेन  ने नीदरलैंड  को १-० से हराया। नीदरलैंड तीसरी बार फ़ाइनल में पहुँच कर असफल रहा। यह भी पहली बार हुआ की मेजबान देश पहले ही दौर में बाहर हो गया। इस तरह से १९ विश्व कप फाइनल्स को आठ अलग अलग देश जीत चुके हैं - ब्राज़ील पांच, बार इटली चार बार, जर्मनी तीन बार,अर्जेंटीना और उरुग्वे दो दो बार ,इंग्लैंड फ़्रांस तथा स्पेन एक एक बार।   
                                 
 ब्राज़ील में विश्व कप दूसरी बार हो रहा है। .इससे  पूर्व १९५० में  ये प्रतियोगिता यहाँ आयोजित हो चुकी है,जबकि दक्षिण अमेरिका में इसका  आयोजन १९७८ के बाद हो रहा है। मार्च २००३ में ही फीफा ने घोषणा कर दी थी कि २०१४ का वर्ल्ड कप दक्षिण अमेरिका में होगा। इस घोषणा के प्रत्युत्तर में तीन देशों ब्राज़ील ,अर्जेंटीना और कोलंबिया ने अपनी दावेदारी पेश की। लेकिन दक्षिण अमेरिकी फुटबॉल कॉन्फेडरेशन ने एकमत से ब्राज़ील के पक्ष में मत दिया बाद में अर्जेंटीना और कोलंबिया ने अपनी दावेदारी वापस ले ली तब ३० अक्टूबर २००७ को ब्राज़ील की मेजबानी की घोषणा की गयी। दो बार विश्व कप आयोजित करने वाला ब्राज़ील पांचवां देश बन गया है। अन्य देश हैं -मैक्सिको ,इटली,फ़्रांस और जर्मनी।
                                      मेजबानी की आधिकारिक घोषणा के  बाद ब्राज़ील ने बड़े पैमाने पर तैयारियां शुरू कर दी थीं। नए स्टेडियम बनाये गए ,पुरानों का जीर्णोध्दार हुआ। शुभंकर और लोगो का नामकरण किया गया आधिकारिक गीत जारी किया गया। 
  
ब्राज़ील में होने वाले विश्व कप के मैच कुल बारह स्थानो पर होंगे जिनमें प्रमुख हैं -सल्वाडोर, साओ पाओलो ,ब्रासीलिया और रिओ डी जेनेरो। १२ में से ६ स्थानों पर स्टेडियमों का जीर्णोद्धार किया गया है। इनमें से एक स्टेडियम कुरितिबा १०० साल पुराना है। शेष ६ स्टेडियम नए बनाए हैं। इस पूरे निर्माण पर लगभग साढ़े तीन बिलियन यू. एस. डॉलर खर्च होने का अनुमान है। उदघाटन समारोह साओ पाओलो के ६५ हज़ार दर्शकों की क्षमता वाले  नवनिर्मित कोरिएन्थस  स्टेडियम में होगा जबकि फ़ाइनल मैच रिओ डी जेनेरो के मरकाना स्टेडियम में होगा जिसमे १९५० में भी ब्राज़ील फ़ाइनल खेल था और अप्रत्याशित रूप से हार गया था

* विश्व कप के लिए आधिकारिक प्रतीक चिन्ह यानि लोगो को २०१० में विस्वा कप के दौरान जोहान्सबर्ग में जारी किया गया था इसको नाम दिया गया है इंस्पिरेशन यानि प्रेरणा इसमें   तीन विजयी हाथ कप ट्रॉफी को पकड़े हैं। इसे हरे और पीले  बनाया गया है जिसका मतलब है ब्राज़ील समस्त विश्व का अपने यहाँ गर्मजोशी से स्वागत करता है।

* फीफा ने जनवरी २०१३ में एक आधिकारिक पोस्टर भी जारी किया जिसे ब्राज़ील की क्रियेटिव एजेंसी क्रामा द्वारा तैयार किया गया है।
                             
*इस विश्व कप का आधिकारिक स्लोगनहै 'आल इन वन रिदम'.
                             
* शकीरा का गाया वाका वाका गाना आपके ज़ेहन में आज भी बसा होगा जो २०१० का आधिकारिक गीत था १९६२ से ही प्रत्येक वर्ल्ड कप के लिए एक ऑफिशियल सांग जारी किया जाता है। इस विश्व कप का आधिकारिक गीत है --ओले ओला यानि वी आर वन.… जेनिफर  लोपेज़ पिटबुल  क्लाडिया लिट्टे द्वारा गाया ये गीत इसी वर्ष २४ जनवरी को फीफा और सोनी म्यूजिक  जारी किया।

*इसके बाद मार्च में फीफा ने एविसी,कार्लोस सन्ताना,वायक्लिफ़ जीन और अलेक्जेंडर पाइरेस के लिखे गीत डार अम जीतोयानि वी विल फाइंड अ वे.…  वर्ल्ड कप का  एंथम घोषित किया है।
                       
                                                                                    *इस वर्ल्ड कप का शुभंकर फुलेको है।
ये ब्राज़ील में पाया जाने वाला जानवर है जिसकी पीठ पर कवच होता है अर्माडिलो नाम के इस जानवर का ये नामकरण ओन लाइन वोटिंग के ज़रिये किया गया।

       

                                                                                                                                                                  *ऑनलाइन वोटिंग के द्वारा ही एडीडास द्वारा बनाई गयी आधिकारिक बॉल का नामकरण किया गया इस बॉल का नाम होगा ब्राजुका।
                                   
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                   * २०१० के वर्ल्ड कप के दौरान एक अफ़्रीकी वाद्य यन्त्र वुवुज़ेला काफी लोकप्रिय हुआ था।  बाकायदा एक ऑफिसियल वाद्य यन्त्र घोषित किया गया है।  नाम है काक्सीरोला। इस ब्राज़ील के संगीतकार कार्लिनहोस् ब्राउन द्वारा बनाया गया है। हलाकि सुरक्षा कारणों से लोग इस स्टेडियम के अंदर नहीं ले जा पाएंगे।                                
                                 
                                 
वर्ल्ड कप फाइनल्स के लिए प्रत्येक क्षेत्र का कोटा निर्धारित है। प्रत्येक क्षेत्र से टीमें क्वालीफाई करके आती हैं। इस बार एशिया और उत्तरी अमेरिका से चार चार,अफ्रीका से पांच,दक्षिण अमेरिका से छह और यूरोप से तेरह टीमें हैं जबकि ओशियाना ग्रुप से कोई टीम नहीं है। इन टीमों को चार चार के आठ ग्रुप में बांटा गया है। प्रत्येक ग्रुप में एक टीम पहली आठ रैंकिंग वाली टीम है, दूसरी दक्षिण अमेरिका या अफ्रीका की टीम है,तीसरी यूरोप की टीम और चौथी एशिया या अमेरिका की टीम है। ग्रुप में टीमें राउंड रोबिन आधार पर खेलेंगी और ग्रुप की दो टॉप टीम नॉक आउट दौर में आगे बढ़ेंगी।

ग्रुप ए-ब्राज़ील,क्रोशिया,मैक्सिको,कैमरून

ग्रुप बी-स्पेन,नीदरलैंड,चिली,ऑस्ट्रेलिया

ग्रुप सी-कोलंबिया, ग्रीस,आइवरी कोस्ट,जापान
 ,
ग्रुप डी-उरुग्वे,कोस्टारिका,इंग्लैंड, इटली
,
ग्रुप ई-स्विट्ज़रलैंड, इक्वाडोर, फ़्रांस,होंडुरस

ग्रुप ऍफ़- अर्जेंटीना,बोस्निया हर्ज़ेगोविना,ईरान,नाइजीरिया
,
ग्रुप जी-  जर्मनी,पुर्तगाल,घाना,यु. एस. ए
.
ग्रुप एच-बेल्जियम,साउथ कोरिया,अल्जीरिया,रूस

                          निश्चित रूप से ग्रुप जी और डी कठिन ग्रुप हैं।सबसे प्रबल दावेदार तो मेज़बान ब्राजील है। इस के आलावा जर्मनी पर लोगो की विशेष निगाहें रहेंगी। पिछले चैंपियन स्पेन अर्जेंटीना इटली नीदरलैंड भी बड़ा उलटफेर करने में सक्षम हैं।

                                                     





















Tuesday, 10 June 2014

आँसू




ये आंसू भी अजीब शै हैं। ख़ुशी में छलक जाते हैं और ग़म में बहने लगते हैं। 8 जून को रोलाँ गैरों की लाल मिट्टी पर समकालीन लॉन टेनिस के इतिहास के दो महान खिलाड़ी फ्रेंच ओपन का फ़ाइनल मैच खेलने
उतरे होंगे तो ना तो जोकोविच को और ना राफा को ये पता होगा कि उनकी आँख से आँसू छलकेंगे या बहेंगे। वे दोनों तो अपना अपना नाम खेल इतिहास में लिखने आए थे। यदि जोकोविच चारों ग्रैंड स्लैम जीतने वाले सात महान खिलाड़ियों की लिस्ट को और बड़ा करना चाहते थे तो नडाल निश्चित ही रोलाँ गैरों पर जीत की सूची  को कुछ और लम्बा  करने की चाहत लिए मैदान में उतरे होंगे। साढ़े तीन घंटे बीतते बीतते राफ़ा हाथ में मस्केटियर ट्रॉफी उठाए थे। ट्रॉफी से चिपकी उँगलियों पर लगे टेप उनकी असाध्य परिश्रम की कहानी बयाँ कर कर रहे थे और उनके भीतर सफलता के  असीम आनंद से फूटे स्रोते की कुछ बूंदे आँखों से  छलक छलक बाहर आ जाती थी। आँखों से छलका ये पानी खारा नहीं शहद जैसा मीठा था जिसे  राफा ही नहीं बल्कि उन जैसी सफलता पाने वाला हर शख़्स जानता होगा। कुछ क्षणों बाद जोको की आँख भी नम थीं ठीक राफा की तरह। फ़र्क इतना सा था कि इस पानी में सारे समन्दरों का खारापन सिमट  आया था जो उनके ग़म को डूबने नहीं देता था बल्कि फिर फिर दिल से उबार उबार कर चेहरे पर ले आता था।  सच में अजीब शै है ये आँसू। 


Friday, 6 June 2014

क्षणिका



ज़िन्दगी में कुछ लम्हें ऐसे आते हैं
जो गुज़र कर भी
गुज़रते नहीं
बल्कि जिन्दगी के साथ
हमेशा के चस्पाँ हो जाते हैं !

Wednesday, 4 June 2014

सच



तुमने प्यार में खुद को 
धरती बना डाला
पर
मैं
खुद को
बादल ना बना पाया
तुम समझी
मैं बरस कर
तुम्हारे मन को प्रेम रस में पगाना नहीं चाहता 
 पर
ये सच नहीं था
सच ये था
 मैं
तुम्हारे अंदर की आग को
बुझते नहीं देख सकता था।


तुमने प्यार में खुद को
नदी बना दिया
पर
मैं
समन्दर  ना बन सका
तुम समझी
मैं
प्रेम का प्रतिदान ना कर सका
पर
ये सच नहीं था
सच ये था
मैं
तुम्हारे वज़ूद को
खत्म होते नहीं देख सकता था।