Saturday, 31 December 2016

नया साल


नया साल 
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एक टुकड़ा सूरज अधूरी सुबह के लिए
एक हिस्सा रोशनी अधूरे दिन के लिए
एक कोना चाँद अधूरी रात के लिए
कुछ मुस्कुराहटें अधूरे क़ह्क़हों के लिए 
थोड़े से रंग अधूरी चाहतों के लिए 
थोड़ी सी उम्मीद अधूरे सपनों के लिए

पूरा मिले ना मिले 

बस इस थोड़े से बसर हो 
ज़िन्दगी मुकम्मल हो ना हो
मुकम्मल सी हो 
कि ज़िन्दगी अपनी हो ना हो
अपनी सी हो। 
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नए साल के इस मुबारक मौके पर कुछ हो ना हो कुछ आस हो, 
अपनों का साथ हो। 

Friday, 23 December 2016

इस सर्द मौसम


इस सर्द मौसम 

मिरा यार 
इस सर्द मौसम 
मेहताब नहीं 
आफ़्ताब सा लगता है 
शरारतन खुद को छुपा लिया है 
दीवार ओ धुंध के पीछे 
और हम हैं कि 
इक झलक उसकी पाने को 
इकटक सरे आसमाँ देखा करते हैं 
कि ख़ुदा के आगे हाथ उठते हैं 
उसके इश्क़ की रोशनी के लिए। 
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कि सर्द मौसम तेरी याद इतनी बेदर्द क्यूँ हो जाती है।  








Thursday, 15 December 2016

लिखना 'प्रेम'






लिखना 'प्रेम'
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जब बहुत सारे लोग कर रहे थे प्रेम
सीखना चाहा था मैंने लिखना
लिखना 'प्रेम'

तमाम लोगो के प्रेम करते रहने के समय में

तुम अचानक से आई थीं एक दिन
भोर में फूल के पत्ते पर सिमटी ओस की बूँद की तरह
तब देखा था तुम्हें पहली बार
मन की ज़मीं पर टपका था एक बूँद प्रेम
जिसे बदल जाना था दरिया में
तब चाहा था लिखना प्रेम।

तुम  लगी थी मेरे प्रेम का आलंबन 

कुछ कुछ खड़ी पाई सी
और मैंने सीखा लिखना प्रेम के प की खड़ी पाई।

ये सीखना था बसंत के उल्लास सा

सब कुछ खिलने लगा था मन के क्षितिज तक
महकने लगा था अबूझ संसार
और मैं किसी डाल सा लचकने लगा था
तुम्हारे प्यार के फूलों को खुद पे सजाये हुए
और लचक कर झुक गया था तुम्हारी ओर
तुम्हारे स्वीकरण से मिल गया था मैं तुममें
सीख लिया था लिखना  प्रेम का 'प'।

तब बर्फ सी जमी तुम पिघलने लगी थी

मेरे प्रेम की उष्मा से
बहने लगी थी प्रेम की अजस्र धारा सी
मैंने सीख ली थी 'प्र' में लगाना र की मात्रा।

हमारे प्रेम के भार में

तुम झुकती गयी थी लगातार
इस कदर
कि तुमने खुद को बना लिया था हमारे प्रेम का आधार
कि तुम धंसने लगी थी ज़मीं में किसी पेड़ की जड़ सी
कि अपने को मिटा कर भी 
सींच रही थी प्रेम को
और मैं तुम्हारे प्रेम से फला फूला
तन गया था किसी पेड़ की सबसे ऊंची डाल सा
कि मैंने सीख ली थी प्रेम के प्रे में 'ए की मात्रा लगाना।

तुम प्रेम को प्रेम बनाए रखने के लिए

धंसती जा रही थी गहरे
और गहरे
और मैं प्रेम के आधे अधूरे प्रे को लिखना सीखने से गर्वोन्नत
तनता हुआ उठता जा रहा था ऊंचा
और ऊंचा
पर ये वो प्रेम तो नहीं था ना
कि हम जा रहे थे दो विपरीत ध्रुबों की ओर
तुम त्याग की मूर्ति
और मैं अहम् का पुतला बन।

आखिर कब तक तुम सींचती

अमर बेल से लिपटे हमारे प्रेम वृक्ष को
कि मेरे अमरबेल बन जाने से तय हो गयी
नियति हमारे प्रेम की
कि सूखना ही था प्रेम वृक्ष
और प्रेम वृक्ष के सूखते हुए देख 
लगा था हम दोनों को ही 
कि सूखने से बचाना है इसे 
तो दोनों को ही मुड़ना होगा विपरीत दिशा में 
कि तुम्हें कुछ सींचना होगा अपने स्व को 
और मुझे सुखाना होगा अपने अहम् को 
इसे सीखने में जो वक्त लगना था 
ये वही था जो लगता है 
'प्रे' से 'म' तक आने में।

तुम्हारे स्व के जगने 

और मेरे अहम् के मरने से 
हम एक बार फिर खड़े हो गए थे दो समानांतर पाई से 
कि समय की धूप छाँव ने सिखाया था 
प्रेम 
द्वैत के अद्वैत में बदल जाने में है 
आत्मा के परमात्मा में विलीन हो जाने में है  
मेरा तुम में समा जाने में है
और इस तरह 
समय की भट्टी में 
तुम्हारे प्रेम के ईंधन से जली आग के ताप से 
कपूर सा उड़ गया था मेरे भीतर का अहम् 
कि मैं पूरी तरह मुड़ के समा गया था तुम में 
और मैंने सीख लिया था लिखना प्रेम के 'म' को ।

हाँ अब ये सच था 

कि एक ऐसे समय में 
जब सब कर रहे थे प्रेम 
मैंने सीखा लिया था लिखना 'प्रेम'।  
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प्रेम करने वाले समय में प्रेम लिखना इतना खूबसूरत क्यूं होता है।

Sunday, 4 December 2016

याद


याद 
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याद 
कि 
इक बीता लम्हा 
लम्हों की बारातें 
लम्हों में बीती बातें 
बातों की यादें। 

याद 
कि 
इक टपका आंसू 
आंसुओं की लड़ियाँ 
लड़ियों में ग़म के किस्से 
किस्सों की यादें। 

याद 
कि 
इक अटकी फांस
फांसों के फ़साने  
फसानों की टीसें 
टीसों की यादें। 

याद 
कि 
इक टूटा ख्वाब 
ख्वाबों की रातें
रातों की तन्हाइयां 
तन्हाइयों की यादें। 
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ये यादें इतनी संगदिल क्यूँ होती हैं 

Monday, 28 November 2016

चीजें अक्सर ऐसे ही बदल जाया करती हैं !


कुछ फासले 
दूरियां नहीं होती 
प्रेम होती हैं 

कुछ बातें 

बतकही नहीं होती 
प्रेम होती है

कुछ दोस्ती 

रिश्ते नहीं होतीं 
प्रेम होती हैं 

कुछ लड़ाईयां 

अदावतें नहीं होती 
प्रेम होती हैं 

प्रेम में चीजें

अक्सर
ऐसे ही बदल जाया करती हैं !  
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चीजें वैसी क्यों नहीं होती जैसी दिखाई देतीं हैं 

Sunday, 27 November 2016

सैर कर दुनिया की ग़ााफिल

                 
          
                 हर आदमी अपनी तरह से देश दुनिया को देखना और समझना चाहता है।जितने बेहतर ढंग से आप जानना चाहते है,जितनी गहराई से जानना चाहते हैं उतनी ही ज़्यादा दुनिया भर की खाक छाननी पड़ती है कि 'सैर कर  दुनिया की गाफिल..।'यदि दुनिया की सैर करने का कोई गंतव्य चुनना हो तो यूरोप से बेहतर कोई और जगह शायद ही हो। इसका वर्तमान और अतीत दोनों इस कदर आपको सम्मोहित करते हैं कि बेसाख्ता उसके मोहपाश में बंधे चले जाते हैं।आधुनिकता की चकाचौंध वाले वर्तमान का एक रूमानियत भरा इतिहास है।यहां रोमन और ग्रीक सभ्यता के अवशेष हैं,गोथिक वास्तु शिल्प की शानदार इमारतें हैं,खूबसूरत शहरों के बीच बहती नदियों के अनुपम दृश्य हैं और प्राकृतिक सौंदर्य तो चारों और बिखरा पड़ा ही है।यूरोप को देखना जानना किसी का भी सपना हो सकता है सुशोभित शक्तावत जैसा..."शायद वह दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत शहर होगा नीदरलैंड्स का देल्‍फ़, जहां के उजले नीले रंगों को वर्मीर ने अपने पनीले-से कॅनवास पर उभारा था, जिसकी नहरें हरसोग की फिल्‍म में आज तलक लहलहाती हैं।और देन्‍यूब की बांक का वह शहर, जर्मनी का रेगेंस्‍बर्ग, जहां बवेरिया के घनेरे जंगलों की आदिम दास्‍तानें हैं। म्‍यूनिख़ के दुर्गों को देखना। फ़्लोरेंस, जिसके बाबत महाकवि शैली ने कहा था : "फ़्लोरेंस बीनेथ सन/ऑफ़ सिटीज़ फ़ेयरेस्‍ट वन।" और, ऑफ़कोर्स, वेनिस। वेनिस में आहों के पुल पर खड़े होकर सुबकना है।और नीली देन्‍यूब के वो दो दिलक़श सपने : वियना और बुदापेस्‍त। वियना में मोत्‍सार्ट की वायलिन की छांह तले सपने देखना है। साल्‍त्‍सबर्ग में 'फिगरो के ब्‍याह' वाला ऑपरा सुनना है। स्‍ट्रॉसबर्ग में रेड वाइन के परदे के पीछे सिल्विया को खोजना है। क्रॉकोव देखना है, वॉरसा देखना है, ज़ख्‍़मी और लहूलुहान।  प्राग में वल्‍तावा के पुलों को गिनना है।"
                  कुछ ऐसे ही रूमानियत भरे यूरोप की उम्मीद की थी जब अनुराधा बेनीवाल के यूरोप के यात्रा वृतांत 'आज़ादी मेरा ब्रांड' को पढना शुरु किया था.लेकिन इस किताब को पढ़ते हुए आप जल्द ही एक दूसरी दुनिया में पहुंच जाते हैं।दरअसल हर यात्रा अलग होती है,उसका उद्धेश्य अलग होता है उसका निहितार्थ अलग होता है।घूमने के लिये की गयी यात्राएँ भी अलग-अलग होती हैं।इसीलिए 'आज़ादी मेरा ब्रांड' अन्य यात्रा वृत्तांओं से एकदम अलग है। अलग होना ही था। यात्रा का तरीका जो अलग था,उसका उद्धेश्य अलग था।ये एक तीस साला युवती का निपट अकेले,बहुत ही सीमित संसाधनों से एक महीने लंबी यूरोप की यात्रा का लेखा जोखा है जिसमें वो किसी होटल या हॉस्टल में नहीं रूकती,सार्वजनिक यातायात संसाधनों से यात्रा भी नहीं करती। वो अपने लिए स्थानीय लोगों में होस्ट खोजती है,उनके साथ रहती है,लिफ्ट लेकर यात्रा करती है और घूमती है।उसकी दिलचस्पी वहां के प्रसिद्द पर्यटक स्थलों को देखने से अधिक वहां के गली कूँचों की खाक छानने में है,वहां के लोगों से मिलने जुलने में है। दरअसल उसकी रूचि यूरोप में घूमने या उसे देखने में नहीं, उसे समझने में और उससे भी ज़्यादा अपने को देखने समझने में है। इसीलिये इसमें स्थूल वर्णन बहुत कम है। इस यात्रा वृत्तांत के कई पाठ किए जा सकते हैं या यूँ कहें कि साथ साथ होते चलते हैं । ऊपरी स्तर ये एक यात्रा वृत्तांत है। एक ऐसा इंटेंस वृतांत जिसमें  यूरोप को भौतिक रूप से नहीं बल्कि उसकी संस्कृति को उसकी आत्मा को समझने बूझने की लालसा है। उससे गहरे स्तर पर संस्मरण के रूप में एक आत्मकथ्य है-अपने को समझने बूझने का,अपना मूल्यांकन करने का,अपने भीतर की यात्रा करने का,अपने स्व को खोजने का। एक अन्य स्तर पर ये स्त्री विमर्श का आख्यान है। वो अपनी आज़ादी के बहाने स्त्री की आज़ादी का आख्यान रचती है।दैहिक और मानसिक  दोनों तरह की आज़ादी। केवल अपने लिए नहीं बल्कि हर स्त्री के लिए। जिस्मानी आज़ादी के सन्दर्भों का बार बार उल्लेख करती है। ये कई बार दोहराव लगते हैं। आरोपित से प्रतीत होते हैं। इसके बावज़ूद आपकी एकाग्रता भंग नहीं करते।जो भी हो ये एक शानदार किताब है जिसे ज़रूर से पढ़ा जाना चाहिए। ये जगहों को देखने का,घुमक्कड़ी करने का एक नया नज़रिया देती है। इस सप्ताहांत इस किताब के ज़रिए यूरोप को जानने के लिए एक नहीं बार बार 'वाह' तो बनते ही हैं। शुक्रिया अनुराधा बेनीवाल। 

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'तुम चलोगी तो तुम्हारी बेटी भी चलेगी और मेरी बेटी भी....
अपने तक पहुंचने के लिए और अपने को पाने के लिए घूमना,तुम घूमना'














Saturday, 26 November 2016

तोत्तो चान




           ये सप्ताहांत एक प्यारी सी चुलबुली बच्ची तोत्तो चान के साथ बीता।सप्ताहांत ख़त्म होते होते उसका साथ भी खत्म हो गया।अरसा हो गया पर उसका साया लिपटा सा है अभी भी।अजीब सा हैंगओवर है।दरअसल तोत्तो चान तेत्सुको कुरोयानागी की एक छोटी सी पुस्तक है।140 पृष्ठों की।मूल रूप से जापानी भाषा में लिखी पुस्तक का बहुत ही अच्छा हिंदी अनुवाद किया है पूर्वा याज्ञीक कुशवाहा ने किया है।हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली और विशेष रूप से प्राथमिक के सन्दर्भ में बहुत ही प्रासंगिक पुस्तक है ये।हमारी शिक्षा प्रणाली ही ऐसी है जिसमें हम बच्चे की नैसर्गिक प्रतिभा का मार कर बहुत ही टाइप्ड किस्म का इंसान बनाते हैं।हमारी शिक्षा डॉक्टर, इंजीनियर,अफसर,बाबू तो पैदा करती है पर इंसान नहीं।निसंदेह अगर हमें अपने बच्चों को बेहतर इंसान बनाना है तो हेडमास्टर कोबायाशी के स्कूल तोमोए गाकुएन की तरह के इनोवेटिव तरीके ढूंढने ही होंगे।प्राथमिक शिक्षा से जुड़े नीति नियंताओं,अफसरों,शिक्षकों और निसंदेह अभिवावकों को भी ये किताब कम से कम एक बार ज़रूर पढ़नी चाहिए और कोबायाशी का कथन कि 'उनकी महत्वाकांक्षाओं को कुचलों नहीं,उनके सपने तुम्हारे सपनों से कहीं विशाल हैं' को ब्रह्म वाक्य की तरह अपने ज़ेहन में बनाए रखना चाहिए।

ज़िन्दगी


ज़िन्दगी 
सर्दियों के किसी इतवार की अलसुबह सी 
अलसाई अलसाई
बिस्तर में ही गुज़र बसर हो जाती है
ना आगे खुद बढती है
ना बढ़ाने की इच्छा होती है।
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Saturday, 5 November 2016

जियो रवीश जियो



                                           टीवी ना के बराबर देखा जाता है। रेडियो सुनाने का शौक है। कल रवीश का प्राइम टाइम नहीं ही देखा था। चर्चा हुई तो आज रिपीट टेलीकास्ट देखा। इस प्रश्न को दरकिनार करते हुए भी कि एनडीटीवी पर प्रतिबन्ध उचित है या नहीं,रवीश का ये कार्यक्रम विरोध प्रदर्शित करने की कलात्मक अभिव्यक्ति का नायाब उदाहरण है। ये दिखाता है कि एक विरोध को शालीन और अहिंसक रखते हुए भी कितना धारदार और मारक बनाया जा सकता है। दरअसल ये कार्यक्रम बहुत ही मुलामियत से अंतर्मन को परत दर परत छीलता लहूलुहान करता जाता है और आपको पता भी नहीं चलने देता। ये बहुत ही मुलामियत से धीरे धीरे गला रेतता है जिससे खून का फव्वारा नहीं फूटता,छींटें भी नहीं पड़ते बल्कि दीवार में पानी की तरह रिसता है और आत्मा तक को सीला कर जाता है। इरोम शर्मिला और ऐसे ही प्रतिरोध के तमाम प्रयासों को,जिनके आप हिस्सा नहीं रहे हैं या जिनको आपने नहीं देखा है यहाँ महसूस कर सकते हैं। हांलाकि यहां मैं अर्नब का ज़िक्र नहीं करना चाहता,फिर भी उसके हद दर्जे के लाउड और हिंसक कार्यक्रम के बरक्स रवीश के इस कार्यक्रम को रख कर देखिए तो समझ आता है अभिव्यक्ति को और प्रतिरोध को भी किस तरह कलात्मक बनाया जा सकता है और जबरदस्त प्रभावी भी। टीवी पर अनर्गल प्रलाप और शोर के इस दौर में रवीश का कार्यक्रम मील का पत्थर है। जियो रवीश जियो।  

Wednesday, 2 November 2016

अपने अपने युद्ध



ऐन उस वक्त 
जब एक युद्ध हो रहा होता है सीमा पर 
कई युद्ध कर रहे होते हैं लोग घरों में  
सीमा पे लड़े जा रहे युद्ध से अधिक विध्वंसक  
वे लड़ रहे होते हैं अपने अपने भय से। 

एक युद्ध कर रहे होते हैं माँ बाप

अपनी लाठी के हाथ से छूट जाने के भय से और 
जीवन की साँझ की उम्मीद 
दो मज़बूत कंधों के टूट जाने के भय से। 
पत्नी लड़ रही होती है
पहाड़ सी ज़िन्दगी से लड़ने वाले साथी का हाथ छूट जाने के भय से 
बहन लड़ रही होती है एक कलाई के खो जाने के भय से 
एक बेटी लड़ रही होती है
अपने सबसे बड़े हीरो की उंगली छूट जाने के भय से  
और वे सब एक साथ लड़ रहे होते हैं 
पेट की आग बुझाने के लिए होने वाली चिंता के भय से 

सुनो 

अब जब भी बात करो तुम युद्ध की 
एक बार उन युद्धों की सोचना 
जो किए जा रहे हैं अपने अपने सपनों के मरने के भय से 
और फिर कवि की  उक्ति याद करना कि
 'सबसे खतरनाक  होता है सपनों का मर जाना'
उसके बाद भी हिम्मत बचे 
तो बात करना युद्ध की।  

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क्या युद्ध इतने ज़रूरी होते हैं ?

Monday, 24 October 2016

पुल


नदी का पुल
उसके दो किनारों को जोड़ता है

ये भ्रम मात्र है।
पुल कुछ लोगों की ज़रूरतों की
पूर्ति का साधन भर है
और किनारों की निरंतरता को बाधित करने का साधन भी।
उनकी इच्छा तो
नदी के प्रेम में
उसके सहयात्री बने रहने में है
और उसके सागर में
विलीन होने के बाद
खुद को मिटा देने में भी।
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किनारों का मिलना ज़रूरी तो नहीं है।

Tuesday, 18 October 2016

फेसबुक की दुनिया_१

                                
                                    

                                      आपकी अपनी एक दुनिया है जिसमें आप जीते हैं। हममें से बहुतों की एक और दुनिया है-आभासी दुनिया।ये फेसबुक की दुनिया है।आभासी इसलिए कि वो होकर भी नहीं है और नहीं होने के बावज़ूद है। आपके पास अनगिनत लोग हैं,आपके हज़ारों मित्र हैं,फिर भी आप अकेले हैं। और अकेले होते हुए भी आप अपने को भीड़ से घिरा पाते हैं। यहाँ सब कुछ है-राग-द्वेष,अनुराग-विराग,प्यार-घृणा, लड़ाई-झगड़े,मैत्री। आखिर क्या नहीं है सब कुछ तो है  । इतना सब कुछ होते हुए भी खालीपन है। चारों ओर सन्नाटा है। सन्नाटे में गज़ब का कोलाहल है और इस कोलाहल के अपनी ताक़त के साथ मौज़ूद होने के बावज़ूद अजीब सा सूनापन है,ऐसा सूनापन जो आपके सीने को चीर कर रख दे।यहां चारों तरफ ज़िन्दगी के रंग बिखरे पड़े है। दूर से देखो इन रंगों से ज़िन्दगी के कितने खूबसूरत कोलाज़ बने दिखाई देते हैं और पकड़ने जाओ तो कोई रंग दिखाई ही नहीं देता,यहां तक कि श्याम श्वेत भी नहीं।बावज़ूद इसके यहाँ भरी पूरी दुनिया मौजूद है अपनी पूरी संभावनाओं के साथ। यहाँ लोग भी हैं अपनी पूरी ताक़त के साथ,अपने अपने चरित्रों को जीते हुए। आप लोगों की दीवारों पर जाइये।अद्भुत रंग मिलेंगे जीवन के। बस महसूस कीजिये।
                                              यहाँ एक दीवार है जहाँ तीन सहेलियां हमेशा मौजूद मिलेंगी एक साथ ज़िन्दगी को मुकम्मल बनाते हुए। एक ज़िन्दगी का सिरा शुरू करती है,दूसरी उसे आगे बढ़ाती है तो तीसरी उसे अंतिम छोर पे ले जाती है। वे एक जीवन की सरल सीधी रेखा खींचती हैं पर त्रिकोण बनाते हुए,तीनों एक दूसरे से खुद को भरते हुए और खुद से दूसरे को  भरते हुए भी।एक दूसरे की ओर आते हुए और एक दूसरे से दूर जाते हुए भी। इनमें एक प्रस्थान बिंदु है। वो रोज़ अपना स्टेटस अपडेट करती है। प्रेम रस से भीगा भीगा सा। अल्हड सा। दिल की गहराईयों से निकला। कुछ एब्स्ट्रेक्ट सा। एक अधूरापन सा लिए। एक चिर प्रतीक्षा में। मुकम्मल होने की चाह में। उसके उल्लास में भी भीतर ही भीतर करुण संगीत सा बजता सुनाई देता है। ये करुण स्वर तीव्र से तीव्रतर होता जाता हैं। जिस समय आप प्रेम में भीगे इस करुण संगीत को सुन रहे होते है कि अचानक एक क्लिक की आवाज़ सुनाई देती है। ये सहेली का कमेंट होता है। स्टेटस के जुगलबंदी करता सा। अब आपको करुण संगीत के साथ खिलखिलाहट भी सुनाई देने  लगती है। हास का गुदगुदाता सा संगीत तीव्र होता जाता है। हास धूप सा फ़ैल जाता है। मानो बादलों की ओट से फैली सुरमई छाँव को बादलों में सेंध लगाकर आई किरणों ने रोशनी में बदल दिया हो। सहेली का कमेंट पूर्णता लिए हुए। भरा पूरा सा। उल्लास और उमंग से रंगा। ये पहली सहेली को भी अपने रंग में रंग लेता है। वो भी खुशी के रंग में भीगने लगती है। करुणा का संगीत मंद होता जाता है। उल्लास के स्वर तीव्र होते जाते हैं। अब वे कमेंट दर कमेंट करती जाती हैं। वे पहाड़ी नदी का रूप ले लेती हैं। निर्द्वंद बहती जाती हैं। बहुत से नदी नालों को समाहित  हुए कल  कल करती,उल्लास के संगीत सी। इस संगीत में आप डूबे नहीं कि  एक क्लिक और। ये तीसरी सहेली का कमेंट है।  इसमें भी उल्लास है,उमंग है,यादें हैं,आहें हैं। ये दोनों से मिल कर कल कल का नाद कुछ और तेज करती है। पर इस तीसरे कमेंट में ऊर्जा होते हुए भी एक अजीब सा नैराश्य सा पसरा है,एक वैराग्य भाव सा है। मानो उसने जीवन को बहुत करीब से देखा हो या जीवन का सत्य जान लिया हो।अचानक लगता है वो पहाड़ी नदी किसी पहाड़ी क्षेत्र से समतल मैदान में बहने लगी है। शांत स्थिर नीरव सी। कुछ देर यूँ ही बहने के बाद तीनों सहेलियां वापस लौट जाती हैं अपनी अपनी दुनिया में अपने-अपने हिस्से के सुख दुःख सहने। लेकिन फिर मिलने को। निर्द्वंद बहने को। अपने को अभिव्यक्ति देने  को। जीवन में कुछ और रंग भरने को। 
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आभासी दुनिया के रंग _१ 
    

Friday, 14 October 2016

'तेरे बिना गुज़ारा ऐ दिल है मुश्किल'


सांसों का नाद सौंदर्य  अद्भुत है।
दरअसल साँसे ज़िन्दगी का रागात्मक संगीत है
और साँसे स्त्री पुरुष के रागात्मक संबंधों का जीवन भी है
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जब आप किसी किसी ऐसे माध्यम में काम करते हैं जहां आपके पास सम्प्रेषण के लिए टूल्स के रूप में सिर्फ ध्वनियाँ है। अपनी बात को कहने के लिए उन ध्वनियों से खेलना पड़ता हो। तो वे ध्वनियां आप में रच बस जाती है और आप उनमें।आप उन्हें जीने लगते हैं। उनमे से कुछ ध्वनियां आपको अपना दीवाना बना लेती है। साँसों  का नाद सौंदर्य मुझे हमेशा से ही आकर्षित करता रहा है। वे होती ही इतनी सेंसुअस ( sensuous)हैं कि वे बरबस आपको अपनी और खींच लेती हैं।
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जिस समय आकाशवाणी में काम करने आया सांसों पर नियंत्रण बड़ी कला  मानी जाती थी। उद्घोषक से अपेक्षा की जाती थी श्रोता को उसकी साँस नहीं सुनाई पड़नी चाहिए। यही कार्यक्रम प्रस्तोता से भी अपेक्षा की जाती थी और प्राय ऐसा ही होता भी था। उच्चरित शब्दों के कार्यक्रम (स्पोकन वर्ड ) यथा वार्ता,भेंटवार्ता,बातचीत,परिचर्चा में भाग लेने आने वाले विशेषज्ञों से भी इसी तरह की अपेक्षा होती। यदि उनकी आवाज़ आती भी तो उसको एडिट करने की कोशिश की जाती।ये आकाशवाणी की मान्य परम्परा थी और एक तरह का शुद्धतावादी दृष्टिकोण था।हाँ साँसों का उपयोग नाटक में खूब होता जहां इंटीमेट रिलेशन प्रेषण के लिए इससे उपयुक्त और उपलब्ध इफेक्ट कुछ नहीं हो सकता है। हां कोई संगीत एक विकल्प है लेकिन सिमित भूमिका के साथ। इतना ही कि साँसों से उत्पन्न प्रभाव की तीव्रता को वो कुछ और बढ़ा सकता है,उसे क्रिएट नहीं कर सकता। साँसे ना होने पर रेकार्डिंग या उद्घोषणाएँ साफ़ सुथरी होती है,उनमें एक निरंतरता बनी रहती है।साँसे श्रोता की एकाग्रता को भंग  करती है ऐसा माना जा सकता है। साफ़ सुथरी उद्घोषणाएं या कार्यक्रम सुनने का अपना मज़ा होता,अपना आनंद होता है। रेडियो सीलोन और वॉइस ऑफ़ अमेरिका में भी लगभग इसी तरह के कार्यक्रम होते। लेकिन इसके ठीक विपरीत जब आप बीबीसी से नीलाभ,अचला नागर राजनारायन बिसरिया,कैलाश बुधवार और तमाम लोगों की आवाज़ शार्ट वेव बैंड पर माइक्रोफोन से होती हुई ट्रांजिस्टर सेट से कानो में पहुँचती जिसमे साँसों की स्पष्ट और तीव्र ध्वनियाँ मिली होती तो वो कमाल का प्रभाव दिलोदिमाग पर असर करतीं। ऐसा नहीं कि बिना साँसों वाली आवाज़ आपको मदहोश नहीं करती लेकिन सांसो वाली आवाज़ों की कशिश कहाँ ?दरअसल वे आवाज़ बहुत ही सजीव और नेचुरल लगती हैं और अपनी सेंसुअलिटी से गजब का आकर्षण पैदा करती हैं।अधिक करीब लगती और उसी तीव्रता से कनेक्ट भी करतीं।
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यही बात संगीत में है। गायन में साँसों का नियंत्रण बहुत ही महत्वपूर्ण है। बरसों इसको साधना पड़ता है। ये बड़ी कला मानी जाती गायन में बीच में कितनी सफाई से सांस ले लें और श्रोताओ को पता ना चले। पुराने गाने में गायकों की साँसे नहीं ही सुनाई देतीं। लेकिन अब ऐसा नहीं है।अब आप गाने के बीच में गायक की साँसे सौ सकते हैं। बात लंबी हो गयी। दरअसल मैं बात सिर्फ एक गाने की करना चाहता था।रणबीर की नई फिल्म है 'ऐ  दिल है मुश्किल'.अरिजीत का गाया टाइटल ट्रैक है 'तू सफर है मेरा........' गज़ब का रोमानी।उसके मुखड़े को ध्यान से सुनिए।हाल के बरसों में कम से कम मैंने कोई ऐसा गाना नहीं सुना जिसमें साँसे इतनी प्रोमिनेन्ट हो।नहीं पता ये अनायास है या सायास। पर छोटे से पैच में इतनी बार। संगीत और आवाज़ के साथ साँसे क्या रूमानियत क्रिएट करती है। प्रीतम और अरिजीत के लिए एक वाह तो बनाता है। 
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'तेरे बिना गुज़ारा है ऐ दिल है मुश्किल'  









Wednesday, 12 October 2016

बिखरी स्मृतियाँ_1

  
        स्मृतियाँ तरल होती हैं।आप जब भी रिक्त होते हैं,शुष्क से,वे आपको तरल कर जाती हैं।10 Oct 2015 की पोस्ट से /मित्र के जन्मदिन को याद करते हुए-----
तुमने एक कहानी सुनाई थी। एक आठ दस साल का लड़का एक बगीचे से अक्सर गुलाब के फूल चुराता था। एक दिन चौकीदार ने पकड़ लिया और कमरे में बंद कर दिया। लेकिन वो लड़का मस्त रहा। उसने कमरे में चारों और निगाह घुमाई तो उसे बैडमिंटन का रैकेट दिखाई दिया। अब लडके का पूरा ध्यान इस बात पर था कि उस रैकेट को भी साथ ले जाने की कोई संभावना बन सकती है क्या। तुमने ये कहानी उस समय सुनाई थी जब हम लोग दोस्त बन चुके थे और डी.एम.कम्पाउंड से अक्सर आलू खोद(सही शब्द चुरा कर) कर लाते और पास के ऑफिस के फेंके हुए कागज़ जला कर भूनते और खाते।वो लड़का कोई और नहीं तुम थे और वो रैकेट मेरा था। वो हम लोगों की पहली मुलाकात थी मैं तुम्हारी बहादुरी पर अचंभित था। दोस्ती परवान चढ़ती गयी। क्या बेफिक्री के दिन थे। आँखों में बड़े बड़े सपने थे पर उन सपनों को पूरा करने का कोई दबाव नहीं था। या यूँ कहो कि ये पता ही नहीं था कि सपनों को पाने के लिए कोई जद्दोज़हद भी करनी होती है।बस सपनों पर सवार रोज़ शाम अपनी अपनी साइकिलों पर उस छोटे से शहर को एक छोर से दूसरे छोर तक आकाश में आवारा बादलों की तरह नापते रहते।उस घुमक्क्डी में ना जाने कितने ठौर आते। जीआईसी, अलीगंज अड्डा,जेल रोड,क्रिश्चियन कॉलेज,हाथी दरवाज़ा,घंटाघर,ग़ांधी मार्केट,अरुणानगर,हनुमान गढ़ी,माल गोदाम और भी ना जाने कितने रास्तों से गुज़रते, पर आख़िरी पड़ाव अवनींद्र का घर ही होता और कई कई जग पानी पीते। वो रोज़ गाली देता और आने के लिए मना करता और हम रोज़ वही पहुँच जाते। लेकिन धीरे धीरे वे सपने जो कभी बादलों की मानिंद होते,उम्मीदों के बोझ से भारी होने लगे। किशोरावस्था की वो मस्ती और बेफिक्री धीरे धीरे कब ज़िंदगी से फिसलने लगी थी पता ही नहीं चला,कम से कम उस समय तक तो बिलकुल नहीं जब तक तेरे उस शहर में रहे। आज जब तुम अपना एक और जन्मदिन मना रहे होतो तुम्हें उन यादों में घसीट कर ले जाकर छोड़ देता हूँ। 
जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो। जुग जुग जियो बेटा!
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यादें याद आती हैं

Saturday, 1 October 2016

तीन त्रयी

             


                        दो चीजों का बचपन में जबरदस्त शौक था क्रिकेट देखने और फ़िल्मी गीत सुनने का।सिनेमा देखने का भी शौक था पर उस शिद्दत से पूरा नहीं हो पाता था जैसे ये दोनों शौक। बचपन से तरुणाई के संक्रमण काल में जब क्रिकेट का जादू सर चढ़ के बोल रहा था उस समय भारतीय फिरकी गेंदबाजों का पूरे क्रिकेट जगत में दबदबा था। उस समय इरापल्ली प्रसन्ना,बिशन सिंह बेदी और चंद्रशेखर की त्रयी अपनी अपने पूरे शबाब पर थी और फिरकी गेंदबाजी की कला अपने सुनहरे दौर में बल्कि कहें अपने चरमोत्कर्ष पर थी। यही वो समय था क्रिकेट की इस त्रयी की तरह हिंदी फिल्म संगीत में तीन गायकों की त्रयी छाई हुई थी-मुकेश,मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार की। ये हिंदी फिल्म संगीत का भी सुनहरा दौर था।ये वो समय था जब क्रिकेट लगातार पॉपुलर हो रहा था और एक इलीट खेल जनसाधारण के खेल में रूपांतरित हो रहा था।इसके ठीक विपरीत उसी समय हिंदी सिनेमा में एक नए तरह के सिनेमा का उदय हो रहा था न्यू वेव सिनेमा के नाम से। यहाँ लोकप्रिय सिनेमा से विशिष्ट सिनेमा का उदय हो रहा था। सिनेमा में नए प्रयोग हो रहे थे। जहाँ क्रिकेट अपना एलीट चरित्र बदल कर जनसाधारण के खेल में तब्दील  हो रहा था वहीं लोकप्रिय हिंदी सिनेमा से एक एलीट सिनेमा उभार पर था और इस सिनेमा की तीन बेहद संजीदा अभिनेत्रियों की त्रयी इस सिनेमा को नयी ऊचाईयां प्रदान कर रही थीं। ये त्रयी थी शबाना आज़मी,दीप्ती नवल और स्मिता पाटिल की।ये तीन त्रयी एक दूसरे के समानान्तर भी चलती हैं और एक दूसरे का अतिक्रमण कर  नए कॉम्बिनेशन भी बनाती चलती हैं।

                              सबसे पहले प्रसन्ना को देखिए। सीधे सरल से, हंसमुख। वैसी ही सरल सी गेंदबाजी। हल्का सा तिरछा छोटा सा रनअप,आसान सा बॉलिंग एक्शन,धीमी गति से ऊंची उड़ान वाली ऑफ ब्रेक गेंदबाजी,वे सिर्फ गेंद की ऊंचाई और लंबाई से बल्लेबाज़ को भरमाते,शॉट खेलने के लिए निमंत्रण देते और उन्हें गलती करने के लिए मज़बूर करते। प्रसन्ना के साथ मुकेश को देखिए। प्रसन्ना जैसे ही सीधे सरल से मुकेश भी। वैसी ही सरल सी उनकी गायकी। हल्की सी दर्द भरी मीठी सी आवाज़। शास्त्रीयता के आतंक से मुक्त उनके नग़में भावनाओं के उठान से दिल को छूते हैं और मन के आकाश पर फ़ैल जाते हैं।अब इनके साथ दीप्ती नवल को रखिए। उनके जैसा ही सहज सरल सौम्य मासूम सा चेहरा।  वैसी ही सहज अदाकारी। कोई साथ वाले घर की साधारण लड़की सी।ये तीनों मिलकर एक ऐसी त्रयी की निर्मिति करते हैं जिसकी प्रतिभा अपने सरलतम रूप में शिखर तक उठान पाती है।   

                                   बिशन सिंह बेदी-अपेक्षाकृत एक गंभीर व्यक्तित्व।बाएं हाथ के ऑर्थोडॉक्स लेग स्पिनर। किताबी नियमों जैसी एकदम नपी तुली सधी गेंदबाजी।ओवर दर ओवर एक ही जगह गेंद फेंक सकते थे और बल्लेबाज़ केवल उसको रोक भर सकता था बिना कोई रन बनाए। क्लासिक लेग स्पिन के श्रेष्ठ उदाहरण थे बेदी। यहाँ बेदी के साथ रफ़ी को खड़ा कीजिए। रफ़ी-सहज लेकिन धीर गंभीर। वैसा ही उनका गायन अपेक्षाकृत अधिक गंभीर,कुछ शास्त्रीयता का पुट लिए हुए। यहाँ स्मिता पाटिल उनके साथ आकर स्वतः खड़ी हो जाती हैं। वे बहुत ही गंभीर अभिनेत्री थीं। कला फिल्मों में ही नहीं कमर्शियल फिल्मों में भी बेहतरीन अभिनय किया। अपने अभिनय से उन्होंने अदाकारी को बुलंदियों तक पहुंचाया।ये तीनों एक साथ आकर एक ऐसी त्रयी का निर्माण करते हैं जहाँ प्रतिभा अपने शास्त्रीय रूप में प्रस्फुटित होती है और उठान पाती है। 

                                  किशोर कुमार ने संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली थी। लेकिन उनमें प्रतिभा कूट कूट कर भरी थी। वे मनमौजी और स्वच्छन्द तबियत के मालिक थे। उनके गीतों में भी वैसा ही उल्लास उत्सव मनमौजीपन झलकता है। वे बहुत अच्छा गाते तो बहुत खराब भी गा सकते थे।यहाँ चंद्रशेखर किशोर से टक्कर लेते हैं। वे भी प्रतिभा के धनी थे। जब उनका दिन होता तो वे अपने बूते मैच जिता देते। इतनी घातक गेंदबाज़ी करते कि उन्हें खेलना विश्व के किसी बल्लेबाज़ के लिए लगभग नामुमकिन होता। अगली ही इनिंग में वे बहुत ही खराब गेंदबाज़ी कर सकते थे। इन दोनों के साथ त्रयी बनाती हैं शबाना। उन जैसी ही अनिश्चितता लेकिन अपार संभावनाओं से भरी। प्रतिभा की उनमें भी कोई कमी नहीं। तमाम कला फिल्मों में शानदार अदाकारी की लेकिन कई कमर्शियल फिल्मों में हद दर्ज़े के ख़राब अदाकारी भी की।ये ये एक ऐसी त्रयी थी जिसमें अपार संभावनाओं वाले रॉ टेलेंट में विस्फोट होता तो सर्वश्रेष्ठ निकल कर आता वरना बहुत साधारण सा घटित होता।दरअसल बचपन से किशोरावस्था की दहलीज़ की और बढ़ाते हुए अन्य चीज़ों के साथ ये त्रयी भी आकर्षण के केंद्र में थीं और ये भी कि ये चीज़ों को देखने का एक नज़रिया भर है और कुछ नहीं।      









             

Thursday, 29 September 2016

फुटकल_1



ये कैसा तूफान है ज़िन्दगी में इस बार
ना हलचल है कोई ना शोर
आहें हैं सिसकियाँ हैं
बस यही निशां हैं बर्बादी के चारों ओर।
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Thursday, 22 September 2016

आज फिर जीने की तमन्ना है...




                         
(गूगल से साभार)
                                   

                                      बरसों पहले एक फिल्म देखी थी गाइड।बडी मकबूल फिल्म थी।अभिनय से लेकर संगीत तक हर लिहाज से शानदार फिल्म।इसमें एक गाना है "आज फिर जीने की तमन्ना है..."कभी इसको ध्यान से देखिए।एक स्त्री के लिए आजादी क्या होती है, बंधनों से मुक्त होकर वो कैसा महसूस करती है,इससे बेहतरीन अभिव्यक्ति मैंने नही देखी।बूढे बदमिजाज आर्कियोलोजिस्ट मार्को की युवा पत्नी रोजी उससे वैवाहिक संबंध खत्म कर राजू के साथ चल देती है।तब ये गाना फिल्माया गया है।हर बोझ,बंधन,वर्जनाओं से मुक्त।निर्द्वन्द।आजाद।आसमाँ में पंछी की सी।पानी में मीन सी।कल कल बहती पहाडी नदी सी।सरसराती हवा सी।स्त्री मुक्ति की इससे स्वाभाविक शानदार अभिव्यक्ति नहीं ही देखी पढी।इस एक गाने पर स्त्री विमर्श की कई पुस्तकें कुर्बान।


रियो पैरालंपिक

                
(गूगल से साभार)
                                                      लाल अक्सर गुदड़ी में छिपे होते हैं।खुशियाँ अक्सर उन लम्हों में आती हैं जब आप उनकी उम्मीद नहीं कर रहे होते हैं और अक्सर जिनकी काबिलियत में आपका विश्वास नहीं होता वे चमत्कार कर देते हैं।याद कीजिए रियो ओलंपिक खेलों को।कितने गाजे बाजे के साथ 117खिलाड़ियों और उनसे भी ज्यादा सपोर्टिंग स्टाफ तथा अधिकारियों का दल रियो गया था।परिणाम ? वही ढाक के तीन।पदक जीतने के लाले।भला हो साक्षी और सिन्धु का जिन्होंने दल को खाली हाथ लौटने की शर्मिंदगी से बचा लिया।इस दल का शायद ही कोई खिलाड़ी हो जिसे आप नहीं जानते हों।मैं तो जानता था।ज्यादातर स्टार थे।लेकिन क्या आप दीपा मलिक,देवेन्द्र झाझंरिया,वरुण सिंह भाटी या मरियप्पन को जानते थे? क्या रियो पैरालंपिक में गए 19 खिलाड़ियों में से किसी एक को जानते थे?उनके किसी प्रशिक्षण शिविर या प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में सुना था? नहीं ना!मैंने तो नहीं सुना था।लेकिन उन 19 ने वो कर दिखाया जो 117 नहीं कर पाए।उन्होंने दो स्वर्ण एक रजत और एक कांस्य पदक जीते। एक बार फिर दोहराता हूँ उड़ान के लिए होंसले की जरुरत होती है;जीत के लिए जोश,जुनून,जज़्बे और कड़ी मेहनत की जरूरत होती है।रियो पैरालंपिक में गए भारतीय दल को बधाई।



Sunday, 18 September 2016

बात फुटबॉल की



                           1. इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए कि फुटबॉल विश्व का सबसे लोकप्रिय खेल है। पिछले दिनों दो बड़ी फुटबॉल प्रतियोगिताओं के रोमांच में सारा विश्व डूबता उतराता रहा। भारत भी इसका अपवाद नहीं रहा। एक कोपा अमेरिका कप जो अमेरिका में खेला गया और चिली विजेता बना। इस प्रतियोगिता के आयोजन के 100 साल पूरे होने के अवसर पर ये इसका 45वां विशेष  संस्करण था जिसमें दो फुटबॉल परिसंघों-द साउथ अमेरिकन फुटबॉल कॉन्फेडरेशन (CONMEBOL)और द फुटबॉल कॉन्फेडरेशन फॉर नार्थ एंड सेंट्रल अमेरिका एंड द कैरेबियन(CONCACAF)-की कुल 16 टीमों ने भाग लिया।दूसरा यूरो कप 2016 जो फ्रांस में खेला गया। इसमें कुल 24 टीमों ने भाग लिया और पुर्तगाल विजेता बनी।जब ये दोनों प्रतियोगिताएं साथ चल रही थी तो उन्हें आप एक साथ एक दूसरे के समानांतर चलते हुए भी देख सकते थे और एक दूसरे के आमने सामने खड़ा भी देख सकते थे। दोनों में बहुत कुछ  एक सा घट रहा था और  कुछ ऐसा भी घट रहा था जो एक  दूसरे के एकदम उलट था।

                                 2.अब यूरो कप फाइनल को ही लीजिए। पुर्तगाल और फ्रांस के बीच खेला गया ये फाइनल मैच इतिहास को दोबारा जी रहा था,एकदम हाल के इतिहास को। दरअसल ये फाइनल दो मैचों को एक साथ दोहरा रहा था। एक तरफ ये फ्रांस और जर्मनी के बीच खेले गए मैच को दोहरा रहा था। उस मैच में जर्मनी एक बेहतर सम्भावनाओं वाली टीम थी। इतिहास उसके साथ था। वो बेहतर खेली भी। ज्यादातर समय खेल फ्रांस की पेनल्टी बॉक्स के आस पास सिमटा था। जर्मनी टीम का अभेद्य रक्षण था। पर कोई क्लोसे उसके पास नहीं था। और जर्मनी हार गयी। अब फाइनल में वही सब फ्रांस के साथ घट रहा था। इतिहास फ्रांस के साथ था। फ्रांस पुर्तगाल की तुलना में बेहतर संभावनाओं वाली टीम थी। उसने शानदार खेलते हुए फाइनल में प्रवेश किया था। इसके विपरीत पुर्तगाल गिरते पड़ते यहां तक पहुँचा था।वो ना केवल विश्व चैंपियन रह चुका था बल्कि ये प्रतियोगिता भी तीन बार जीत चुका था।फुटबॉल की दुनिया का नया सितारा ग्रीजमान  उनके पास था। यहां फ्रांस ने बेहतर खेला भी।पर यहां एक बार फिर बेहतर खेलते हुए एक बेहतर संभावनाओं वाली टीम हार गयी।
                
                          3.दूसरी ओर मानो ये मैच कोपा कप फाइनल का रिप्ले  हो। कोपा  कप में एक ओर नामी गिरामी अर्जेंटीना की टीम थी तो दूसरी और कम सम्भावनाओं वाली चिली की टीम थी जैसे यहाँ फ्रांस के आगे पुर्तगाल की सम्भावना कमतर थीं। दोनों ही जगह कमतर संभावनाओं वाली टीमें जीतीं। दोनों ही मैचों में विश्व के दो सबसे बड़े खिलाडियों का मानों सब कुछ दांव पर लगा था। लियोनेस मेस्सी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने अपने अपने क्लब के लिए शानदार जीत हासिल की हैं। लेकिन दोनों ही अपनी राष्ट्रीय टीम के लिए कोई ख़िताब नहीं जीत सके थे। यदि मेस्सी 2014 के विश्व कप सहित चार फाइनल खेल कर  कोई ट्रॉफी  हाथ में नहीं उठा सके थे(ओलम्पिक को छोड़ कर) तो रोनाल्डो भी 2004 में यूनान के हाथों यूरो कप के फाइनल में चूक गए थे। दोनों जगह कमतर टीम विजेता बनीं। दोनों जगह दोनों उस्तादो को अश्रुपूर्ण नेत्रों से मैदान छोड़ना पड़ा। रोनाल्डो चोट खाकर बीच मैच में बाहर हो गए तो मेस्सी असफल पेनाल्टी किक के बाद। लेकिन ये विधि का विधान था कि  दोनों के नतीजे अलग होने थे। जिस समय मेस्सी गोल चूके उस समय इतनी देर हो चुकी थी कि उनके साथी उनके लिए जीत हासिल करने को एकजुट हो सकें,पर पुर्तगाल के खिलाडियों ने ऐसा कर दिखाया। उन्होंने अपने कप्तान और अपने हीरो के लिए यूरो कप जीत लिया। एक तरफ एक सपना आंसुओं के साथ किरच किरच बह रहा था तो दूसरी और एक सपना सपना  आंसुओं के पानी में सतरंगी इंद्रधनुष सा मन के आकाश पर नुमाया हो रहा था। एक और एक सपना दुःख और शर्म के बोझ तले दब कर ज़मीन में गहरे दबा जा रहा था तो दूसरी और एक सपना सफलता के रथ पे सवार हो  उत्साह और उमंग की कुंचाले भर रहा था।

                               4.दोनों ही फाइनल में दो टीमें जीती थीं। उनकी जीत के पीछे पूरी टीम की मेहनत थी। लेकिन दोनों ही फाइनल में दो इतने बड़े खिलाड़ी खेल रहे थे कि उनकी चर्चा के आगे टीमों की जीत नेपथ्य में चली गई। चिली की टीम में कोई बहुत बड़ा खिलाड़ी नहीं था। पर पूरी टीम एकजुट होकर खेली और  दिखाया कि टीम के आगे स्टार का कोई वज़ूद नहीं होता। जीत टीम के 11 खिलाड़ी दिलाते हैं। पर व्यक्ति पूजा मानव के स्वभाव में है जो पूरी टीम के बजाय नायक को महत्व देता है। उसकी सफलता असफलता  हावी हो जाती है। चिली के साथ ऐसा ही हुआ। एक कम संभावनाओं वाली चिली की टीम ने शानदार खेल दिखाया पर उसकी सर्वथा प्रशंसनीय जीत पर मेस्सी की असफलता हावी हो गयी। उसकी असफलता को चिली की  महत्वपूर्ण जीत से कहीं ज़्यादा महत्व मिला। ठीक ऐसा ही यूरो कप फाइनल में हुआ। रोनाल्डो जल्द ही चोटिल होकर  बाहर आ गए। तब पुर्तगाल की टीम ने अपने देश और अपने कप्तान के लिए कप जीता।  रोनाल्डो के आंसू,उनकी मैदान से बाहर की गतिविधियाँ और अन्ततः  देश के लिए कोई ख़िताब जीत लेना पुर्तगाल जीत से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया।

                                 5.एक बात और। समान महत्व की होते हुए भी कम से कम भारत मीडिया द्वारा इन दोनों ही प्रतियोगिताओं के कवरेज में खासा भेदभाव बरता। जहाँ यूरो कप को प्रमुखता से छापा या दिखाया गया,वही कोपा कप को हमेशा यूरो कप के बाद ही स्थान मिला। यहाँ तक कि जिस समय कोपा अमेरिका कप के नॉक आउट दौर के मैच शुरू हुए उस समय यूरो कप के लीग मैच खेले जा रहे थेतब भी यूरो कप के लीग मैचों को प्रमुखता मिली। अंगरेजी अखबार टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में यूरो कप को हमेशा  खेल पेज के पहले पेज  पर जगह मिली और कोपा कप को उसके बाद। यही हाल हिंदी अखबारों का था। यदि यूरो कप की खबर को तीन कलम मिले तो कोपा को दो या एक और यूरो  नीचे ही जगह मिली। यदि इन दोनों प्रतियोगिताओं की तुलना करें तो हर दृष्टि से समान महत्त्व की थीं। जहां यूरो में जर्मनी,फ्रांस,इटली,बेल्जियम'स्पेन जैसी टीमें थीं तो कोपा कप में ब्राज़ील,अर्जेंटीना,उरुग्वे चिली और मैक्सिको जैसी टीमें थीं। यदि यूरो में रोनाल्डो,ग्रीजमान,गिरोड,नानी,गेरेथ बेल जैसे खिलाड़ी थे तो  कोपा कप में भी मेस्सी,सांचेज़,क्लाडियो ब्रेवो,वर्गास जैसे खिलाड़ी थे।ब्राज़ील में 2014 में संपन्न विश्व कप में अंतिम 16 में जिन टीमों ने जगह बनायीं  उनमे से 6 यूरो कप में थीं-नीदरलैंड,जर्मनी,फ्रांस,बेल्जियम स्विट्ज़रलैंड और ग्रीस जबकि 7 टीमें  कप में खेल रही थीं-ब्राज़ील,अर्जेंटीना,चिली,कोलम्बिया,उरुग्वे,यूएसए,कोस्टारिका और मैक्सिको। मीडिया का पक्षपात रवैया स्पष्ट तौर पर सामने आया। ये अभी भी औपनिवेशिक गुलामी में जी रही है। जिसे पच्छिम और विशेष तौर पर यूरोपीय देशों की हर बेजां चीज़ भी खूब सुहाती है। कोपा कप की कलात्मकता पर यूरो कप की पॉवर और टेकनीक भारी पड़ी।
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Wednesday, 14 September 2016

Wow!rinka ..


                                                                          
                    इस बात में कोई शक शुबहा नहीं कि वारविंका बड़े मैचों के खिलाड़ी हैं। उन्होंने अब तक तीन ग्रैंड स्लैम फाइनल खेले हैं और तीनों ही जीते हैं। 2014 में ऑस्ट्रेलियन,2015 में फ्रेंच और अब 2016 में यू एस ओपन। इनमें से दो नोवाक जोकोविच के विरुद्ध। 31 साल की उम्र में यू एस ओपन जीतने वाले केन रोजवेल के बाद सबसे उम्रदराज खिलाड़ी हैं। टेनिस के फैबुलस फोर के वर्चस्व को अगर किसी ने चुनौती दी है तो वारविंका ने ही। फैबुलस फोर यानि रोजर फेडरर,एंडी मरे,राफेल नडाल और नोवाक जोकोविच। पिछले लगभग 12 सालों में इन चारों के वर्चस्व को इस बात से समझा जा सकता है कि 47 ग्रैंड स्लैम में से 42 इन चारों ने जीते हैं। बाकी 5 में 2009 में यू एस डेल पोत्रो ने और 2014 में सिलिच ने और शेष तीन वारविंका ने। इसके बावज़ूद भी स्टेनिलास वारविंका 31 की उम्र में इन चारों के उत्तराधिकारी बन पाएंगे मुश्किल लगता है। और इसीलिए वारविंका की जीत से ज़्यादा महत्वपूर्ण नोवाक की हार है। ये हार नोवाक के खेल करियर के ढलान का और टेनिस जगत के 'फैबुलस फोर' के पराभव का  संकेत तो नहीं ? रोज़र फेडरर का समय समाप्त है। राफा का चोट से उबरना अब मुश्किल लगता है। मरे सबसे अधिक अनिश्चित के शिकार हैं।  अभी नोवाक ही सबसे बड़े खिलाड़ी हैं। लेकिन फ्रेंच ओपन जीतने के बाद वे काफी संतुष्ट लग रहे हैं। जिस तरह से ओलम्पिक और यू एस में अनफिट दिखे कहीं उनका हस्र भी नडाल जैसा ना हो। ऐसे में टेनिस में निर्वात बनेगा उसे भरने के लिए निशिकोरी,सिलिच,किर्गियोस जैसे नए खिलाड़ियों के लिए बेहतरीन मौक़ा होगा। फिलहाल नए चैम्पियन का स्वागत। 

Wednesday, 7 September 2016

रियो व्यथा कथा

   

                                            कथा-1 

            बात जुलाई 2014 की है। ब्राज़ील में विश्व कप फुटबॉल प्रतियोगिता खेली जा रही थी। 8 जुलाई के दिन जर्मनी की टीम  उस विश्व कप को जीतने की सबसे प्रबल दावेदार मेजबान ब्राज़ील की टीम को ही नहीं रौंद रही थी बल्कि लाखों ब्राजील वासियों और उस टीम को चाहने वालों के सपनों को भी रौंद रही थी। उधर जर्मनी की टीम गोलों की झडी  लगा रही थी और इधर हर ब्राजीलवासी की आँख से आसुओं की धार बह रही थी क्योंकि तब उस पानी की ज़रूरत ब्राजीलवासियों को सबसे ज्यादा होनी थी। तब प्रकृति ने विधान रचा था कि प्रशांत महासागर के दक्षिणी अमेरिकी तट में होने वाली अल नीनो प्रक्रिया से हिन्द महासागर के देशों में कम वर्षा होगी।अब 2016 में एक बार फिर प्रकृति ने हमारे दर्द को समझा है।इस बार आँखों से पानी बहाने की ज़रुरत हमें है। जगह वही है ब्राजील।अवसर भी खेल आयोजन का है। 31वें ओलम्पिक खेलों का।यहां पर अब तक का सबसे बड़ा भारतीय ओलम्पिक दल खाली हाथ है। जिससे डबल डिजिट में पदकों की उम्मीद की जा रही थी उससे अब डबल पदक की उम्मीद भी जाती रही है। इस बार भारतीयों की उम्मीदें स्वाहा हो रही हैं। दर्द भारतीयों की आँखों से बह रहा है।इसीलिये अल नीनो यहाँ पर खूब पानी बरसा रहा है।हमारे साथ प्रकृति भी ग़मज़दा है। हमारे दुःख में हमारे साथ है। अभी कुछ दिन ऐसे ही पानी बरसेगा। आप अपने को अकेला मत समझिए।   


                                             कथा-2


    ज़िंदगी जब निराशा और हताशा के घने काले बादलों से आवृत हो ऐसे समय में क्षण भर के लिए चमकने वाली बिजली भी उम्मीद की बड़ी किरण लगती है। वो आपमें आशा और विश्वास का संचार कर देती है। रियो में भारतीय खिलाड़ियों के घोर निराशाजनक प्रदर्शन के बीच दीपा करमाकर का शानदार प्रदर्शन बिजली की तरह कौंध जाता है और हममें उम्मीद और विश्वास की किरण जगा जाता है।रियो ओलम्पिक में 120 खिलाड़ियों का भारतीय दल 11वें दिन भी खाली हाथ खड़ा है।अब तक जो तीन सबसे अच्छे प्रदर्शन हैं वे दीपा,अभिनव बिंद्रा और सानिया -बोपन्ना के हैं। ये तीनों ही कांस्य पदक से चूक कर चौथे स्थान पर रहे हैं। जहां बिंद्रा और सानिया-बोपन्ना का प्रदर्शन आपको निराश करता है वहीं दीपा का प्रदर्शन आश्वस्ति की तरह आता है। दरअसल कुछ हार भी जीत  जितनी ही  खूबसूरत  होती हैं क्योंकि वे आने वाले कल की सुन्दर तस्वीर बनाती हैं। दीपा का चौथे स्थान पर रहना भी उसके पदक जीत लेने जैसा अहसास दिलाता है। 
         एक तरफ अभिनव बिंद्रा हैं जिनके पास ढेर सारा अनुभव है। वे इसी प्रतियोगिता में स्वर्ण जीत चुके हैं। उनके पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है। उनकी अपनी शूटिंग रेंज है। वे जब चाहते है जहाँ चाहते हैं देश से लेकर विदेश तक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। उनके पास सबसे महंगे उपकरण हैं। सानिया -बोपन्ना विश्व के डबल्स के श्रेष्ठ खिलाड़ी है जिनके पास ना तो अनुभव की कमी है, प्रशिक्षण की ना और किसी तरह के संसाधनों की। वे एटीपी टूर्स में खेलते हैं शानदार प्रदर्शन करते हैं। लेकिन ओलम्पिक में सब के सब फुस्स हो जाते हैं। ऐसे देश के सुदूर पूर्व के छोटे से राज्य त्रिपुरा से एक साधारण सी लड़की असाधारण प्रदर्शन कर आपके लिए,देश के लिए गौरव के क्षण ले आती है। ये उसके भीतर का जोश है,जूनून है,लगन है,महत्वाकांक्षा है,उसके भीतर की आग है, जो उसे ना केवल  अपनी शारीरिक अक्षमता से लड़ने की ताक़त देती है बल्कि अभावों ,संसाधनों की कमी ,सिस्टम के दुष्चक्र को तोड़ कर ,उससे जूझ कर एक शानदार जिम्नास्ट में  तब्दील कर देती है। उसने एक ऐसे खेल में भारत को पहचान दिलाई में जिसमें वो कहीं नहीं है। उसने क्वालीफाई करने के समय से लेकर अब तक निरंतर अपने प्रदर्शन में सुधार किया है और आज चार सर्वश्रेष्ठ  जिम्नास्ट में शुमार हो गयी है। उसने ये दिखाया है कि जीत केवल सुविधाओं और संसाधनों की मोहताज़ नहीं होती बल्कि जोश ,जूनून ,लगन, कड़ी मेहनत और जज़्बे से जीत आती है।  



                                               कथा-3 

         नारी शक्ति ज़िन्दाबाद-साक्षी मलिक,दीपा करमाकर,पी वी सिंधु,सानिया मिर्ज़ा और ललिता बाबर !


                                               
                                               कथा-4




           


 भारत के अब तक के सबसे बड़े ओलंपिक दल के औसत से भी कमतर प्रदर्शन से दिलों में जो निराशा का रेगिस्तान पसर गया था उस मरु भूमि में साक्षी और सिंधु की सफलता नखलिस्तान की तरह आती हैं।इन दो लड़कियों के पदकों के रंग अलहदा होने के बावजूद इनकी खनक की प्रतिध्वनि एक सी सुनाई देती है।इन्होंने सवा अरब भारतीयों को गर्व करने का मौका दिया।विश्व के दूसरे सबसे बड़ी आबादी वाले देश के अब तक के सबसे बड़े दल के खाली हाथ लौटने पर शर्मसार होने से बचाया।दरअसल इनकी सफलता की कहानी बहुत कुछ कहती हैं। इनकी सफलता इनके परिवार के त्याग और संघर्ष की गाथा,इनकी सफलता इनके प्रशिक्षकों की उनकी काबिलियत में विश्वास और उनके परिश्रम की कहानी,इनकी सफलता इनकी लगन,कड़े परिश्रम,जज्बे और हौसले की दास्ताँ ।ये दोनों ही दो नए मुकाम हासिल करती हैं।वे सफलता की नई इबारत लिखती हैं। इनकी जीत बताती है कि  सफलता संसाधनों और सुविधाओं से ज्यादा होंसलों और कठिन परिश्रम की मोहताज होती है।
           


 लेकिन जब जीत के इन दो लम्हों को ध्यान से देखेंगे तो ऐसा भी लगेगा कि इनकी जीत के क्षणों की तस्वीरों से तमगों के अलहदा अलहदा रंगों की तरह छवियां भी जुदा जुदा सी बन रही हैं।सिंधु अपने सारे भोलेपन के बावजूद अभिमान और अभिजात्य से लबरेज दिखाई  है। हर जीत पर मुट्ठी भींच कर अपने को चीयर अप करने में उसमें कूट कूट कर भरा आत्मविश्वास छलक छलक जाता है। तो दूसरी और पहलवान की तमाम कठोरता चेहरे पर होने के बावजूद साक्षी के चेहरे से एक भदेसपन और करुणा बहती रहती है। वे दोनों ही एक से कार्य को अंजाम देती है फिर अंतर ? ये अंतर उनके  सामाजिक पृष्ठभूमि से और उनके खेल से तो नहीं उपजता? साक्षी उस समाज से आती है जहां खाप पंचायतें हैं,जहाँ लैंगिक अनुपात देश में सबसे कम है,जहां लैंगिक भेद अपने क्रूर रूप में है,जहाँ से देश का प्रधानमंत्री बेटी बचाओ बेटी बढाओ का कार्यक्रम शुरू करता है।एक ऐसे समाज में जहां लड़की को अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए कदम कदम पर संघर्ष करना पड़ता हो,वहां उसकी दृढ़ता और मजबूती में करुणा अन्तर्निहित हो ही जाती है। दूसरी और सिंधु दक्षिण के उस समाज से हैं जहां अपेक्षाकृत लैंगिक भेदभाव बहुत कम है,समानता और सम्मान  है। उसे आगे बढ़ने में उस तरह के सामाजिक अवरोधों का सामना नहीं करना पड़ता। इसीलिये उसमें अपने होने का आत्मविश्वास होता है। ये खेल का अंतर भी है। कुश्ती ज़मीन से जुड़ा खेल तो बैडमिंटन एलीट खेल।तो कुश्ती और उसके खेलने वालों में एक खास तरह का भदेसपन आना ही है।अपनी शिष्या को अपने कंधे पर बैठा कर एक कुश्ती का कोच की एरीना  चक्कर लगा सकता है।        पर अन्तर चाहे जो हो जेंडर बाएस्ड वाले इस देश में ये लडकियाँ ही जो देश की उम्मीदों का संबल हैं। एक सलाम तो बनता ही है फिर वो सिंधु साक्षी हो या दीपा अदिति सानिया और ललिता हो या कोई और। 






रियो ओलंपिक

     
           रियो ओलंपिक।विश्व का सबसे बड़ा खेल मेला बस शुरू होने को है।जोश, जुनून और रोमांच का मंच तैयार है।206 देशों के 11हज़ार से ज्यादा एथलीट 28 खेलों की 306 स्पर्धाओं में अपने अपने हुनर का जौहर दिखाने को तैयार हैं और विश्व तैयार है उनकी अतिमानवीय क्षमताओं का,उनके कौशल का अद्भुत प्रदर्शन देखनेको।वहाँ जीत होगी तो हार भी होगी।चेहरों से झरती खुशियाँ होंगी और आखों से बहते गम होंगे ।कुछ सपने हकीकत में बदल जाएंगे तो कुछ सपनेटूट कर किरच किरच बिखर जाएंगे ।वहाँ आँखों में आँखें डाल कर डराने वाले घोर प्रतिस्पर्धी भी होंगे तो गले लगाते सहयोगी भी।वहाँ खेल होगा ,खिलाड़ी होंगे,फ्लैश चमकाते कैमरे होंगे,पत्रकार होंगे,साम्बा की धुन पर थिरकते दीवाने दर्शक होंगे और पूरी ताकत से बाज़ार भी मौजूद होगा।एक आदर्श वाक्य भी होगा"और ऊँचा और तेज और शक्तिशाली"।और इन सब के बीच सवा अरब भारतीयों के लिए केंद्र में होगा अब तक का सबसे बड़ा भारतीय खिलाड़ियों का ओलंपिक दल ।तो आज से रोज़ एक दुआ भारतीय खिलाड़ियों की सफलता के नाम भी।







ये कुश्ती वो कुश्ती तो नहीं

                                                

         सुशील कुमार -नरसिंह विवाद और और उसका सीक्वल नरसिंह डोप टेस्ट विवाद भारतीय खेल इतिहास का एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक घटना है जिसके निश्चित ही दूरगामी परिणाम होंगे। सबसे दुखद तो ये है कि नेपथ्य में बैठे कुछ लोगों की महत्वकाक्षांओं और उनके स्वार्थों की कुश्ती देश के दो सबसे होनहार पहलवान रेसलिंग एरीना में बिछे गद्दों पर नहीं बल्कि उससे बाहर लड़ रहे हैं। पहले दौर की लड़ाई हाई कोर्ट में जाकर समाप्त होती है तो दूसरे दौर की लड़ाई नरसिंह के प्रतिबन्ध पर जाकर। लड़ाई शुरू हुई रियो ओलम्पिक में जाने के दावे को लेकर लेकिन अंत हुआ दोनों में से किसी के भी ओलम्पिक में जाने की किसी भी संभावना के समाप्त होने पर। 25 जून और 5 जुलाई को डोप टेस्ट के लिए नरसिंह के लिए गए दोनों नमूने पॉजिटिव पाए गए। नमूने पॉजिटिव पाए जाने की खबर के तुरंत बाद एक आरोप रचा गया कि ये उनके यानी नरसिंह के विरुद्ध षड़यंत्र है। इशारा निश्चित ही उनके प्रतिद्वंदी खिलाड़ी की तरफ था। आनन् फानन में एक रसोइया सामने आता है,प्रतिबंधित सप्लीमेंट मिलाने वाला पहचाना जाता है और नाड़ा के सामने पेश होने से एक दिन पहले पुलिस में एफआईआर दर्ज़ करा दी जाती है। साथ ही कुश्ती संघ द्वारा क्लीन चिट दे दी जाती है कि नरसिंह ऐसा नहीं कर सकता है। 
               लेकिन यहाँ ये आरोप कि उसे फ़साने का षड़यंत्र प्रतिद्वंदी पहलवान खिलाड़ी द्वारा किया गया,खुद अपना एक प्रतिपक्ष रचता है। वो ये कि क्या प्रतिद्वंदी पहलवान सबसे सॉफ्ट टारगेट नहीं है अपनी गलती का दोष उसके मत्थे मढ़ कर उसे बदनाम करके सहानुभूति खुद बटोर लो। इससे अपनी बचत होती है तो ठीक वरना प्रतिद्वंदी के रियो जाने का रास्ता तो बंद होना तय है ही। डोप टेस्ट के परिणाम आने के तुरंत बाद जिस तरह से षड़यंत्र थ्योरी सामने आई और जिस तरह से कुश्ती संघ द्वारा उसे क्लीन चित दी गयी (आमतौर पर ऐसे मामले में जांच की रिपोर्ट आने तक इंतज़ार किया जाता है) से पता  असली कुश्ती कहाँ लड़ी जा रही है। 

          दरअसल इस पूरे मामले को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो इस मामले के कुछ सूत्र हाथ आ सकते हैं। फ़ूड सप्लीमेंट और शक्तिवर्धक दवाईयों का प्रयोग विश्व व्यापक है। इससे शायद ही कोई देश या कोई खिलाड़ी अछूता बचा हो। डोप टेस्ट में पकड़े जाना या उससे बच निकलना इस बात पर निर्भर करता है कि इनका सेवन आपने कितने सुनियोजित ढंग से किया है।डोप टेस्ट के मामले में भारत का रिकार्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है। भारत में शक्तिवर्धक दवाईयों और फ़ूड सप्लीमेंट के प्रयोग की भयावहता का अंदाज़ा दो उदाहरणों से लगाया जा सकता है। एक,बकौल पत्रकार मित्र जो खेल कवर करते रहे हैं,प्रदेश स्तर तक के खेल आयोजन स्थल के वाश रूम में पड़ी सिरिंजों से इन दवाओं के प्रयोग के वॉल्यूम का अनुमान किया जा सकता है। दूसरे,अभी हाल ही में एक राज्य की पुलिस भर्ती में फिजिकल टेस्ट में अभ्यर्थियों के डोप टेस्ट कराये जाने से इस समस्या की गम्भीरता को समझा जा सकता है। लोग ये सोचते हैं कि एक खिलाड़ी और विशेष रूप से एक पहलवान गाय भैंस के घी दूध और बादाम पिस्ते से अपनी शारीरिक ज़रूरतें पूरी कर लेता है वे बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। स्वयं नरसिंह ने अपने फ़ूड सप्लीमेंट जाँच के लिए नाड़ा को सोंपे। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2014 से 2016 के मध्य भारत में डोप टेस्ट के 98 मामले सामने आए और वो इस मामले में विश्व में तीसरे स्थान पर है। रूस 111 मामलों के साथ पहले नंबर पर है। डोप के मामले में सोवियत रूस से बने राष्ट्र और उसके पूर्व सहयोगी पूर्वी यूरोपीय देश अधिक बदनाम रहे हैं। 
                              अस्सी नब्बे के दशकों में जब इन देशों में साम्यवादी शासन दरक रहा था तो इन देशों की आर्थिक बदहाली विश्व के सामने आ रही थी।  समय था जब भारत में खेलों का स्तर ऊंचा उठाने के लिए विदेशी कोचों की ज़ोरदार वकालत की जा रही थी। समय तमाम खेल संघों ने कोचों को ढूँढने के लिए इन देशों का रुख किया। यहां से दोयम दर्ज़े के सस्ते कोच लाकर देश में खूब वाहवाही लूटी। इन कोचों के भारत में आने पर अच्छे परिणामों की उम्मीदें  परवान चढ़ने लगी। इससे इन विदेशी कोचों पर अपनी नौकरी बचाने और संघों पर अपनी साख बचाने के लिए सकारात्मक परिणाम दिखाने का अतिरिक्त दबाव था। क्या इसे एक संयोग भर मना जाए कि अधिकांश डोपिंग के मामले इसी समय से और इन्हीं खेलों में आने शुरू हुए।  
              दूसरी ओर  शक्तिवर्धक दवाईयों और फ़ूड सप्लीमेंट्स का दुनिया भर में बड़ा बाज़ार है। हमारे देश में सारे अच्छे फ़ूड सप्लीमेंट बाहर से आते हैं जो खासे महंगे होते हैं। जो खिलाड़ी इन महंगे सलिमेंट्स को अफोर्ड नहीं कर पाता वो देश में बने सस्ते मगर घटिया सलिमेंट्स को प्रयोग करता है। इन सभी देसी विदेशी फ़ूड सलिमेंट्स और शक्तिवर्धक दवाईयों के जांच और क्वालिटी कंट्रोल की कोई व्यवस्था देश में नहीं है। और प्रोफेशनल सपोर्टिंग स्टाफ  अभाव में खिलाड़ी वही सब खा रहे हैं जो कंपनियां उन्हें परोस रही हैं। या फिर कोच और सपोर्टिंग स्टाफ उन्हें कह रहा है। वाडा और नाडा भी केवल प्रतिबंधित सप्लीमेंट्स और दवाईयों की बात करते हैं। वे ये नहीं बताते कि क्या खाना है। फलतः बाजार की बेलगाम दौड़ ने इस समस्या को विकराल बना दिया है। 
        खेल दो व्यक्तियों या दलों के मध्य शारीरिक और मानसिक क्षमताओं की ज़ोर आज़माइश है। इसमे इससे इतर  चीज की घुसपैठ होगी तो खेलों की मूल भावना आहत होगी ही होगी। मसलन खेल में उग्र राष्ट्रवाद की घुसपैठ होगी तो खिलाडियों को वैसे अमानुषिक अत्याचार झेलने पड़ सकते हैं जैसे चीन ने खेल महाशक्ति बनने के उपक्रम में अपने खिलाडियों पर किए बताए जाते हैं या फिर वैसी हिंसा झेलनी पद सकती है जैसी यूरोपीय  देशों के बीच फुटबॉल मैचों के दौरान होती है।  यदि खेलों में बाज़ार की एंट्री होती है तो निश्चित ही खेलों को  फिक्सिंग और डोपिंग जैसी समस्याओं से कोई नहीं बचा सकता। शायद भगवान् भी नहीं। तो दो  पहलवानों के इस विवाद को इस नज़रिये से भी परखने  कोशिश कीजिये।  




एक अनिर्णीत संघर्ष जारी है

एक अनिर्णीत संघर्ष जारी है  यकीन मानिए बैडमिंटन चीन और इंडोनेशिया के बिना भी उतना ही रोमांचक और शानदार हो सकता है जितना उनके रहते...