Tuesday, 22 July 2014

लॉर्ड्स की ऐतिहासिक विजय


      भारत और इंग्लैंड के बीच वर्तमान श्रृंखला के दूसरे टेस्ट मैच के अंतिम दिन जब जो रूट और मोईन अली बैटिंग करने क्रीज़ पर आए थे उस समय कम ही लोग ये सोच रहे होंगे कि क्रिकेट के मक्का "लॉर्ड्स" के मैदान पर क्रिकेट के जनक इंग्लैंड का इस तरह मान मर्दन होगा। उनके ऐसा सोचने के पर्याप्त कारण भी थे। भारतीय टीम का रिकॉर्ड ये बता रहा था कि भारत ने इससे  पहले 81 साल के इतिहास में जो 16 मैच खेले हैं उनमें से मात्र एक बार 1986 में कपिलदेव के नेतृत्व में जीत हासिल की है। वरना तो बाकी 15 में से 4 ड्रा किये और 11 में हार ही खाई थी। फिर 2011 का दौरा भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा था जिसमें भारत ने बुरी तरह मुँह की खाई थी और चारों टेस्ट हार गई थी।  फिर गेंदबाज़ी भारत की कमज़ोर कड़ी है और इस बात पर यकीन कर पाना थोड़ा कठिन था कि भारतीय गेंदबाज 319 रनों से पूर्व इंग्लैंड के 6 विकेट आउट कर पाएंगे।लंच से पूर्व की अंतिम गेंद से पहले तक कल के नॉटआउट बैट्समैन अली और रुट ने अपनी विकेट बचा कर लोगों को ये सोचने के लिए बाध्य भी कर दिया कि कोई नई इबारत नहीं लिखी जाने वाली है। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। युवा भारतीय टीम ने नई  इबारत लिख ही डाली। दरअसल 95 रनों से इंग्लैंड की ये हार उसके उन जख्मों पर नमक छिड़के जाने जैसी थी जो जख़्म ऑस्ट्रेलिया और उसके बाद श्रीलंका से हार कर मिले थे।
                मैच जीतने के बाद आदरणीय उदय प्रकाश जी ने फेसबुक पर एक पोस्ट लगाई 'एक लगान परदे के बाहर"। लेकिन परदे के बाहर मैदान का ये लगान परदे पर के लगान से भिन्न था। परदे की लगान  में आमिर और उनके साथी अंतिम पारी खेल रहे थे जिसमें उनका लगान ही नहीं बल्कि उनका मान सम्मान,पूरा जीवन और उनके इंसान होने का एहसास सभी कुछ दांव पर लगा था। वे कड़ा संघर्ष कर उस चुनौती से पार पाते हैं। और वे ऐसा कर इसलिए पाते हैं कि भारतीय किसान सदियों से इतनी भीषण परिस्थितियों से संघर्ष कर सरवाइव करता रहा है और अपने जीवन को बचाने और अपने वज़ूद को मनवाने का वो संघर्ष,संघर्ष नहीं उसके जीवन में घटित होने वाली क्रिया थी जिसे वो रोज़ ही अंजाम देता आया है। वहां अंग्रेज़ मुँह की खाते हैं। पर अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अपने मान सम्मान की रक्षा की ज़रुरत अंग्रेज़ों को है। कम से कम क्रिकेट में तो निश्चित ही। पहले बात लॉर्ड्स मैदान की। आख़िरी पारी  अँगरेज़ खेल रहे थे। उन्हें लक्ष्य मिला था। सम्मान भी उन्हीं का दांव पर था। होम ऑफ़ क्रिकेट कहे जाने वाले मैदान पर क्रिकेट के जन्मदाता की सम्पूर्ण साख दांव पर थी। अपने मैदान पर अपने लोगों के बीच भारत जैसे देश की टीम जिस पर उसने कई सौ साल राज किया हो वो उसे हरा दे। तो सम्मान किसका दांव पर लगा ? एक और फ़र्क़ था। आमिर की टीम अपना लक्ष्य हासिल करती करती है। पर वास्तविक मैदान पर अंग्रेज़ ऐसा करने में असफल रहते हैं। बस एक ही समानता है अंग्रेज़ दोनों जगह हारते है। घमंड दोनों जगह हारता है। संघर्ष दोनों जगह जीतता है। 
       बात सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं है। भारत अब बड़ी आर्थिक ताक़त है। सिर्फ आर्थिक क्षेत्र में ही नहीं क्रिकेट में भी। बीसीसीआई इस समय क्रिकेट जगत की सबसे बड़ी नियामक संस्था है। क्योंकि भारत में क्रिकेट धर्म बन चुका है ,क्रिकेट का भगवान भी भारत का ही है। भारत में इसकी लोकप्रियता का लाभ उठा कर और कारपोरेट शैली में क्रिकेट का प्रबंधन कर बीसीसीआई सबसे धनवान और इसलिए सबसे शक्तिशाली संस्था बन चुकी है। एक समय था जब क्रिकेट प्रबंधन में इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की तूती बोलती थी। भारतीय खिलाड़ी हमेशा अपने साथ भेदभाव तथा अन्याय की शिकायत करते थे। आज इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया ये शिकायत करते हैं कि बीसीसीआई अपने शक्तिशाली और अमीर होने का नाज़ायज़ फ़ायदा उठा रहा है। जो भी हो क्रिकेट में भारत का प्रभुत्व और शक्ति का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है। (ये दीगर बात है कि उसने खेल का कितना नुक्सान किया है और इस पर अलग से बहस होनी चाहिए )
              इसी समय आदरणीय रमेश उपाध्याय जी ने भी एक पोस्ट लगाई है ब्रिक्स देशों द्वारा विकास बैंक की स्थापना के सम्बन्ध में। इसमें उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की एक टिप्पणी भी उद्धृत की है 'America must always lead on the world stage. If we don't, no one else will.'दरअसल ये टिप्पणी विकसित देशों के बौखलाहट का,उनके भीतर बढ़ती असुरक्षा का आइना है जिसमें हम आने वाले समय में पश्चिम और विकसित देशों की घटती भूमिका को साफ़ साफ़ देख सकते हैं। निश्चित ही बहुत से देश उन पर उस हद तक निर्भर नहीं रहे जिस हद तक वे चाहते हैं। रियो दे जेनेरो में ब्रिक्स देशों की बैठक में अपना विकास बैंक बनाने के निर्णय और भारत के लॉर्ड्स के मैदान में ऐतिहासिक विजय को और क्रिकेट में भारत  बढ़ती ताक़त को ऐसी घटनाओं के रूप में देखा जाना चाहिए जो विकसित पश्चिम के घटते प्रभुत्व को और उन पर  विकासशील देशों की कम होती निर्भरता को रेखांकित करती है। फीफा विश्व कप फुटबॉल में ब्राज़ील और अर्जेंटीना की हार से आहत लोगों के लिए भारत की ये जीत राहत की बात होनी चाहिए। भारतीय टीम को इस जीत पर लख लख बधाइयाँ। 
                                  





  

  

Thursday, 10 July 2014

फुटबॉल विश्व कप 2014_6



              8 जुलाई 2014 को बेलो होरिज़ोंटा का एस्टोडिया  मिनिराओ 1950 में रियो डी जेनेरो के एस्टोडिया मरकाना की तरह  एक ऐसा कब्रगाह बन रहा था जिसमें ब्राज़ील की उम्मीदें,गर्व तथा फुटबॉल सभी कुछ दफ़न हो हो रहा था और जिसे ब्राज़ीलवासी  ही नहीं बल्कि ब्राज़ील फुटबॉल को चाहने वाले लाखों करोड़ों फुटबॉल प्रेमी असहाय से डबडबाई आंखो से देख रहे थे । जब मिरोस्लाव क्लोस वर्ल्ड कप फाइनल्स का अपना 16वां और मैच का 2सरा गोल कर रहे थे तो वे केवल ब्राज़ील के रोनाल्डो के वर्ल्ड कप फाइनल्स में सर्वाधिक 15 गोल करने का रिकॉर्ड ही नहीं तोड़ रहे थे बल्कि लाखों ब्राज़िलियों का दिल भी तोड़ रहे थे और उनका अपनी मेज़बानी में 6वीं बार विश्व कप जीतने का सुन्दर सलोना सपना भी चकनाचूर कर रहे थे। नेमार उस समय बिस्तर पर लेटे इस अंत्येष्टि क्रिया को देख रहे होंगे तो उनका दिल तार तार हो उस घडी को कोस रहा होगा जब वे चोटिल हुए थे।  इधर जर्मनी की टीम गोलों की बरसात कर रही थी और उधर ब्राज़ीलवासी आसुओं की झड़ी लगा रहे थे।  शायद इसीलिये ईश्वर ने ये विधान रचा कि अटलांटिक महासागर के अलनीनो फैक्टर के प्रभाव से हिन्द महासागर के देशों में इस बार कम मानसूनी वर्षा होंगी क्योंकि उस पानी की ज़रूरत ब्राज़ीलवासियों को आंसू बहाने में अधिक जो होनी थी।
                              दरअसल ब्राज़ील की ये शर्मनाक पराजय विकसित यूरोपियन दर्प के सामने विकासशील अस्मिता का चूर चूर हो जाना था। ठीक वैसे ही जैसे 15वीं शताब्दी में और उसके बाद के समय में यूरोपीय देशों ने अपनी संगठित सेनाओं के बल पर तमाम देसी राज्यों की कमजोरी का फायदा उठा उनकी अस्मिता को तहस नहस कर उनपर लम्बे समय तक कब्ज़ा जमाए रक्खा। ये पराजय एक संगठित सेना  के सामने नेतृत्व विहीन सेना द्वारा आत्मसमर्पण था। यदि आप अपनी स्मृति के घोड़े दौड़ाएंगे तो आपको याद आएगा  कि नेमार के बिना ब्राज़ील की टीम इतिहास में उल्लिखित सेनाओं जैसी प्रतीत हो रही थी जो पूरी तरह राजा की वीरता  और उसके युद्ध कौशल पर निर्भर होती थी। जब तक राजा युद्ध  मैदान में अपना पराक्रम दिखाता रहता तब तक उसकी सेना भी लड़ती रह्ती और सफ़लता प्राप्त करती रहती। ऐसे में सेना की सारी ख़ामियां छुपी रहतीं। लेकिन राजा के खेत रहते ही सेना में भगदड सी मच जाती। नेतृत्त्व विहीन सेना बिना किसी योजना के  और तेजी से आक्रमण तो करती पर अपनी सुरक्षा का कोई ध्यान ना रखती। फलस्वरूप दुश्मन आसानी से कमजोर रक्षण का फ़ायदा उठाकर सेना को तहस नहस कर किला फतह कर लेता। ब्राज़ील की टीम ने ऐसा ही किया। नेमार जब तक टीम में थे वे अपने दम पर टीम को जिताते रहे और टीम की ऱक्षा पंक्ति की सारी कमी छुपी रहीं। लेकिन जैसे ही उनका हीरो नेमार घायल हो मैदान से रूख़सत हुआ टीम छितर बितर हो गई। उसने आक्रमण में कोई कमी नहीं छोड़ी। जर्मनी के टारगेट पर 12 शॉट के मुक़ाबिल ब्राज़ील ने  13 शॉट लगाए। पर नेतृत्व विहीन टीम ने घबराहट में रक्षण को पूरी तरह वल्नरेबल बना दिया और करारी शिकश्त खाई।
                ब्राज़ील टीम की पराजय का मंचन भले ही 8 जुलाई को एस्टोडिया  मिनिराओ में हुआ हो पर इसकी पटकथा 4 जुलाई को फोर्टेलिज़ा में कोलंबिया के ख़िलाफ खेले गए क्वार्टर फाइनल मैच के 86वें मिनट में उस समय लिख दी गयी थी जब कोलंबिया के जुआन कमिलो जुनिगा ने नेमार के घुटने में चोट मारी थी। 1950 में रिओ डी जनेरो  मरकाना में उरुग्वे के हाथों पराजय का दर्द आज 64 साल बाद भी ब्राज़ीलवासियों को सालता है। आप समझ सकते हैं कि इस जख्म को ठीक होने में शायद सदियां ग़ुज़र जाएं।

Saturday, 5 July 2014

13वां हॉकी विश्व कप

                        


    नीदरलैंड में आयोजित हॉकी विश्व कप का 13वां संस्करण आई.पी.एल.टी-20 क्रिकेट के शोर, फ्रेंच ओपन टेनिस के ग्लैमर और फीफा वर्ल्ड कप के रोमांच के बीच कहीं खो सा गया थागत 31 मई से 15 जून 2014 तक नीदरलैंड के हेग के क्योसेरा स्टेडियम में 13वीं हॉकी विश्व कप प्रतियोगिता संपन्न हुई। ये तीसरा मौक़ा था जब ये प्रतियोगिता नीदरलैंड में आयोजित हो रही थी। इससे पूर्व 1973 और 1998 में भी नीदरलैंड इस प्रतियोगिता की मेज़बानी कर चुका है।और इस विश्व कप में भारत का प्रदर्शन भी सन्नाटे में निकल गया। कोई हो हल्ला या लानत मलानत नही हुईं। 
              हॉकी खेल -याद है ना आपको। अरे वही जो हमारा राष्ट्रीय खेल है और जिसमे हम कभी बुलंदी पर होते थे।  पर अब नहीं हैं। उसकी छाया मात्र बन कर रह गए हैं। उन बुलंदियों को फिर से छूने की चाह बरकरार है ,कोशिशें भी हो रहीं हैं। पर पता नहीं क्या बात है ये कोशिशें क़ामयाबी में तब्दील नहीं हो पातीं। जब भी भारतीय हॉकी टीम कोई बड़ा टूर्नामेण्ट खेलने जाती हैं तो भारतीयों की उम्मीदें जवां होने लगती हैं कुछ करिश्मा होने की आस में। पर हाथ कुछ नहीं लगता। फिर-फिर असफलता की कहानी अपने को दोहराती जाती है। हेग में भी ऐसा ही कुछ हुआ
                  इस प्रतियोगिता में 31 मई को भारतीय टीम आठवीं रैंकिंग के साथ शामिल हुई थी  और 15 जून को नौवीं रैंकिंग के साथ वापस लौटी। भारत को विश्व विजेता ऑस्ट्रेलिया,इंग्लैंड,बेल्जियम,स्पेन और मलेशिया के साथ ग्रुप ए में गया था। पहले मैच में भारत बेल्जियम से 2-3 से और दूसरे मैच में इंग्लैंड से 1-2 से हार गया। यहां महत्त्वपूर्ण बात ये है कि भारत के विरुद्ध दोनों मैचों में विजयी गोल अंतिम ३० सेकेंड में हुए। ये हाल के दिनों की भारतीय हॉकी टीम की सबसे बड़ी कमजोरी रही है। टीम अंत तक सस्टेन नहीं कर पाती। अगला मैच स्पेन से ड्रा खेला। प्रतियोगिता की पहली जीत मलेशिया के विरुद्ध मिली जिसे उसने 3-2 से हराया। पर अंतिम मैच में ऑस्ट्रेलिया से 0-4 से हार गई। इस प्रकार अपने ग्रुप में पाँचवें स्थान पर रह्कर प्ले ऑफ मुकाबले में नवें व दसवें स्थान के लिए दक्षिण कोरिया से खेले और इस मैच में उसे 3-0 से हराकर नौवां स्थान प्राप्त किया। 
                        प्रतियोगिता ऑस्ट्रेलिया ने जीती।  उसने पूरी प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन किया। ग्रुप के पाँचों मैच जीत कर 15 अंकों के साथ ग्रुप में पहले स्थान पर रही। उसके डॉमिनेशन को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि उसने ग्रुप स्टेज में 19 गोल किए और 1 गोल खाया। इस ग्रुप से दूसरी टीम इंग्लैंड की थी जिसने सेमीफाइनल के लिए क्वालीफाई किया। दूसरे ग्रुप से मेजबान नीदरलैंड और अर्जेंटीना ने क्वालीफाई किया। सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया अर्जेंटीना को 5-1 से और नीदरलैंड इंग्लैंड को 1-0 से हराकर फ़ाइनल में पहुँची। फ़ाइनल में भी ऑस्ट्रेलिया ने अपना शानदार खेल जारी रखा और मेज़बान नीदरलैंड जैसी मज़बूत टीम को 6-1 से रौंदकर लगातार दूसरी बार और कुल मिलाकर तीसरी बार हॉकी का विश्व चैम्पियन बना। अर्जेंटीना ने इंग्लैंड को हराकर तीसरा स्थान प्राप्त किया। अर्जेंटीना ने पहली बार इस प्रतियोगिता के सेमीफाइनल में प्रवेश किया था।
                 विश्व कप में भारत के इस प्रदर्शन पर मैंने भारत के पूर्व अंतर्राष्ट्रीय हॉकी ख़िलाड़ी और इस समय एयर इंड़िया में ए.जी.एम. सुजीत कुमार से बात की। प्रस्तुत हैं उस बातचीत के कुछ अंश

प्रश्न:-अभी हाल ही में हेग में संपन्न विश्व कप में भारत के प्रदर्शन को आप किस नज़रिये से देखते हैं ?


उत्तर:-देखिए हमेशा परफॉरमेंस ही काउंट की जाती है। अगर परफॉरमेंस ख़राब हुई है तो लोग उसको क्रिटीसाइज करेंगे हीं मतलब हमारी टीम को। लेकिन खिलाड़ी होने के नाते यदि हम देंखे, पूरे टूर्नामेंट के मैच मैंने देखे हैं,तो हमारी टीम में और बाकी टीमों में कोई अंतर नहीं था। सभी टीमें एक बराबर थीं,एक समान थीं। लेकिन फ़र्क़ ये था कि दूसरी टीमों के अनुभवी खिलाड़ी अपने अनुभव का इस्तेमाल करते थे ग्राउंड में,लेकिन हमारे जो खिलाड़ी अनुभवी हैं उनका अनुभव हमारी टीम के लिए कभी भी फायदेमंद साबित नहीं हो रहा था। भई,कोच तो आपको ग्राउंड के बाहर बता देगा,ग्राउंड के अंदर तो बताएगा नहीं। जितने भी मैच उन्होंने हारे हैं या ड्रॉ किए हैं उनमें आखिरी 12 सेकेण्ड या 15 सेकेण्ड में हमारे ऊपर गोल पड़ा। जबकि एक अच्छी टीम के डिफेंडर लास्ट मोमेंट पर,डाइंग मोमेंट पर अपनी टीम को बचाने की कोशिश करते हैं। अगर आगे गोल नहीं हो रहा है तो पीछे भी हमारे ऊपर गोल ना हो और ये सारा का सारा दारोमदार अनुभवी खिलाड़ी के ऊपर निर्भर करता है। अगर आपका अनुभव टीम के लिए काम नहीं आया तो उस अनुभव का क्या फायदा। दूसरी चीज़ हमारी टीम में जीतने की जो ललक है उसमें हमेशा कमी देखी है। उनको जीतने की भूख होनी चाहिए ,उस भूख को जगाना चाहिए। लेकिन हमको लगता है पेट भरा हुआ है,इसलिए किसी को जीत की भूख़ ही नहीं है। मेरा ये मानना है कि हमारी टीम थोड़ी सी चूक की वजह से आज निचले पायदान पर आई है। अगर ये थोड़ा सा सँभल कर खेलते,थोड़ा अनुभव का इस्तेमाल करते और ये सोचते कि डाइंग मोमेंट पर हमारी टीम के ऊपर गोल नहीं होना चाहिए तो हो सकता था कि हमारी टीम सेमीफाइनल में खेलती। वो सेमीफ़ाइनल खेलने वाली टीम थी।


प्रश्न :-कुल मिला कर आप ये कहना चाहते हैं कि टीम का चयन ठीक था। अब दो प्रश्न उठते हैं एक,सरदारा,रघुनाथ,वीरेंदर ये ही तीन चार अनुभवी ख़िलाड़ी टीम में थे  और उनका अनुभव ठीक से काम नहीं आया ? दूसरे,खिलाडियों की फिजिकल फिटनेस अच्छी नहीं थी? वे 70 मिनट खेलने लायक नहीं थे? 

उत्तर:-देखिए आज की डेट में जो हमारी हॉकी टीम है वो फिट है।आप ये मान के चलिए कि हमारी टीम में फिटनेस की क़ोई कमी नहीं थी। अब आपने जो चार पांच लड़कों के नाम लिए वे अनुभवी थे यानि डिफेंस में हमारे पास अनुभवी खिलाड़ी थे,वो क्या कर रहे थे ?रुपिंदर पाल भी अच्छा ख़िलाड़ी है। मैं उसे बहुत अच्छा खिलाड़ी मानता हूँ। एक और डिफेन्स का अच्छा खिलाड़ी था। अगर आपके पास एक भी डिफेन्स का अच्छा खिलाड़ी है तो वो क्या करता है कि वो अपनी डिफेन्स को खिलाता हैं ,गाइड करता है।  हम ऑवर आल परफॉरमेंस देंखे तो श्रीजेश एक्सीलेंट प्लयेर हैं। जिस हिसाब से उसने खेला,परफॉर्म किया ,अगर वो परफॉर्म नहीं करता तो  हो सकता है इंडिया के ऊपर और गोल पड़ते। पर मेरा ये कहना है कि पूरी टीम अनुभवी नहीं होती। हमेशा एक्सपीरिएंस और यंग को मिलाकर टीम बनती है। यंग का काम होता है अटैक करना और स्पीड़ को बनाए रखना और अनुभवी खिलाड़ियों का काम होता है अपने अनुभव के साथ उन लड़कों को फीडिंग करना,अपने गोल को बचाना और टाइम टू टाइम स्ट्रैटजी चेंज करना।

प्रश्न:-आप ये कहना चाहते हैं कि सीनियर खिलाड़ी अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा पाए ? 

उत्तर:-बिल्कुल,वो ठीक से नहीं निभा पाए। ख़ास तौर पर हम डिफेंडर्स को बोलेंगे।10 -15 सेकंड का समय बचा है,आप बराबर चल रहे हैं आप जीत नहीं सकते,कम से कम आपके पास एक पॉइन्ट तो होना चाहिए ।10 -15 सेकंड बचा है,आप गोल खा गए,ये कहाँ की तुक हैं। एक दो सिचुएशन तो ऐसी थी कि उनका फॉरवर्ड आ रहा है हमारे दो डिफेंडर उसे टैकल कर रहे हैं। भई एक को टैकल करने देते और आप उनको बैक से कवर करते। अगर उससे बॉल निकलती तो आप टैकल कर लेते। अब एट ए टाइम दोनों प्लयेर चले गए टैकल करने। एक ही बाल पर बीट हो गए दोनों तो गोल हो गया। जो भी सीनियर अनुभवी खिलाड़ी हैं उन्हें सोचना चाहिए कि जो डेंजर ज़ोन है 'डी' उसमें अगर बॉल आती है वो भी डाईंग मोमेंट में जहाँ पर गोल होने के बाद हमारे पास गोल उतारने के लिए समय नहीं रहेगा तो ऐसे मोमेंट में अपने को बड़ा सँभाल के खेलना चाहिए। हम इतने बड़े टूर्नामेंट में जा रहे हैं हमारा एक एक डिसीजन बड़ा वैल्युएबल है।


प्रश्न:-आप कह रहे हैं खिलाड़ी अपने अनुभव का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं?समस्या सिर्फ इतनी सी है या इससे बढ़कर है ?


उत्तर:-सच बात ये है कि हमारी जो अग्रिम पंक्ति थी वो इस लायक नहीं थी वो बड़े टूर्नामेंट में चैलेंज पेश कर सके।


प्रश्न:-अगर बार बार गलती हो रही है तो क्या इसके लिए कोच को भी जिम्मेदार माना जाना चाहिए या सिर्फ खिलाड़ी ही जिम्मेदार हैं ?


उत्तर:-कोच  की तो  बहुत लोग आलोचना कर रहे हैं कि विदेशी कोच आया हैं। उसको इतना पैसा दे रहे हैं नौ नौ लाख रुपया और इंडियन कोच को पैसा नहीं देते। जब टीम जीतती है तो सब एक सुर में बोलते हैं कोच बहुत अच्छा था। जब टीम हारती है तो एक सुर में बोलते हैं कोच बेकार है यार। देखिए जो कोचेज़ हैं वे वर्ल्ड के बेस्ट कोचेज हैं। लेकिन कोच कभी भी अपने खिलाड़ियों को घोल के नहीं पिलाता।ट्रेनिंग सेशन में वो सब कुछ बताएगा। लेकिन मैदान में सीनियर खिलाड़ी मह्त्वपूर्ण है। अगर हम सीनियर हैं और अपने अनुभव का इस्तेमाल नहीं कर सकते तो लानत है ऐसे 200-300 मैच खेलने पर। मेरा ये मानना है कि जो सीनियर प्लयेर खेल रहे थे उन्होंने अपने अनुभव का इस्तेमाल नही किया। दूसरे जो यंग प्लेयर खेल रहे थे वे बॉल प्रॉपर रिसीव नहीं कर पा रहे थे। इनको चाहिए कि जो यंग प्लयेर हैँ उनको ज्यादा से ज्यादा खिलाएं ,उनको ज्यादा एक्सपोज़र दें ताकि उनको ये पता लग सके कि हॉकी इंडिया लीग खेलना अलग चीज़ हैं और वर्ल्ड कप,ओलम्पिक,एशियाड खेलना अलग चीज़ है। उन्हें ये पता होना चाहिए कि हॉकी इंडिया लीग हिन्दुस्तान में होती है और वर्ल्ड कप,ओलंपिक विदेशों में खेलते हैं। जब आप विश्व की टॉप टीमों के विरुद्ध खेलते हैं तो इसके लिए आपको इतना एक्सपीरिएंस होना चाहिए,गेम की इतनी नॉलेज होनी चाहिए कि कब आपको बॉल रिसीव करना करना है,कहाँ करना है और कब कहाँ पास देना है
                                       सबसे बड़ी चीज़ है कि हॉकी बहुत तेज़ हो गयी है। फार्मेशन लगातार चेंज करते जा रहे हैं। हमारे पास आज की तारीख़ में एक भी ऐसा खिलाड़ी नहीं है जो विपक्षी को स्पीड़ में बीट कर सके। अब यूरोपियन ड्रिब्लिंग करके प्लेयर को बीट कर रहे हैं,डॉज मार रहे हैं। लेकिन हमारे एक भी खिलाड़ी में ये क्वालिटी नहीं है जो वन बाई वन एक भी ख़िलाड़ी को  बीट कर सके डॉज देकर। फिर हर खिलाड़ी में एक ना एक क्वालिटी ऐसी होती है जिसकी वज़ह से वो जाना जाता है राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर। हमारे बहुत से ऐसे खिलाड़ी हैं जो हॉकी इंडिया लीग तो खेलते हैं लेकिन बाहर खेलने का अनुभव उन्हें नहीं है।

प्रश्न:-पहले हम गोल्ड की बात करते थे। फिर हम मेडल की बात करने लगे। इस बार जब कोच से भारतीय टीम के बारे में पूछा गया तो तो उन्होंने कहा हमारा लक्ष्य पहले 6 स्थानों पर आने का है। ये हॉकी में निरन्तर गिरावट की और संकेत करता है। आप इसे किस नज़रिये से देखते हैं ?

उत्तर:-देखिये कोच को अपनी टीम की काबिलियत पर भरोसा नहीं है। इसलिए वो ये तो नहीं कहेगा कि टीम मैडल लाएगी। लेकिन मैं मानता हूँ कि टीम में इतनी खूबी थी कि कभी भी किसी भी मैच का पासा पलट सकती थी। प्रॉब्लम हमारी टीम में ये कि कन्सिस्टेंसी नहीं है। हमारी टीम आज अच्छा खेलेगी ,कल बुरा खेल जाएगी। कभी एक ही मैच में पैचेज में अच्छा खेलते हैं पता चला 10 मिनट अच्छा खेले 15 मिनट खराब खेले। अच्छी टीम वो होती है जो लगातार अच्छा खेलती है।हर किसी का ऑफ डे होता है।  बड़ी बड़ी टीमों का भी। हॉलैंड ने फाइनल में ऑस्ट्रेलिया से 6 गोल खा लिए क्योंकि उस दिन उनका ऑफ डे था। लेकिन जो टीम पैचेज में अच्छा खेलती है वो ज्यादा समय तक सस्टेन नहीं करती है। 

प्रश्न:-तो फिर समस्या का समाधान क्या है ?

उत्तर:- देखिये समस्या सॉल्व करने का एक ही तरीका है कि हमारी हॉकी की जो खामी हैं वो है 'लेक ऑफ़ क्वांटिटी' . क्रिकेट को देख लीजिए एक कैंप लगता है तो 5000 बच्चे आ जाते हैं,हॉकी का लगता है तो 250 बच्चे भी नहीं आते। अगर आपके पास क्वांटिटी नहीं है तो क्वालिटी कहाँ से जनरेट करेंगे।पर जो सबसे अच्छी चीज़ है वो है हॉकी इंडिया लीग। वो बेहतरीन हो रही है। आगे आने वाले चार पाँच सालों में इसके रिजल्ट मिलने शुरु हो जाऐंगे। लेकिन ग्रास रुट लेवल पर कुछ काम नहीं हो रहा है जिसकी जरूरत है। 

प्रश्न:-आपने थोड़ी देर पहले कहा कि भारतीय टीम में जीत की ललक नहीं है। हॉकी लीग से प्लेयर्स को अच्छा पैसा मिल रहा है। ऐसा तो नहीं कि ख़िलाड़ी इससे संतुष्ट  हो ?कहीं लीग का ये दूसरा पक्ष तो नहीं ?

उत्तर:-नहीं,नहीं हॉकी लीग से लड़कों को पैसा मिल रहा है अच्छी बात हैं। और भी ज्यादा मिलना चाहिए। आप जिन को रोल मॉडल मानते हैं उनको अवार्ड मिल् रहा हैं तो आपके दिल में ये बात आती है जब इनको इतना पैसा मिल रहा है,टी वी पर आ रहे हैं ,अवार्ड मिल रहा है अगर हम भी मेहनत से खेलेंगे तो हो सकता है हम भी इनकी तरह हो जाएं। तो लड़कों में एक जागरूकता आती है,उत्साह जगता है।

प्रश्न:-भारतीय हॉकी में गलत क्या हो रहा है ?

उत्तर:-आज  हमारे देश में ग्रास रुट लेवल पर काम नहीं हो रहा है। आज दुनिया में सबसे ज्यादा हॉकी हॉलैंड और ऑस्ट्रेलिया में खेली जाती है। पूरे हॉलैंड में 600 से  ज्यादा एस्ट्रो टर्फ हैं। क्या हमारे हिन्दुस्तान में हैं। मेरे ख़्याल से भारत में 100 भी नहीं मिलेंगे। विदेशों में बच्चे को शुरू से ही एस्ट्रो टर्फ पर खिलाते हैं,शुरू से ही बच्चों के पास वैसी ही हॉकी होती है,वैसे ही टर्फ के शूज़ होते है,वैसी ही टैक्टिस अडॉप्ट करते हैं स्किल्सकी। हमारे यहां सारे बच्चे तो घास पर खेलते हैं। हमारे यहाँ एक और प्रॉब्लम है ओवर ऐज की अग़र 14 साल का टूर्नामेंट है और उसमें 16 साल का लड़का खेलेगा तो अच्छी परफॉर्म कर लेगा लेकिन ऐसे में 14 साल के लड़के का क्या होगा। तीसरी बात ये है कि हमारे हिन्दुस्तान में कोचेज़ की क्वालिटी ही इतनी गिरी हुई है तो वे बच्चों क्या सिखाएंगे ?

प्रश्न:-तो फिर ?

उत्तर:-तो ग्रास रूट लेवल पर बहुत काम करने की जरूरत है। उसमें ऐज को चैक करने की बहुत जरूरत है। फिर अच्छा एटमॉस्फियर देने की जरूरत है। अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर हो। बच्चों के पास टर्फ हो। इसका कारण ये है कि आपके पास 500 बच्चें हैं। उन्हें सेलेक्ट कर के इंडिया भेज दिया। उनका रिप्लेसमेंट कौन आएगा। आप एक लड़के को सेलेक्ट कर रहे हैं वो कितने साल इंडिया खेलेगा। पांच साल सात साल। तब उसको कोई रिप्लेस भी तो करेगा। अगर कोई रिप्लेस करेगा तो बच्चा आएगा कहाँ से। वो बच्चा तैयार कैसे होगा ? इन सब बातों पर सोचना होगा।

प्रश्न:-इस समय इण्डिया टीम में कौन से उदीयमान खिलाड़ी हैं जो वर्ल्ड क्लास बन सकते हैं ?

उत्तर:-निसंदेह सरदारा सिंह बेस्ट प्लयेर हैं 

प्रश्न:-उनके अलावा ?

उत्तर:-एक लड़का है रुपिंदर पाल सिंह। वो बहुत अच्छा है। क्योंकि जो डिफेंडर होता है उसकी पहली क्वालिटी होती है टैकलिंग-फॉरवर्ड प्लेयर हमको बीट करके ना जाए। पेनाल्टी कार्नर उसकी एडिशनल स्किल है। रुपिंदर पाल में क्वालिटी हैं,अच्छी टैकलिंग है,अच्छी हाइट है,अच्छी रीच है और अच्छा ड्रैग फ्लिकर है। हमको ऐसे ही प्लेयर चाहिए। गुरबाज सिंह भी बहुत अच्छा प्लेयर हैं।  उसमें गेम सेंस बहुत है। रघुनाथ ठीक है लेकिन उसको टैकलिंग की आदत होनी चाहिए। कोचेज को डिफेन्स पे कंसन्ट्रेट करना चाहिए।  

प्रश्न:-फॉरवर्ड में कोई बेहतरीन प्लयेर दिखाई देता है। आकाशदीप सिंह के बारे  आपके क्या विचार हैं ?

 उत्तर:-हमारे फॉरवर्ड में इस समय कोई ऐसा प्लेयर नहीं है जिसको आप बोल सकते हैं कि आने वाले समय में वो वर्ल्ड क्लास बन जाएगा। वर्ल्ड क्लास बनने की कई क्वालिटी होती हैं। एक दो क्वालिटी ऐसी होती हैं जिसमें आपका परफेक्शन होता है जैसे मोहम्मद शाहिद थे। मो. शाहिद वर्ल्ड के ऐसे प्लेयर थे जिनका दुनिया लोहा मानती थी। उनके पास स्किल था विथ स्पीड। आज की डेट में दो एक ऐसे प्लयेर हो जाएं तो हिंदुस्तान के वारे न्यारे हो जाएंगे क्योंकि अभी हमारे पास  एक भी ऐसा प्लेयर नहीं है जो ड्रिबल करके एक प्लयेर को बीट कर सके। 

प्रश्न:-इस समय देश में हॉकी की जो गतिविधियाँ चल रही, हॉकी को जो चलाने वाले जो लोग हैं- हॉकी इंडिया और हॉकी फेडरेशन के बीच  आज भी लड़ाई चल रही है। क्या इसका फर्क पड़ता है हॉकी पर?

उत्तर:-देखिए अब कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा है क्योंकि मि. नरेंद्र बत्रा जो काम कर रहे हैं वो हॉकी के प्रमोशन के लिए बहुत  बड़ी चीज हैं। नरेंद्र बत्रा अकेले इतना बड़ा काम कर रहे हैं। और हिन्दुस्तान में एक नरेंद्र बत्रा नहीं चाहिए बल्कि पचासों नरेंद्र बत्रा चाहिएँ जो डिफरेंट एरिया में,डिफरेंट जोन में हॉकी के लिए काम करें। नरेंद्र बत्रा अकेले काम कर रहे हैं,उनको चाहिए सौ हाथ काम करने के लिए। नरेंद्र बत्रा ने जो काम कर दिया है वो हॉकी फेडरेशन कभी नहीं कर सकी। मेरा ये मानना है कि नरेंद्र बहुत अच्छा काम कर रहे हैं जिसके रिजल्ट एक दो साल में मिलना शुरू हो जाएंगे। लेकिन एट दी सेम टाइम नरेंद्र बत्रा को इस बात पर कंसन्ट्रेट करना चाहिए कि हम ग्रास रुट लेवल पर कैसे लड़के तैयार करें। कैसे हम लोगों से मैनेज करें। लोगों से बात करें। हर स्टेट में जितने भी बड़े खिलाड़ी हैं,ओलम्पियंस हैं उनको बुलाकर सुझाव लें। होता ये है जो चापलूसी करते हैं वे ऑफिसियल बन जाते हैं। नरेंद्र बत्रा को मालूम होना चाहिए कौन उनके काम का है और कौन बेकार है। वो जिस हिसाब की हॉकी करा रहे हैं ऑफिसियल भी उसी कैलिबर का होना चाहिए।  

प्रश्न-आप इलाहाबाद से हैं। इलाहबाद में हॉकी की लम्बी परंपरा है।न केवल स्कूल स्तर पर बल्कि विश्वविद्यालय स्तर पर भी इलाहाबाद का क़ाफी नाम था। एल्बर्ट कैलब,सुजीत,दानिश और अब मुज़्तबा। अब इलाहाबाद में हॉकी ख़त्म हो रही है ?आप क्या सोचते हैं?

उत्तर:-इलाहाबाद में भी हॉकी की दयनीय स्थिति है। मैं कर्नलगंज इंटर कॉलेज का प्रोडक्ट हूँ। जिस समय हम हॉकी खेलते थे उस समय सी.आई.सी.;एम.आई.सी.; एम.वाए.एम.ए. ये दो तीन कॉलेज बड़े अच्छे थे। इसके अलावा ए.बी.आई.सी. में और जमुना क्रिश्चियन में भी हॉकी होती थी। इलाहाबाद में दो तीन गेम हीं चलते थे-फुटबॉल,हॉकी,क्रिकेट और टेनिस भी। हॉकी में तो इलाहाबाद का वर्चस्व हमेशा से बना रहा। लेकिन मैं वही कह रहा हूँ ना कि इंटरेस्ट कौन लेगा। इंटरेस्ट किसी ना किसी को लेना ही पड़ेगा। किसी को आगे आना ही पड़ेगा। अब खेल निदेशालय एडहॉक कोच रख लेता है आठ दस हज़ार मिल जाता है। वो मस्ती में आते हैं सुबह और चले जाते हैं। एस्ट्रो टर्फ हैं नहीं इलाहाबाद वाराणसी गोरखपुऱ  ये सब गढ़ होते थे हॉकी के। वहां पर टर्फ होनी चाहिए। वाराणसी में तो चलिए टर्फ है इलाहाबाद में नही है,गोरखपुर में नहीं है। ये सब तो पॉकेट्स थीं होखी की। दोबारा रिवाइव करने  लिए इनको इंफ्रास्ट्रक्चर भी देना होगा। अगर हम कहते हैं कि बच्चे तैयार नहीं हो रहे हैं तो तैयार करेगा कौन। अच्छे कोच भी तो लाने पडेंगे ,अच्छी ग्राउंड भी तो होनी चाहिए। 
              अभी एक दिन यूनिवर्सिटी ग्राउंड पर गया था देख़ा खेल हो रहा था। अभी सीनियर हॉकी प्लेयर जो इस समय इलाहाबाद के कमिश्नर भी हैं,से बात हो रही थी उन्होंने कहा सुजीत हम यूनिवर्सिटी मे एस्ट्रो टर्फ लगवाना चाहते हैं हमने कहा "मोस्ट वेलकम ". इलाहाबाद में एस्ट्रो टर्फ होइ चाहिए। इलाहाबाद हॉकी का गढ़ था,एकदम ख़त्म हो गया है। तो उसको किसी तरह से रिवाइव करना चाहिए। अब रिवाइव करना है तो रिवाइवल प्लान होना चाहिए आपके पास। रिवाइवल प्लान कौन बनाएगा ?खेल निदेशालय के अधिकारी बनाएंगे। वो इस तरह से प्लान बनाए कि इलाहाबाद की जो अंतर्राष्ट्रिय खिलाङी हैं उन्हें इनवॉल्व करें कि वे ग्राउंड में जाएँ। उनको जो भी पैसा देना है दीजिये। अरे भई यहाँ जो एडहॉक कोच हैं एकदम बेकार हैं। जो आठ दस हज़ार उन्हें दे रहे ये पैसा अपने शहर के अंतर्राष्ट्रीय खिलाडियों को दीजिए वे कोचिंग देंगे ग्राउंड में आकर।