Monday, 24 October 2016

पुल


नदी का पुल
उसके दो किनारों को जोड़ता है

ये भ्रम मात्र है।
पुल कुछ लोगों की ज़रूरतों की
पूर्ति का साधन भर है
और किनारों की निरंतरता को बाधित करने का साधन भी।
उनकी इच्छा तो
नदी के प्रेम में
उसके सहयात्री बने रहने में है
और उसके सागर में
विलीन होने के बाद
खुद को मिटा देने में भी।
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किनारों का मिलना ज़रूरी तो नहीं है।

Tuesday, 18 October 2016

फेसबुक की दुनिया_१

                                
                                    

                                      आपकी अपनी एक दुनिया है जिसमें आप जीते हैं। हममें से बहुतों की एक और दुनिया है-आभासी दुनिया।ये फेसबुक की दुनिया है।आभासी इसलिए कि वो होकर भी नहीं है और नहीं होने के बावज़ूद है। आपके पास अनगिनत लोग हैं,आपके हज़ारों मित्र हैं,फिर भी आप अकेले हैं। और अकेले होते हुए भी आप अपने को भीड़ से घिरा पाते हैं। यहाँ सब कुछ है-राग-द्वेष,अनुराग-विराग,प्यार-घृणा, लड़ाई-झगड़े,मैत्री। आखिर क्या नहीं है सब कुछ तो है  । इतना सब कुछ होते हुए भी खालीपन है। चारों ओर सन्नाटा है। सन्नाटे में गज़ब का कोलाहल है और इस कोलाहल के अपनी ताक़त के साथ मौज़ूद होने के बावज़ूद अजीब सा सूनापन है,ऐसा सूनापन जो आपके सीने को चीर कर रख दे।यहां चारों तरफ ज़िन्दगी के रंग बिखरे पड़े है। दूर से देखो इन रंगों से ज़िन्दगी के कितने खूबसूरत कोलाज़ बने दिखाई देते हैं और पकड़ने जाओ तो कोई रंग दिखाई ही नहीं देता,यहां तक कि श्याम श्वेत भी नहीं।बावज़ूद इसके यहाँ भरी पूरी दुनिया मौजूद है अपनी पूरी संभावनाओं के साथ। यहाँ लोग भी हैं अपनी पूरी ताक़त के साथ,अपने अपने चरित्रों को जीते हुए। आप लोगों की दीवारों पर जाइये।अद्भुत रंग मिलेंगे जीवन के। बस महसूस कीजिये।
                                              यहाँ एक दीवार है जहाँ तीन सहेलियां हमेशा मौजूद मिलेंगी एक साथ ज़िन्दगी को मुकम्मल बनाते हुए। एक ज़िन्दगी का सिरा शुरू करती है,दूसरी उसे आगे बढ़ाती है तो तीसरी उसे अंतिम छोर पे ले जाती है। वे एक जीवन की सरल सीधी रेखा खींचती हैं पर त्रिकोण बनाते हुए,तीनों एक दूसरे से खुद को भरते हुए और खुद से दूसरे को  भरते हुए भी।एक दूसरे की ओर आते हुए और एक दूसरे से दूर जाते हुए भी। इनमें एक प्रस्थान बिंदु है। वो रोज़ अपना स्टेटस अपडेट करती है। प्रेम रस से भीगा भीगा सा। अल्हड सा। दिल की गहराईयों से निकला। कुछ एब्स्ट्रेक्ट सा। एक अधूरापन सा लिए। एक चिर प्रतीक्षा में। मुकम्मल होने की चाह में। उसके उल्लास में भी भीतर ही भीतर करुण संगीत सा बजता सुनाई देता है। ये करुण स्वर तीव्र से तीव्रतर होता जाता हैं। जिस समय आप प्रेम में भीगे इस करुण संगीत को सुन रहे होते है कि अचानक एक क्लिक की आवाज़ सुनाई देती है। ये सहेली का कमेंट होता है। स्टेटस के जुगलबंदी करता सा। अब आपको करुण संगीत के साथ खिलखिलाहट भी सुनाई देने  लगती है। हास का गुदगुदाता सा संगीत तीव्र होता जाता है। हास धूप सा फ़ैल जाता है। मानो बादलों की ओट से फैली सुरमई छाँव को बादलों में सेंध लगाकर आई किरणों ने रोशनी में बदल दिया हो। सहेली का कमेंट पूर्णता लिए हुए। भरा पूरा सा। उल्लास और उमंग से रंगा। ये पहली सहेली को भी अपने रंग में रंग लेता है। वो भी खुशी के रंग में भीगने लगती है। करुणा का संगीत मंद होता जाता है। उल्लास के स्वर तीव्र होते जाते हैं। अब वे कमेंट दर कमेंट करती जाती हैं। वे पहाड़ी नदी का रूप ले लेती हैं। निर्द्वंद बहती जाती हैं। बहुत से नदी नालों को समाहित  हुए कल  कल करती,उल्लास के संगीत सी। इस संगीत में आप डूबे नहीं कि  एक क्लिक और। ये तीसरी सहेली का कमेंट है।  इसमें भी उल्लास है,उमंग है,यादें हैं,आहें हैं। ये दोनों से मिल कर कल कल का नाद कुछ और तेज करती है। पर इस तीसरे कमेंट में ऊर्जा होते हुए भी एक अजीब सा नैराश्य सा पसरा है,एक वैराग्य भाव सा है। मानो उसने जीवन को बहुत करीब से देखा हो या जीवन का सत्य जान लिया हो।अचानक लगता है वो पहाड़ी नदी किसी पहाड़ी क्षेत्र से समतल मैदान में बहने लगी है। शांत स्थिर नीरव सी। कुछ देर यूँ ही बहने के बाद तीनों सहेलियां वापस लौट जाती हैं अपनी अपनी दुनिया में अपने-अपने हिस्से के सुख दुःख सहने। लेकिन फिर मिलने को। निर्द्वंद बहने को। अपने को अभिव्यक्ति देने  को। जीवन में कुछ और रंग भरने को। 
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आभासी दुनिया के रंग _१ 
    

Friday, 14 October 2016

'तेरे बिना गुज़ारा ऐ दिल है मुश्किल'


सांसों का नाद सौंदर्य  अद्भुत है।
दरअसल साँसे ज़िन्दगी का रागात्मक संगीत है
और साँसे स्त्री पुरुष के रागात्मक संबंधों का जीवन भी है
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जब आप किसी किसी ऐसे माध्यम में काम करते हैं जहां आपके पास सम्प्रेषण के लिए टूल्स के रूप में सिर्फ ध्वनियाँ है। अपनी बात को कहने के लिए उन ध्वनियों से खेलना पड़ता हो। तो वे ध्वनियां आप में रच बस जाती है और आप उनमें।आप उन्हें जीने लगते हैं। उनमे से कुछ ध्वनियां आपको अपना दीवाना बना लेती है। साँसों  का नाद सौंदर्य मुझे हमेशा से ही आकर्षित करता रहा है। वे होती ही इतनी सेंसुअस ( sensuous)हैं कि वे बरबस आपको अपनी और खींच लेती हैं।
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जिस समय आकाशवाणी में काम करने आया सांसों पर नियंत्रण बड़ी कला  मानी जाती थी। उद्घोषक से अपेक्षा की जाती थी श्रोता को उसकी साँस नहीं सुनाई पड़नी चाहिए। यही कार्यक्रम प्रस्तोता से भी अपेक्षा की जाती थी और प्राय ऐसा ही होता भी था। उच्चरित शब्दों के कार्यक्रम (स्पोकन वर्ड ) यथा वार्ता,भेंटवार्ता,बातचीत,परिचर्चा में भाग लेने आने वाले विशेषज्ञों से भी इसी तरह की अपेक्षा होती। यदि उनकी आवाज़ आती भी तो उसको एडिट करने की कोशिश की जाती।ये आकाशवाणी की मान्य परम्परा थी और एक तरह का शुद्धतावादी दृष्टिकोण था।हाँ साँसों का उपयोग नाटक में खूब होता जहां इंटीमेट रिलेशन प्रेषण के लिए इससे उपयुक्त और उपलब्ध इफेक्ट कुछ नहीं हो सकता है। हां कोई संगीत एक विकल्प है लेकिन सिमित भूमिका के साथ। इतना ही कि साँसों से उत्पन्न प्रभाव की तीव्रता को वो कुछ और बढ़ा सकता है,उसे क्रिएट नहीं कर सकता। साँसे ना होने पर रेकार्डिंग या उद्घोषणाएँ साफ़ सुथरी होती है,उनमें एक निरंतरता बनी रहती है।साँसे श्रोता की एकाग्रता को भंग  करती है ऐसा माना जा सकता है। साफ़ सुथरी उद्घोषणाएं या कार्यक्रम सुनने का अपना मज़ा होता,अपना आनंद होता है। रेडियो सीलोन और वॉइस ऑफ़ अमेरिका में भी लगभग इसी तरह के कार्यक्रम होते। लेकिन इसके ठीक विपरीत जब आप बीबीसी से नीलाभ,अचला नागर राजनारायन बिसरिया,कैलाश बुधवार और तमाम लोगों की आवाज़ शार्ट वेव बैंड पर माइक्रोफोन से होती हुई ट्रांजिस्टर सेट से कानो में पहुँचती जिसमे साँसों की स्पष्ट और तीव्र ध्वनियाँ मिली होती तो वो कमाल का प्रभाव दिलोदिमाग पर असर करतीं। ऐसा नहीं कि बिना साँसों वाली आवाज़ आपको मदहोश नहीं करती लेकिन सांसो वाली आवाज़ों की कशिश कहाँ ?दरअसल वे आवाज़ बहुत ही सजीव और नेचुरल लगती हैं और अपनी सेंसुअलिटी से गजब का आकर्षण पैदा करती हैं।अधिक करीब लगती और उसी तीव्रता से कनेक्ट भी करतीं।
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यही बात संगीत में है। गायन में साँसों का नियंत्रण बहुत ही महत्वपूर्ण है। बरसों इसको साधना पड़ता है। ये बड़ी कला मानी जाती गायन में बीच में कितनी सफाई से सांस ले लें और श्रोताओ को पता ना चले। पुराने गाने में गायकों की साँसे नहीं ही सुनाई देतीं। लेकिन अब ऐसा नहीं है।अब आप गाने के बीच में गायक की साँसे सौ सकते हैं। बात लंबी हो गयी। दरअसल मैं बात सिर्फ एक गाने की करना चाहता था।रणबीर की नई फिल्म है 'ऐ  दिल है मुश्किल'.अरिजीत का गाया टाइटल ट्रैक है 'तू सफर है मेरा........' गज़ब का रोमानी।उसके मुखड़े को ध्यान से सुनिए।हाल के बरसों में कम से कम मैंने कोई ऐसा गाना नहीं सुना जिसमें साँसे इतनी प्रोमिनेन्ट हो।नहीं पता ये अनायास है या सायास। पर छोटे से पैच में इतनी बार। संगीत और आवाज़ के साथ साँसे क्या रूमानियत क्रिएट करती है। प्रीतम और अरिजीत के लिए एक वाह तो बनाता है। 
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'तेरे बिना गुज़ारा है ऐ दिल है मुश्किल'  









Wednesday, 12 October 2016

बिखरी स्मृतियाँ_1

  
        स्मृतियाँ तरल होती हैं।आप जब भी रिक्त होते हैं,शुष्क से,वे आपको तरल कर जाती हैं।10 Oct 2015 की पोस्ट से /मित्र के जन्मदिन को याद करते हुए-----
तुमने एक कहानी सुनाई थी। एक आठ दस साल का लड़का एक बगीचे से अक्सर गुलाब के फूल चुराता था। एक दिन चौकीदार ने पकड़ लिया और कमरे में बंद कर दिया। लेकिन वो लड़का मस्त रहा। उसने कमरे में चारों और निगाह घुमाई तो उसे बैडमिंटन का रैकेट दिखाई दिया। अब लडके का पूरा ध्यान इस बात पर था कि उस रैकेट को भी साथ ले जाने की कोई संभावना बन सकती है क्या। तुमने ये कहानी उस समय सुनाई थी जब हम लोग दोस्त बन चुके थे और डी.एम.कम्पाउंड से अक्सर आलू खोद(सही शब्द चुरा कर) कर लाते और पास के ऑफिस के फेंके हुए कागज़ जला कर भूनते और खाते।वो लड़का कोई और नहीं तुम थे और वो रैकेट मेरा था। वो हम लोगों की पहली मुलाकात थी मैं तुम्हारी बहादुरी पर अचंभित था। दोस्ती परवान चढ़ती गयी। क्या बेफिक्री के दिन थे। आँखों में बड़े बड़े सपने थे पर उन सपनों को पूरा करने का कोई दबाव नहीं था। या यूँ कहो कि ये पता ही नहीं था कि सपनों को पाने के लिए कोई जद्दोज़हद भी करनी होती है।बस सपनों पर सवार रोज़ शाम अपनी अपनी साइकिलों पर उस छोटे से शहर को एक छोर से दूसरे छोर तक आकाश में आवारा बादलों की तरह नापते रहते।उस घुमक्क्डी में ना जाने कितने ठौर आते। जीआईसी, अलीगंज अड्डा,जेल रोड,क्रिश्चियन कॉलेज,हाथी दरवाज़ा,घंटाघर,ग़ांधी मार्केट,अरुणानगर,हनुमान गढ़ी,माल गोदाम और भी ना जाने कितने रास्तों से गुज़रते, पर आख़िरी पड़ाव अवनींद्र का घर ही होता और कई कई जग पानी पीते। वो रोज़ गाली देता और आने के लिए मना करता और हम रोज़ वही पहुँच जाते। लेकिन धीरे धीरे वे सपने जो कभी बादलों की मानिंद होते,उम्मीदों के बोझ से भारी होने लगे। किशोरावस्था की वो मस्ती और बेफिक्री धीरे धीरे कब ज़िंदगी से फिसलने लगी थी पता ही नहीं चला,कम से कम उस समय तक तो बिलकुल नहीं जब तक तेरे उस शहर में रहे। आज जब तुम अपना एक और जन्मदिन मना रहे होतो तुम्हें उन यादों में घसीट कर ले जाकर छोड़ देता हूँ। 
जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो। जुग जुग जियो बेटा!
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यादें याद आती हैं

Saturday, 1 October 2016

तीन त्रयी

             


                        दो चीजों का बचपन में जबरदस्त शौक था क्रिकेट देखने और फ़िल्मी गीत सुनने का।सिनेमा देखने का भी शौक था पर उस शिद्दत से पूरा नहीं हो पाता था जैसे ये दोनों शौक। बचपन से तरुणाई के संक्रमण काल में जब क्रिकेट का जादू सर चढ़ के बोल रहा था उस समय भारतीय फिरकी गेंदबाजों का पूरे क्रिकेट जगत में दबदबा था। उस समय इरापल्ली प्रसन्ना,बिशन सिंह बेदी और चंद्रशेखर की त्रयी अपनी अपने पूरे शबाब पर थी और फिरकी गेंदबाजी की कला अपने सुनहरे दौर में बल्कि कहें अपने चरमोत्कर्ष पर थी। यही वो समय था क्रिकेट की इस त्रयी की तरह हिंदी फिल्म संगीत में तीन गायकों की त्रयी छाई हुई थी-मुकेश,मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार की। ये हिंदी फिल्म संगीत का भी सुनहरा दौर था।ये वो समय था जब क्रिकेट लगातार पॉपुलर हो रहा था और एक इलीट खेल जनसाधारण के खेल में रूपांतरित हो रहा था।इसके ठीक विपरीत उसी समय हिंदी सिनेमा में एक नए तरह के सिनेमा का उदय हो रहा था न्यू वेव सिनेमा के नाम से। यहाँ लोकप्रिय सिनेमा से विशिष्ट सिनेमा का उदय हो रहा था। सिनेमा में नए प्रयोग हो रहे थे। जहाँ क्रिकेट अपना एलीट चरित्र बदल कर जनसाधारण के खेल में तब्दील  हो रहा था वहीं लोकप्रिय हिंदी सिनेमा से एक एलीट सिनेमा उभार पर था और इस सिनेमा की तीन बेहद संजीदा अभिनेत्रियों की त्रयी इस सिनेमा को नयी ऊचाईयां प्रदान कर रही थीं। ये त्रयी थी शबाना आज़मी,दीप्ती नवल और स्मिता पाटिल की।ये तीन त्रयी एक दूसरे के समानान्तर भी चलती हैं और एक दूसरे का अतिक्रमण कर  नए कॉम्बिनेशन भी बनाती चलती हैं।

                              सबसे पहले प्रसन्ना को देखिए। सीधे सरल से, हंसमुख। वैसी ही सरल सी गेंदबाजी। हल्का सा तिरछा छोटा सा रनअप,आसान सा बॉलिंग एक्शन,धीमी गति से ऊंची उड़ान वाली ऑफ ब्रेक गेंदबाजी,वे सिर्फ गेंद की ऊंचाई और लंबाई से बल्लेबाज़ को भरमाते,शॉट खेलने के लिए निमंत्रण देते और उन्हें गलती करने के लिए मज़बूर करते। प्रसन्ना के साथ मुकेश को देखिए। प्रसन्ना जैसे ही सीधे सरल से मुकेश भी। वैसी ही सरल सी उनकी गायकी। हल्की सी दर्द भरी मीठी सी आवाज़। शास्त्रीयता के आतंक से मुक्त उनके नग़में भावनाओं के उठान से दिल को छूते हैं और मन के आकाश पर फ़ैल जाते हैं।अब इनके साथ दीप्ती नवल को रखिए। उनके जैसा ही सहज सरल सौम्य मासूम सा चेहरा।  वैसी ही सहज अदाकारी। कोई साथ वाले घर की साधारण लड़की सी।ये तीनों मिलकर एक ऐसी त्रयी की निर्मिति करते हैं जिसकी प्रतिभा अपने सरलतम रूप में शिखर तक उठान पाती है।   

                                   बिशन सिंह बेदी-अपेक्षाकृत एक गंभीर व्यक्तित्व।बाएं हाथ के ऑर्थोडॉक्स लेग स्पिनर। किताबी नियमों जैसी एकदम नपी तुली सधी गेंदबाजी।ओवर दर ओवर एक ही जगह गेंद फेंक सकते थे और बल्लेबाज़ केवल उसको रोक भर सकता था बिना कोई रन बनाए। क्लासिक लेग स्पिन के श्रेष्ठ उदाहरण थे बेदी। यहाँ बेदी के साथ रफ़ी को खड़ा कीजिए। रफ़ी-सहज लेकिन धीर गंभीर। वैसा ही उनका गायन अपेक्षाकृत अधिक गंभीर,कुछ शास्त्रीयता का पुट लिए हुए। यहाँ स्मिता पाटिल उनके साथ आकर स्वतः खड़ी हो जाती हैं। वे बहुत ही गंभीर अभिनेत्री थीं। कला फिल्मों में ही नहीं कमर्शियल फिल्मों में भी बेहतरीन अभिनय किया। अपने अभिनय से उन्होंने अदाकारी को बुलंदियों तक पहुंचाया।ये तीनों एक साथ आकर एक ऐसी त्रयी का निर्माण करते हैं जहाँ प्रतिभा अपने शास्त्रीय रूप में प्रस्फुटित होती है और उठान पाती है। 

                                  किशोर कुमार ने संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली थी। लेकिन उनमें प्रतिभा कूट कूट कर भरी थी। वे मनमौजी और स्वच्छन्द तबियत के मालिक थे। उनके गीतों में भी वैसा ही उल्लास उत्सव मनमौजीपन झलकता है। वे बहुत अच्छा गाते तो बहुत खराब भी गा सकते थे।यहाँ चंद्रशेखर किशोर से टक्कर लेते हैं। वे भी प्रतिभा के धनी थे। जब उनका दिन होता तो वे अपने बूते मैच जिता देते। इतनी घातक गेंदबाज़ी करते कि उन्हें खेलना विश्व के किसी बल्लेबाज़ के लिए लगभग नामुमकिन होता। अगली ही इनिंग में वे बहुत ही खराब गेंदबाज़ी कर सकते थे। इन दोनों के साथ त्रयी बनाती हैं शबाना। उन जैसी ही अनिश्चितता लेकिन अपार संभावनाओं से भरी। प्रतिभा की उनमें भी कोई कमी नहीं। तमाम कला फिल्मों में शानदार अदाकारी की लेकिन कई कमर्शियल फिल्मों में हद दर्ज़े के ख़राब अदाकारी भी की।ये ये एक ऐसी त्रयी थी जिसमें अपार संभावनाओं वाले रॉ टेलेंट में विस्फोट होता तो सर्वश्रेष्ठ निकल कर आता वरना बहुत साधारण सा घटित होता।दरअसल बचपन से किशोरावस्था की दहलीज़ की और बढ़ाते हुए अन्य चीज़ों के साथ ये त्रयी भी आकर्षण के केंद्र में थीं और ये भी कि ये चीज़ों को देखने का एक नज़रिया भर है और कुछ नहीं।