Thursday, 29 September 2016

फुटकल_1



ये कैसा तूफान है ज़िन्दगी में इस बार
ना हलचल है कोई ना शोर
आहें हैं सिसकियाँ हैं
बस यही निशां हैं बर्बादी के चारों ओर।
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Thursday, 22 September 2016

आज फिर जीने की तमन्ना है...




                         
(गूगल से साभार)
                                   

                                      बरसों पहले एक फिल्म देखी थी गाइड।बडी मकबूल फिल्म थी।अभिनय से लेकर संगीत तक हर लिहाज से शानदार फिल्म।इसमें एक गाना है "आज फिर जीने की तमन्ना है..."कभी इसको ध्यान से देखिए।एक स्त्री के लिए आजादी क्या होती है, बंधनों से मुक्त होकर वो कैसा महसूस करती है,इससे बेहतरीन अभिव्यक्ति मैंने नही देखी।बूढे बदमिजाज आर्कियोलोजिस्ट मार्को की युवा पत्नी रोजी उससे वैवाहिक संबंध खत्म कर राजू के साथ चल देती है।तब ये गाना फिल्माया गया है।हर बोझ,बंधन,वर्जनाओं से मुक्त।निर्द्वन्द।आजाद।आसमाँ में पंछी की सी।पानी में मीन सी।कल कल बहती पहाडी नदी सी।सरसराती हवा सी।स्त्री मुक्ति की इससे स्वाभाविक शानदार अभिव्यक्ति नहीं ही देखी पढी।इस एक गाने पर स्त्री विमर्श की कई पुस्तकें कुर्बान।


रियो पैरालंपिक

                
(गूगल से साभार)
                                                      लाल अक्सर गुदड़ी में छिपे होते हैं।खुशियाँ अक्सर उन लम्हों में आती हैं जब आप उनकी उम्मीद नहीं कर रहे होते हैं और अक्सर जिनकी काबिलियत में आपका विश्वास नहीं होता वे चमत्कार कर देते हैं।याद कीजिए रियो ओलंपिक खेलों को।कितने गाजे बाजे के साथ 117खिलाड़ियों और उनसे भी ज्यादा सपोर्टिंग स्टाफ तथा अधिकारियों का दल रियो गया था।परिणाम ? वही ढाक के तीन।पदक जीतने के लाले।भला हो साक्षी और सिन्धु का जिन्होंने दल को खाली हाथ लौटने की शर्मिंदगी से बचा लिया।इस दल का शायद ही कोई खिलाड़ी हो जिसे आप नहीं जानते हों।मैं तो जानता था।ज्यादातर स्टार थे।लेकिन क्या आप दीपा मलिक,देवेन्द्र झाझंरिया,वरुण सिंह भाटी या मरियप्पन को जानते थे? क्या रियो पैरालंपिक में गए 19 खिलाड़ियों में से किसी एक को जानते थे?उनके किसी प्रशिक्षण शिविर या प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में सुना था? नहीं ना!मैंने तो नहीं सुना था।लेकिन उन 19 ने वो कर दिखाया जो 117 नहीं कर पाए।उन्होंने दो स्वर्ण एक रजत और एक कांस्य पदक जीते। एक बार फिर दोहराता हूँ उड़ान के लिए होंसले की जरुरत होती है;जीत के लिए जोश,जुनून,जज़्बे और कड़ी मेहनत की जरूरत होती है।रियो पैरालंपिक में गए भारतीय दल को बधाई।



Sunday, 18 September 2016

बात फुटबॉल की



                           1. इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए कि फुटबॉल विश्व का सबसे लोकप्रिय खेल है। पिछले दिनों दो बड़ी फुटबॉल प्रतियोगिताओं के रोमांच में सारा विश्व डूबता उतराता रहा। भारत भी इसका अपवाद नहीं रहा। एक कोपा अमेरिका कप जो अमेरिका में खेला गया और चिली विजेता बना। इस प्रतियोगिता के आयोजन के 100 साल पूरे होने के अवसर पर ये इसका 45वां विशेष  संस्करण था जिसमें दो फुटबॉल परिसंघों-द साउथ अमेरिकन फुटबॉल कॉन्फेडरेशन (CONMEBOL)और द फुटबॉल कॉन्फेडरेशन फॉर नार्थ एंड सेंट्रल अमेरिका एंड द कैरेबियन(CONCACAF)-की कुल 16 टीमों ने भाग लिया।दूसरा यूरो कप 2016 जो फ्रांस में खेला गया। इसमें कुल 24 टीमों ने भाग लिया और पुर्तगाल विजेता बनी।जब ये दोनों प्रतियोगिताएं साथ चल रही थी तो उन्हें आप एक साथ एक दूसरे के समानांतर चलते हुए भी देख सकते थे और एक दूसरे के आमने सामने खड़ा भी देख सकते थे। दोनों में बहुत कुछ  एक सा घट रहा था और  कुछ ऐसा भी घट रहा था जो एक  दूसरे के एकदम उलट था।

                                 2.अब यूरो कप फाइनल को ही लीजिए। पुर्तगाल और फ्रांस के बीच खेला गया ये फाइनल मैच इतिहास को दोबारा जी रहा था,एकदम हाल के इतिहास को। दरअसल ये फाइनल दो मैचों को एक साथ दोहरा रहा था। एक तरफ ये फ्रांस और जर्मनी के बीच खेले गए मैच को दोहरा रहा था। उस मैच में जर्मनी एक बेहतर सम्भावनाओं वाली टीम थी। इतिहास उसके साथ था। वो बेहतर खेली भी। ज्यादातर समय खेल फ्रांस की पेनल्टी बॉक्स के आस पास सिमटा था। जर्मनी टीम का अभेद्य रक्षण था। पर कोई क्लोसे उसके पास नहीं था। और जर्मनी हार गयी। अब फाइनल में वही सब फ्रांस के साथ घट रहा था। इतिहास फ्रांस के साथ था। फ्रांस पुर्तगाल की तुलना में बेहतर संभावनाओं वाली टीम थी। उसने शानदार खेलते हुए फाइनल में प्रवेश किया था। इसके विपरीत पुर्तगाल गिरते पड़ते यहां तक पहुँचा था।वो ना केवल विश्व चैंपियन रह चुका था बल्कि ये प्रतियोगिता भी तीन बार जीत चुका था।फुटबॉल की दुनिया का नया सितारा ग्रीजमान  उनके पास था। यहां फ्रांस ने बेहतर खेला भी।पर यहां एक बार फिर बेहतर खेलते हुए एक बेहतर संभावनाओं वाली टीम हार गयी।
                
                          3.दूसरी ओर मानो ये मैच कोपा कप फाइनल का रिप्ले  हो। कोपा  कप में एक ओर नामी गिरामी अर्जेंटीना की टीम थी तो दूसरी और कम सम्भावनाओं वाली चिली की टीम थी जैसे यहाँ फ्रांस के आगे पुर्तगाल की सम्भावना कमतर थीं। दोनों ही जगह कमतर संभावनाओं वाली टीमें जीतीं। दोनों ही मैचों में विश्व के दो सबसे बड़े खिलाडियों का मानों सब कुछ दांव पर लगा था। लियोनेस मेस्सी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने अपने अपने क्लब के लिए शानदार जीत हासिल की हैं। लेकिन दोनों ही अपनी राष्ट्रीय टीम के लिए कोई ख़िताब नहीं जीत सके थे। यदि मेस्सी 2014 के विश्व कप सहित चार फाइनल खेल कर  कोई ट्रॉफी  हाथ में नहीं उठा सके थे(ओलम्पिक को छोड़ कर) तो रोनाल्डो भी 2004 में यूनान के हाथों यूरो कप के फाइनल में चूक गए थे। दोनों जगह कमतर टीम विजेता बनीं। दोनों जगह दोनों उस्तादो को अश्रुपूर्ण नेत्रों से मैदान छोड़ना पड़ा। रोनाल्डो चोट खाकर बीच मैच में बाहर हो गए तो मेस्सी असफल पेनाल्टी किक के बाद। लेकिन ये विधि का विधान था कि  दोनों के नतीजे अलग होने थे। जिस समय मेस्सी गोल चूके उस समय इतनी देर हो चुकी थी कि उनके साथी उनके लिए जीत हासिल करने को एकजुट हो सकें,पर पुर्तगाल के खिलाडियों ने ऐसा कर दिखाया। उन्होंने अपने कप्तान और अपने हीरो के लिए यूरो कप जीत लिया। एक तरफ एक सपना आंसुओं के साथ किरच किरच बह रहा था तो दूसरी और एक सपना सपना  आंसुओं के पानी में सतरंगी इंद्रधनुष सा मन के आकाश पर नुमाया हो रहा था। एक और एक सपना दुःख और शर्म के बोझ तले दब कर ज़मीन में गहरे दबा जा रहा था तो दूसरी और एक सपना सफलता के रथ पे सवार हो  उत्साह और उमंग की कुंचाले भर रहा था।

                               4.दोनों ही फाइनल में दो टीमें जीती थीं। उनकी जीत के पीछे पूरी टीम की मेहनत थी। लेकिन दोनों ही फाइनल में दो इतने बड़े खिलाड़ी खेल रहे थे कि उनकी चर्चा के आगे टीमों की जीत नेपथ्य में चली गई। चिली की टीम में कोई बहुत बड़ा खिलाड़ी नहीं था। पर पूरी टीम एकजुट होकर खेली और  दिखाया कि टीम के आगे स्टार का कोई वज़ूद नहीं होता। जीत टीम के 11 खिलाड़ी दिलाते हैं। पर व्यक्ति पूजा मानव के स्वभाव में है जो पूरी टीम के बजाय नायक को महत्व देता है। उसकी सफलता असफलता  हावी हो जाती है। चिली के साथ ऐसा ही हुआ। एक कम संभावनाओं वाली चिली की टीम ने शानदार खेल दिखाया पर उसकी सर्वथा प्रशंसनीय जीत पर मेस्सी की असफलता हावी हो गयी। उसकी असफलता को चिली की  महत्वपूर्ण जीत से कहीं ज़्यादा महत्व मिला। ठीक ऐसा ही यूरो कप फाइनल में हुआ। रोनाल्डो जल्द ही चोटिल होकर  बाहर आ गए। तब पुर्तगाल की टीम ने अपने देश और अपने कप्तान के लिए कप जीता।  रोनाल्डो के आंसू,उनकी मैदान से बाहर की गतिविधियाँ और अन्ततः  देश के लिए कोई ख़िताब जीत लेना पुर्तगाल जीत से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया।

                                 5.एक बात और। समान महत्व की होते हुए भी कम से कम भारत मीडिया द्वारा इन दोनों ही प्रतियोगिताओं के कवरेज में खासा भेदभाव बरता। जहाँ यूरो कप को प्रमुखता से छापा या दिखाया गया,वही कोपा कप को हमेशा यूरो कप के बाद ही स्थान मिला। यहाँ तक कि जिस समय कोपा अमेरिका कप के नॉक आउट दौर के मैच शुरू हुए उस समय यूरो कप के लीग मैच खेले जा रहे थेतब भी यूरो कप के लीग मैचों को प्रमुखता मिली। अंगरेजी अखबार टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में यूरो कप को हमेशा  खेल पेज के पहले पेज  पर जगह मिली और कोपा कप को उसके बाद। यही हाल हिंदी अखबारों का था। यदि यूरो कप की खबर को तीन कलम मिले तो कोपा को दो या एक और यूरो  नीचे ही जगह मिली। यदि इन दोनों प्रतियोगिताओं की तुलना करें तो हर दृष्टि से समान महत्त्व की थीं। जहां यूरो में जर्मनी,फ्रांस,इटली,बेल्जियम'स्पेन जैसी टीमें थीं तो कोपा कप में ब्राज़ील,अर्जेंटीना,उरुग्वे चिली और मैक्सिको जैसी टीमें थीं। यदि यूरो में रोनाल्डो,ग्रीजमान,गिरोड,नानी,गेरेथ बेल जैसे खिलाड़ी थे तो  कोपा कप में भी मेस्सी,सांचेज़,क्लाडियो ब्रेवो,वर्गास जैसे खिलाड़ी थे।ब्राज़ील में 2014 में संपन्न विश्व कप में अंतिम 16 में जिन टीमों ने जगह बनायीं  उनमे से 6 यूरो कप में थीं-नीदरलैंड,जर्मनी,फ्रांस,बेल्जियम स्विट्ज़रलैंड और ग्रीस जबकि 7 टीमें  कप में खेल रही थीं-ब्राज़ील,अर्जेंटीना,चिली,कोलम्बिया,उरुग्वे,यूएसए,कोस्टारिका और मैक्सिको। मीडिया का पक्षपात रवैया स्पष्ट तौर पर सामने आया। ये अभी भी औपनिवेशिक गुलामी में जी रही है। जिसे पच्छिम और विशेष तौर पर यूरोपीय देशों की हर बेजां चीज़ भी खूब सुहाती है। कोपा कप की कलात्मकता पर यूरो कप की पॉवर और टेकनीक भारी पड़ी।
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Wednesday, 14 September 2016

Wow!rinka ..


                                                                          
                    इस बात में कोई शक शुबहा नहीं कि वारविंका बड़े मैचों के खिलाड़ी हैं। उन्होंने अब तक तीन ग्रैंड स्लैम फाइनल खेले हैं और तीनों ही जीते हैं। 2014 में ऑस्ट्रेलियन,2015 में फ्रेंच और अब 2016 में यू एस ओपन। इनमें से दो नोवाक जोकोविच के विरुद्ध। 31 साल की उम्र में यू एस ओपन जीतने वाले केन रोजवेल के बाद सबसे उम्रदराज खिलाड़ी हैं। टेनिस के फैबुलस फोर के वर्चस्व को अगर किसी ने चुनौती दी है तो वारविंका ने ही। फैबुलस फोर यानि रोजर फेडरर,एंडी मरे,राफेल नडाल और नोवाक जोकोविच। पिछले लगभग 12 सालों में इन चारों के वर्चस्व को इस बात से समझा जा सकता है कि 47 ग्रैंड स्लैम में से 42 इन चारों ने जीते हैं। बाकी 5 में 2009 में यू एस डेल पोत्रो ने और 2014 में सिलिच ने और शेष तीन वारविंका ने। इसके बावज़ूद भी स्टेनिलास वारविंका 31 की उम्र में इन चारों के उत्तराधिकारी बन पाएंगे मुश्किल लगता है। और इसीलिए वारविंका की जीत से ज़्यादा महत्वपूर्ण नोवाक की हार है। ये हार नोवाक के खेल करियर के ढलान का और टेनिस जगत के 'फैबुलस फोर' के पराभव का  संकेत तो नहीं ? रोज़र फेडरर का समय समाप्त है। राफा का चोट से उबरना अब मुश्किल लगता है। मरे सबसे अधिक अनिश्चित के शिकार हैं।  अभी नोवाक ही सबसे बड़े खिलाड़ी हैं। लेकिन फ्रेंच ओपन जीतने के बाद वे काफी संतुष्ट लग रहे हैं। जिस तरह से ओलम्पिक और यू एस में अनफिट दिखे कहीं उनका हस्र भी नडाल जैसा ना हो। ऐसे में टेनिस में निर्वात बनेगा उसे भरने के लिए निशिकोरी,सिलिच,किर्गियोस जैसे नए खिलाड़ियों के लिए बेहतरीन मौक़ा होगा। फिलहाल नए चैम्पियन का स्वागत। 

Wednesday, 7 September 2016

रियो व्यथा कथा

   

                                            कथा-1 

            बात जुलाई 2014 की है। ब्राज़ील में विश्व कप फुटबॉल प्रतियोगिता खेली जा रही थी। 8 जुलाई के दिन जर्मनी की टीम  उस विश्व कप को जीतने की सबसे प्रबल दावेदार मेजबान ब्राज़ील की टीम को ही नहीं रौंद रही थी बल्कि लाखों ब्राजील वासियों और उस टीम को चाहने वालों के सपनों को भी रौंद रही थी। उधर जर्मनी की टीम गोलों की झडी  लगा रही थी और इधर हर ब्राजीलवासी की आँख से आसुओं की धार बह रही थी क्योंकि तब उस पानी की ज़रूरत ब्राजीलवासियों को सबसे ज्यादा होनी थी। तब प्रकृति ने विधान रचा था कि प्रशांत महासागर के दक्षिणी अमेरिकी तट में होने वाली अल नीनो प्रक्रिया से हिन्द महासागर के देशों में कम वर्षा होगी।अब 2016 में एक बार फिर प्रकृति ने हमारे दर्द को समझा है।इस बार आँखों से पानी बहाने की ज़रुरत हमें है। जगह वही है ब्राजील।अवसर भी खेल आयोजन का है। 31वें ओलम्पिक खेलों का।यहां पर अब तक का सबसे बड़ा भारतीय ओलम्पिक दल खाली हाथ है। जिससे डबल डिजिट में पदकों की उम्मीद की जा रही थी उससे अब डबल पदक की उम्मीद भी जाती रही है। इस बार भारतीयों की उम्मीदें स्वाहा हो रही हैं। दर्द भारतीयों की आँखों से बह रहा है।इसीलिये अल नीनो यहाँ पर खूब पानी बरसा रहा है।हमारे साथ प्रकृति भी ग़मज़दा है। हमारे दुःख में हमारे साथ है। अभी कुछ दिन ऐसे ही पानी बरसेगा। आप अपने को अकेला मत समझिए।   


                                             कथा-2


    ज़िंदगी जब निराशा और हताशा के घने काले बादलों से आवृत हो ऐसे समय में क्षण भर के लिए चमकने वाली बिजली भी उम्मीद की बड़ी किरण लगती है। वो आपमें आशा और विश्वास का संचार कर देती है। रियो में भारतीय खिलाड़ियों के घोर निराशाजनक प्रदर्शन के बीच दीपा करमाकर का शानदार प्रदर्शन बिजली की तरह कौंध जाता है और हममें उम्मीद और विश्वास की किरण जगा जाता है।रियो ओलम्पिक में 120 खिलाड़ियों का भारतीय दल 11वें दिन भी खाली हाथ खड़ा है।अब तक जो तीन सबसे अच्छे प्रदर्शन हैं वे दीपा,अभिनव बिंद्रा और सानिया -बोपन्ना के हैं। ये तीनों ही कांस्य पदक से चूक कर चौथे स्थान पर रहे हैं। जहां बिंद्रा और सानिया-बोपन्ना का प्रदर्शन आपको निराश करता है वहीं दीपा का प्रदर्शन आश्वस्ति की तरह आता है। दरअसल कुछ हार भी जीत  जितनी ही  खूबसूरत  होती हैं क्योंकि वे आने वाले कल की सुन्दर तस्वीर बनाती हैं। दीपा का चौथे स्थान पर रहना भी उसके पदक जीत लेने जैसा अहसास दिलाता है। 
         एक तरफ अभिनव बिंद्रा हैं जिनके पास ढेर सारा अनुभव है। वे इसी प्रतियोगिता में स्वर्ण जीत चुके हैं। उनके पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है। उनकी अपनी शूटिंग रेंज है। वे जब चाहते है जहाँ चाहते हैं देश से लेकर विदेश तक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। उनके पास सबसे महंगे उपकरण हैं। सानिया -बोपन्ना विश्व के डबल्स के श्रेष्ठ खिलाड़ी है जिनके पास ना तो अनुभव की कमी है, प्रशिक्षण की ना और किसी तरह के संसाधनों की। वे एटीपी टूर्स में खेलते हैं शानदार प्रदर्शन करते हैं। लेकिन ओलम्पिक में सब के सब फुस्स हो जाते हैं। ऐसे देश के सुदूर पूर्व के छोटे से राज्य त्रिपुरा से एक साधारण सी लड़की असाधारण प्रदर्शन कर आपके लिए,देश के लिए गौरव के क्षण ले आती है। ये उसके भीतर का जोश है,जूनून है,लगन है,महत्वाकांक्षा है,उसके भीतर की आग है, जो उसे ना केवल  अपनी शारीरिक अक्षमता से लड़ने की ताक़त देती है बल्कि अभावों ,संसाधनों की कमी ,सिस्टम के दुष्चक्र को तोड़ कर ,उससे जूझ कर एक शानदार जिम्नास्ट में  तब्दील कर देती है। उसने एक ऐसे खेल में भारत को पहचान दिलाई में जिसमें वो कहीं नहीं है। उसने क्वालीफाई करने के समय से लेकर अब तक निरंतर अपने प्रदर्शन में सुधार किया है और आज चार सर्वश्रेष्ठ  जिम्नास्ट में शुमार हो गयी है। उसने ये दिखाया है कि जीत केवल सुविधाओं और संसाधनों की मोहताज़ नहीं होती बल्कि जोश ,जूनून ,लगन, कड़ी मेहनत और जज़्बे से जीत आती है।  



                                               कथा-3 

         नारी शक्ति ज़िन्दाबाद-साक्षी मलिक,दीपा करमाकर,पी वी सिंधु,सानिया मिर्ज़ा और ललिता बाबर !


                                               
                                               कथा-4




           


 भारत के अब तक के सबसे बड़े ओलंपिक दल के औसत से भी कमतर प्रदर्शन से दिलों में जो निराशा का रेगिस्तान पसर गया था उस मरु भूमि में साक्षी और सिंधु की सफलता नखलिस्तान की तरह आती हैं।इन दो लड़कियों के पदकों के रंग अलहदा होने के बावजूद इनकी खनक की प्रतिध्वनि एक सी सुनाई देती है।इन्होंने सवा अरब भारतीयों को गर्व करने का मौका दिया।विश्व के दूसरे सबसे बड़ी आबादी वाले देश के अब तक के सबसे बड़े दल के खाली हाथ लौटने पर शर्मसार होने से बचाया।दरअसल इनकी सफलता की कहानी बहुत कुछ कहती हैं। इनकी सफलता इनके परिवार के त्याग और संघर्ष की गाथा,इनकी सफलता इनके प्रशिक्षकों की उनकी काबिलियत में विश्वास और उनके परिश्रम की कहानी,इनकी सफलता इनकी लगन,कड़े परिश्रम,जज्बे और हौसले की दास्ताँ ।ये दोनों ही दो नए मुकाम हासिल करती हैं।वे सफलता की नई इबारत लिखती हैं। इनकी जीत बताती है कि  सफलता संसाधनों और सुविधाओं से ज्यादा होंसलों और कठिन परिश्रम की मोहताज होती है।
           


 लेकिन जब जीत के इन दो लम्हों को ध्यान से देखेंगे तो ऐसा भी लगेगा कि इनकी जीत के क्षणों की तस्वीरों से तमगों के अलहदा अलहदा रंगों की तरह छवियां भी जुदा जुदा सी बन रही हैं।सिंधु अपने सारे भोलेपन के बावजूद अभिमान और अभिजात्य से लबरेज दिखाई  है। हर जीत पर मुट्ठी भींच कर अपने को चीयर अप करने में उसमें कूट कूट कर भरा आत्मविश्वास छलक छलक जाता है। तो दूसरी और पहलवान की तमाम कठोरता चेहरे पर होने के बावजूद साक्षी के चेहरे से एक भदेसपन और करुणा बहती रहती है। वे दोनों ही एक से कार्य को अंजाम देती है फिर अंतर ? ये अंतर उनके  सामाजिक पृष्ठभूमि से और उनके खेल से तो नहीं उपजता? साक्षी उस समाज से आती है जहां खाप पंचायतें हैं,जहाँ लैंगिक अनुपात देश में सबसे कम है,जहां लैंगिक भेद अपने क्रूर रूप में है,जहाँ से देश का प्रधानमंत्री बेटी बचाओ बेटी बढाओ का कार्यक्रम शुरू करता है।एक ऐसे समाज में जहां लड़की को अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए कदम कदम पर संघर्ष करना पड़ता हो,वहां उसकी दृढ़ता और मजबूती में करुणा अन्तर्निहित हो ही जाती है। दूसरी और सिंधु दक्षिण के उस समाज से हैं जहां अपेक्षाकृत लैंगिक भेदभाव बहुत कम है,समानता और सम्मान  है। उसे आगे बढ़ने में उस तरह के सामाजिक अवरोधों का सामना नहीं करना पड़ता। इसीलिये उसमें अपने होने का आत्मविश्वास होता है। ये खेल का अंतर भी है। कुश्ती ज़मीन से जुड़ा खेल तो बैडमिंटन एलीट खेल।तो कुश्ती और उसके खेलने वालों में एक खास तरह का भदेसपन आना ही है।अपनी शिष्या को अपने कंधे पर बैठा कर एक कुश्ती का कोच की एरीना  चक्कर लगा सकता है।        पर अन्तर चाहे जो हो जेंडर बाएस्ड वाले इस देश में ये लडकियाँ ही जो देश की उम्मीदों का संबल हैं। एक सलाम तो बनता ही है फिर वो सिंधु साक्षी हो या दीपा अदिति सानिया और ललिता हो या कोई और। 






रियो ओलंपिक

     
           रियो ओलंपिक।विश्व का सबसे बड़ा खेल मेला बस शुरू होने को है।जोश, जुनून और रोमांच का मंच तैयार है।206 देशों के 11हज़ार से ज्यादा एथलीट 28 खेलों की 306 स्पर्धाओं में अपने अपने हुनर का जौहर दिखाने को तैयार हैं और विश्व तैयार है उनकी अतिमानवीय क्षमताओं का,उनके कौशल का अद्भुत प्रदर्शन देखनेको।वहाँ जीत होगी तो हार भी होगी।चेहरों से झरती खुशियाँ होंगी और आखों से बहते गम होंगे ।कुछ सपने हकीकत में बदल जाएंगे तो कुछ सपनेटूट कर किरच किरच बिखर जाएंगे ।वहाँ आँखों में आँखें डाल कर डराने वाले घोर प्रतिस्पर्धी भी होंगे तो गले लगाते सहयोगी भी।वहाँ खेल होगा ,खिलाड़ी होंगे,फ्लैश चमकाते कैमरे होंगे,पत्रकार होंगे,साम्बा की धुन पर थिरकते दीवाने दर्शक होंगे और पूरी ताकत से बाज़ार भी मौजूद होगा।एक आदर्श वाक्य भी होगा"और ऊँचा और तेज और शक्तिशाली"।और इन सब के बीच सवा अरब भारतीयों के लिए केंद्र में होगा अब तक का सबसे बड़ा भारतीय खिलाड़ियों का ओलंपिक दल ।तो आज से रोज़ एक दुआ भारतीय खिलाड़ियों की सफलता के नाम भी।







ये कुश्ती वो कुश्ती तो नहीं

                                                

         सुशील कुमार -नरसिंह विवाद और और उसका सीक्वल नरसिंह डोप टेस्ट विवाद भारतीय खेल इतिहास का एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक घटना है जिसके निश्चित ही दूरगामी परिणाम होंगे। सबसे दुखद तो ये है कि नेपथ्य में बैठे कुछ लोगों की महत्वकाक्षांओं और उनके स्वार्थों की कुश्ती देश के दो सबसे होनहार पहलवान रेसलिंग एरीना में बिछे गद्दों पर नहीं बल्कि उससे बाहर लड़ रहे हैं। पहले दौर की लड़ाई हाई कोर्ट में जाकर समाप्त होती है तो दूसरे दौर की लड़ाई नरसिंह के प्रतिबन्ध पर जाकर। लड़ाई शुरू हुई रियो ओलम्पिक में जाने के दावे को लेकर लेकिन अंत हुआ दोनों में से किसी के भी ओलम्पिक में जाने की किसी भी संभावना के समाप्त होने पर। 25 जून और 5 जुलाई को डोप टेस्ट के लिए नरसिंह के लिए गए दोनों नमूने पॉजिटिव पाए गए। नमूने पॉजिटिव पाए जाने की खबर के तुरंत बाद एक आरोप रचा गया कि ये उनके यानी नरसिंह के विरुद्ध षड़यंत्र है। इशारा निश्चित ही उनके प्रतिद्वंदी खिलाड़ी की तरफ था। आनन् फानन में एक रसोइया सामने आता है,प्रतिबंधित सप्लीमेंट मिलाने वाला पहचाना जाता है और नाड़ा के सामने पेश होने से एक दिन पहले पुलिस में एफआईआर दर्ज़ करा दी जाती है। साथ ही कुश्ती संघ द्वारा क्लीन चिट दे दी जाती है कि नरसिंह ऐसा नहीं कर सकता है। 
               लेकिन यहाँ ये आरोप कि उसे फ़साने का षड़यंत्र प्रतिद्वंदी पहलवान खिलाड़ी द्वारा किया गया,खुद अपना एक प्रतिपक्ष रचता है। वो ये कि क्या प्रतिद्वंदी पहलवान सबसे सॉफ्ट टारगेट नहीं है अपनी गलती का दोष उसके मत्थे मढ़ कर उसे बदनाम करके सहानुभूति खुद बटोर लो। इससे अपनी बचत होती है तो ठीक वरना प्रतिद्वंदी के रियो जाने का रास्ता तो बंद होना तय है ही। डोप टेस्ट के परिणाम आने के तुरंत बाद जिस तरह से षड़यंत्र थ्योरी सामने आई और जिस तरह से कुश्ती संघ द्वारा उसे क्लीन चित दी गयी (आमतौर पर ऐसे मामले में जांच की रिपोर्ट आने तक इंतज़ार किया जाता है) से पता  असली कुश्ती कहाँ लड़ी जा रही है। 

          दरअसल इस पूरे मामले को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो इस मामले के कुछ सूत्र हाथ आ सकते हैं। फ़ूड सप्लीमेंट और शक्तिवर्धक दवाईयों का प्रयोग विश्व व्यापक है। इससे शायद ही कोई देश या कोई खिलाड़ी अछूता बचा हो। डोप टेस्ट में पकड़े जाना या उससे बच निकलना इस बात पर निर्भर करता है कि इनका सेवन आपने कितने सुनियोजित ढंग से किया है।डोप टेस्ट के मामले में भारत का रिकार्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है। भारत में शक्तिवर्धक दवाईयों और फ़ूड सप्लीमेंट के प्रयोग की भयावहता का अंदाज़ा दो उदाहरणों से लगाया जा सकता है। एक,बकौल पत्रकार मित्र जो खेल कवर करते रहे हैं,प्रदेश स्तर तक के खेल आयोजन स्थल के वाश रूम में पड़ी सिरिंजों से इन दवाओं के प्रयोग के वॉल्यूम का अनुमान किया जा सकता है। दूसरे,अभी हाल ही में एक राज्य की पुलिस भर्ती में फिजिकल टेस्ट में अभ्यर्थियों के डोप टेस्ट कराये जाने से इस समस्या की गम्भीरता को समझा जा सकता है। लोग ये सोचते हैं कि एक खिलाड़ी और विशेष रूप से एक पहलवान गाय भैंस के घी दूध और बादाम पिस्ते से अपनी शारीरिक ज़रूरतें पूरी कर लेता है वे बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। स्वयं नरसिंह ने अपने फ़ूड सप्लीमेंट जाँच के लिए नाड़ा को सोंपे। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2014 से 2016 के मध्य भारत में डोप टेस्ट के 98 मामले सामने आए और वो इस मामले में विश्व में तीसरे स्थान पर है। रूस 111 मामलों के साथ पहले नंबर पर है। डोप के मामले में सोवियत रूस से बने राष्ट्र और उसके पूर्व सहयोगी पूर्वी यूरोपीय देश अधिक बदनाम रहे हैं। 
                              अस्सी नब्बे के दशकों में जब इन देशों में साम्यवादी शासन दरक रहा था तो इन देशों की आर्थिक बदहाली विश्व के सामने आ रही थी।  समय था जब भारत में खेलों का स्तर ऊंचा उठाने के लिए विदेशी कोचों की ज़ोरदार वकालत की जा रही थी। समय तमाम खेल संघों ने कोचों को ढूँढने के लिए इन देशों का रुख किया। यहां से दोयम दर्ज़े के सस्ते कोच लाकर देश में खूब वाहवाही लूटी। इन कोचों के भारत में आने पर अच्छे परिणामों की उम्मीदें  परवान चढ़ने लगी। इससे इन विदेशी कोचों पर अपनी नौकरी बचाने और संघों पर अपनी साख बचाने के लिए सकारात्मक परिणाम दिखाने का अतिरिक्त दबाव था। क्या इसे एक संयोग भर मना जाए कि अधिकांश डोपिंग के मामले इसी समय से और इन्हीं खेलों में आने शुरू हुए।  
              दूसरी ओर  शक्तिवर्धक दवाईयों और फ़ूड सप्लीमेंट्स का दुनिया भर में बड़ा बाज़ार है। हमारे देश में सारे अच्छे फ़ूड सप्लीमेंट बाहर से आते हैं जो खासे महंगे होते हैं। जो खिलाड़ी इन महंगे सलिमेंट्स को अफोर्ड नहीं कर पाता वो देश में बने सस्ते मगर घटिया सलिमेंट्स को प्रयोग करता है। इन सभी देसी विदेशी फ़ूड सलिमेंट्स और शक्तिवर्धक दवाईयों के जांच और क्वालिटी कंट्रोल की कोई व्यवस्था देश में नहीं है। और प्रोफेशनल सपोर्टिंग स्टाफ  अभाव में खिलाड़ी वही सब खा रहे हैं जो कंपनियां उन्हें परोस रही हैं। या फिर कोच और सपोर्टिंग स्टाफ उन्हें कह रहा है। वाडा और नाडा भी केवल प्रतिबंधित सप्लीमेंट्स और दवाईयों की बात करते हैं। वे ये नहीं बताते कि क्या खाना है। फलतः बाजार की बेलगाम दौड़ ने इस समस्या को विकराल बना दिया है। 
        खेल दो व्यक्तियों या दलों के मध्य शारीरिक और मानसिक क्षमताओं की ज़ोर आज़माइश है। इसमे इससे इतर  चीज की घुसपैठ होगी तो खेलों की मूल भावना आहत होगी ही होगी। मसलन खेल में उग्र राष्ट्रवाद की घुसपैठ होगी तो खिलाडियों को वैसे अमानुषिक अत्याचार झेलने पड़ सकते हैं जैसे चीन ने खेल महाशक्ति बनने के उपक्रम में अपने खिलाडियों पर किए बताए जाते हैं या फिर वैसी हिंसा झेलनी पद सकती है जैसी यूरोपीय  देशों के बीच फुटबॉल मैचों के दौरान होती है।  यदि खेलों में बाज़ार की एंट्री होती है तो निश्चित ही खेलों को  फिक्सिंग और डोपिंग जैसी समस्याओं से कोई नहीं बचा सकता। शायद भगवान् भी नहीं। तो दो  पहलवानों के इस विवाद को इस नज़रिये से भी परखने  कोशिश कीजिये।  




दाना मांझी


                         
                
               दाना मांझी द्वारा अपनी पत्नी की लाश को कंधे पर रख कर की गई 12 किमी की उस यात्रा को कई दिन बीत गए हैं.... लेकिन अभी भी लग रहा है कि मानों वो यात्रा जारी है...... अंतर्मन में गहरे कहीं .....बार बार भीतर के मनुष्य को परखने की कोशिश में .....कि अगर वो कही तुम्हारे रास्ते में आता तो तुम क्या करते। क्या उसी तरह एक फोटो खींच कर तमाशा देखते रहते या मुँह फेर कर आगे बढ़ जाते। हर बार जवाब हाँ में ही आता है। आखिर हम रोज यही तो करते हैं.... दाना  मांझी की घटना पहली नहीं है और आख़िरी भी नहीं ... ऐसी कितनी ही घटनाएं हमारे आस पास घटती जाती हैं और हम उन्हें बस देखते जाते हैं। दरअसल ये घटना आदिम समाज से लेकर पूंजीवाद तक की मनुष्य की विकास यात्रा में मनुष्य के धीरे धीरे 'हम' के 'मैं' बदल जाने को और मरती जाती संवेदना को अपनी पूरी विद्रूपता के साथ प्रस्तुत करती है।इसका होना कोई आश्चर्य नहीं है। आश्चर्य तो तब होता जब उस 12 किमी यात्रा के बीच में कहीं कोई पीछे से आता और धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखता और कहता मेरा कंधा भी तुम्हारे साथ है,फिर कोई और आता,फिर एक और आता और फिर 'चले थे जानिबे मंज़िल अकेले,लोग आते गए कारवाँ बनता गया' की तर्ज़ पर एक बड़ा कारवाँ बन गया होता। तब होता आश्चर्य .....तब होता अजूबा।  
                    दाना के लिए कोई दया या सहानुभूति नहीं उपजती क्योंकि वो हीरो हैं दशरथ मांझी की तरह। 12 साल की अबोध बालिका के साथ कंधे पर अपनी मृत अर्धांगिनी को उठाए दीना एक अद्भुत कारुणिक दृश्य पैदा करता करता है जिसकी पृष्ठभूमि में करुणा का सागर लहरा रहा है। दाना एक ऐसा मनुष्य जिसके पास अपराजेय साहस और अकल्पनीय होंसला है,जिसके मन में प्रेम की अजस्र धारा बह रही है।सरकारी उपेक्षा,उदासीनता और असंवेदनशील रवैये से उपजी उसकी पीड़ा को समझा जा सकता है कि सरकारी वाहन आने का इंतज़ार किये बिना अपनी मृत पत्नी को अपने कंधे पर उठा कर अबोध बालिका के साथ चल देता है।एकदम अकेले.... कंधे पर मृत पत्नी....12 किमी दूरी .... .अद्भुत जीवट है,साहस है,होंसला है और अदुर्दमनीय जिजीविषा है। उस यात्रा के बीच हज़ारों लोग और साथ में मीडिया उसे देखते जाते हैं फोटो खींचते है वीडियो बनाते हैं। हमारे जैसे उन हज़ारों नपुंसकों के बीच वो अकेला है अविचल,अटल,निष्पृह भाव से चला जा रहा है। ऐसा साहस बिरला होता है। वो उसके सुख दुःख की संगिनी थी,एक लंबा समय साथ बिताया था,नेह का अटूट बंधन। उसे अंतिम विदाई उसकी अपनी माटी में देना चाहता था उसके अपनों के बीच। चाहता तो वहीं अंतिम संस्कार कर सकता था। कोई साधन न होने पर खुद के कंधे पर उठा लेता है। उसने प्रेम के ढाई आखर को सही मायने में गुना था। वो जानता था प्रेम की डगर आसां नहीं होती। वो कठिन राह चुनता है।  दरअसल उसकी ये यात्रा ताजमहल से बड़ा शाहाकार है। ये दशरथ मांझी की २२ बरसों की लंबी यात्रा से आगे की यात्रा है। 






फुटकल_2




गागर जितने मन में 
सागर के पानी जितनी हसरतें 
फिर भी मन कितना 
रीता रीता 
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एक अनिर्णीत संघर्ष जारी है

एक अनिर्णीत संघर्ष जारी है  यकीन मानिए बैडमिंटन चीन और इंडोनेशिया के बिना भी उतना ही रोमांचक और शानदार हो सकता है जितना उनके रहते...