Monday, 24 July 2017

महिला विश्व कप





             समय सबसे बड़ी शै है। वक़्त पर भला किसका ज़ोर चला है। इसे आज लॉर्ड्स के मैदान पर इतिहास बनाने उतरी भारतीय बालाओं से बेहतर भला  कौन समझ सकता है। जिस टीम को आप राउंड रोबिन में हरा चुके हों और फाइनल में भी लगभग 40 ओवरों तक मैच आप की पकड़ में हो कि अचानक अपनी अनुभवहीनता और हड़बड़ाहट में हार जाते हो तो आप केवल एक मैच ही नहीं हारते बल्कि एक स्वर्णिम इतिहास रचने का मौक़ा भी हाथ से गँवा देते हो। एक ऐसी हार जो आपको लम्बे समय तक सालती रहेगी।एक पल की गलती की खता सदियाँ भुगतती हैं कि कुछ ओवरों की गलतियां लम्बे समय तक टीसती रहेगी।
            इस सब के बावजूद हार निराशाजनक नहीं है। ये तस्वीर का एक पहलू है। आप सेल्फी लेती लड़कियों के चहरे ध्यान से पढ़िए। ये चहरे खुशी और आत्मविश्वास से लबरेज हैं। उन्हें खुद पर भरोसा है। भरोसा अपनी काबिलियत पर कि आने वाले समय में अपने भाग्य की इबारत वे खुद लिखेंगी कि दुनिया उस पर रश्क़ करेगी। हार के बावजूद ये भारतीय टीम ही है जिसने ऑस्ट्रेलिया,इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के वर्चस्व में सेंध लगाई है। ये भारतीय टीम ही है जो इन टीमों के अलावा दो बार फाइनल तक पहुंची। पिछले संस्करण में वेस्टइंडीज फाइनल में पहुँचाने वाली एक और टीम बनी थी।

                           भारत में महिला क्रिकेट की वो स्थिति नहीं है जो पुरुष क्रिकेट की है। हांलाकि पहला महिला टेस्ट मैच 1934 में खेला गया था ऑस्ट्रेलया और इंग्लैंड के बीच। पर भारत में 1973 में महिला क्रिकेट की नींव पडी जब वूमेंस क्रिकेट असोसिऐशन ऑफ़ इंडिया का गठन हुआ और 1976 में पहला टेस्ट मैच खेला वेस्ट इंडीज़ के विरुद्ध।तमाम दबावों के बाद 2006 में वूमेंस एसोसिएशन का बीसीसीआई में विलय हो गया। इस उम्मीद के साथ कि महिला क्रिकेट की दशा सुधरेगी। ऐसा हुआ नहीं। बीसीसीआई ने भी इस और कोई ध्यान नहीं दिया। ना उन्हें पैसा मिला,ना मैच मिले,ना बड़ी प्रतियोगिताएं मिली और ना आईपीएल जैसा कोई प्लेटफार्म। घरेलु क्रिकेट का भी कोई ढांचा विकसित हो पाया। इस सब के बावजूद अगर लडकियां विश्व पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराती हैं और एक ताकत बन कर उभर रहीं हैं तो ये उनकी खुद की मेहनत है,लगन है। ये उनके भीतर की बैचनी और छटपटाहट है अपने को सिद्ध करने की,साबित करने की।कोई गल नी जी। इस हार से ही जीत का रास्ता बनेगा कि 'गिरते हैं शह सवार मैदाने जंग में..।कम ऑन टीम इंडिया।

Sunday, 23 July 2017

इस बरसात

3. 
इस बरसात
तेरी याद
आँखों से बरसी बन
कतरा कतरा।


4.
इस बरसात
तेरी याद में 
इतनी बरसी आँखें
कि बेवफाई से लगे
जख्मोँ के समंदर भी
छोटे लगने लगे।  

5. 
ये सावन 
तेरी यादों का ही तो घर है 
यहां अक्सर वे बादलों की तरह घुमड़ती हैं 
और बिछोह की अकुलाहट की उष्मा से 
पिघल पिघल 
बूँद बूँद बरसती है।  

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Sunday, 16 July 2017

तुस्सी रियली रियली ग्रेट हो यार

तुस्सी रियली रियली ग्रेट हो यार



ये मानव जीवन की विडंबना ही है कि उसके मन में पुरातन के प्रति खासा रोमान होता है और स्थापित के प्रति अत्यधिक आग्रह,जबकि परिवर्तन उसके जीवन का शाश्वत सत्य होता है।यही विरोधाभास द्वन्द का आकार लेता है,पुराने और नए के बीच का द्वन्द-अपने को स्थापित करने का और अपने को साबित करने का।पुराने के पास अनुभव होता है,उसकी जड़े गहरी होती हैं। नए में वेग होता है,जोश होता है। नया पुराने को विस्थापित कर खुद को स्थापित करने की लगातार चेष्टा करता रहता है तो पुराना अपनी जगह स्थापित रहने के लिए नए का लगातार प्रतिरोध करता रहता है। संघर्ष लगातार चलता रहता है और एक समय आता है जब नया पुराने को विस्थापित कर खुद स्थापित कर देता है। फिर कुछ और नया आता है और इस तरह ये द्वन्द लगातार चलता रहता है। जीवन के हर क्षेत्र में और निसंदेह खेल में भी। आज आल इंग्लैंड क्लब के सेंटर कोर्ट में भी कुछ ऐसे ही जबरदस्त संघर्ष की उम्मीद थी। नए और पुराने के बीच। अनुभव और जोश के बीच। लेकिन ये एंटी क्लाइमेक्स था। 
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आज जब आल इंग्लैंड क्लब के सेंटर कोर्ट पर पुरुषों के फाइनल के लिए 35 वर्षीय रोजर फेडरर और  28 वर्षीय मारिन सिलिच जब मैदान में उतरे तो निसंदेह अधिकाँश खेल जानकार और खेल प्रेमी फेडरर की जीत के प्रति आग्रही ही नहीं बल्कि आश्वस्त भी थे। इसके अपने कारण भी थे जिनके चलते ऐसा होना स्वाभाविक था। पिछले साल विंबलडन में चोट के बाद वे कॉम्पटीटिव टेनिस से दूर रहे,फिटनेस पर ज़बरदस्त काम किया और तरोताज़ा होकर ऑस्ट्रेलियाई ओपन में शानदार जीत हासिल की। उसके बाद वे जानते थे कि क्ले कोर्ट उनका फोर्टे नही है, यहां शक्ति जाया करना बेकार है,इसलिए उन्होंने फ्रेंच ओपन छोड़ दिया। । उन्होंने इस समय का उपयोग विंबलडन की तैयारी में लगाया और फिटनेस पर ध्यान दिया। जिस तरह की टेनिस इन दिनों वे खेल रहे थे निसंदेह वे सबसे प्रबल दावेदार थे। हालांकि फैबुलस फोर के बाकी तीन भी उतने बड़े दावेदार थे। लेकिन बाकी तीन और फेड में जो अंतर था वो फिटनेस का था। जब मरे,जोकोविच और राफा खराब फिटनेस और चोट के चलते एक एक करके हारते चले गए तब एक फेड ही ऐसे थे जो अपनी फिटनेस और फॉर्म के चलते शानदार तरीके से जीत दर्ज़ करते जा रहे थे।लेकिन यकीं मानिये जब सब फेड पर दांव लगा रहे थे तो कुछ ऐसे भी लोग थे जो नए की तरफ बड़ी आस से टकटकी लगाए थे।कुछ लोग इस उम्मीद से भरे बैठे थे कि पिछले 15 सालों से विंबलडन के सेंटर कोर्ट पर फैबुलस 4 के चले आ रहे वर्चस्व को कभी तो चुनौती दी जा सकेगी। वे इस उम्मीद से भरे बैठे थे कि वो कभी शायद आज हो।और ये आस यूँ ही नहीं थी। इसके पीछे अपने तर्क थे। सिलिच ने इस पूरी प्रतियोगिता में शानदार खेल दिखाया था। भले ही फेड के खिलाफ उनका रेकॉर्ड 1-6 का हो,लेकिन आखरी दो मैच उनकी जीत की संभावना को जगाते थे। 2014 के यूएस ओपन के सेमीफाइनल में फेड को हराया था और पिछले साल यहीं विंबलडन में वे लगभग जीत ही गए थे। वे पहले दो सेट जीत चुके थे और चौथे सेट में तीन मैच पॉइंट उनके पास थे। तब भी हार गए। शायद उनका दिन नहीं था वो। कुल मिलाकर कड़े मुकाबले की तो उम्मीद की जा रही थी ही। 

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एक ऐसे मैच में जिसमे कड़े संघर्ष की उम्मीद की जा रही थी,ऐसे संघर्ष की जो इस साल के ऑस्ट्रेलियाई ओपन के फाइनल वाली ऊंचाइयों को छुए,सब कुछ उम्मीद के उलट हुआ। सिलिच ने शुरुआत बेहतर की 2-2 की बराबरी की पर तीसरे ही गेम में सर्विस तुड़वा बैठे और उसके बाद दो बार और। सेट हारे 3-6 से। दूसरे सेट में 0-3 से पिछड़ गए। यहां पर उन्हें मेडिकल ऐड की ज़रुरत पडी। खेल बीच में ही ख़त्म हुआ चाहता था। सिलिच ने हिम्मत दिखाई, मैच पूरा करने की औपचारिकता की। फेड ने 6-3,6-1,6-4 से मैच जीता। आठवीं बार विम्बलडन और 19वां ग्रैंड स्लैम खिताब जीतकर इतिहास के पन्नों में अमर हो गए सार्वकालिक महानतम एथलीट के रूप में।
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ये एक ऐसी जीत थी जिसे शायद फेड भी पसंद नहीं करेंगे। लेकिन खेल में ऐसा होता है। फिटनेस आधुनिक खेलों का आवश्यक अंग है। अगर आपको जीतना है,अव्वल रहना है तो फिट रहना ही होगा। इस उपहार में मिली जीत से फेड की महानता पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। जैसे राफा क्ले कोर्ट के बेताज बादशाह हैं,ग्रास कोर्ट पर अब उन्हें कोई छू नहीं सकता। उन्होंने पीट सम्प्रास की स्मृतियों को धुंधला दिया। वे सम्प्रास जिन्होंने अपने शानदार सर्व और वॉली खेल से विंबलडन के हरी घास के मैदान पर सात बार जीत दर्ज़ कर सफलता के नए प्रतिमान गढ़े थे। फेड की ये उपलब्धियां इसलिए भी शानदार हैं कि ये उन्होंने उस उम्र में हासिल की हैं जब अधिकांश खिलाड़ी खेलने की सोचता भी नहीं है। वे कुछ दिन में 36 के हो जाएंगे। उन्होंने अपना आखरी ग्रैंड स्लैम 2012 में जीता था विंबलडन। उसके बाद का समय उनकी असफलताओं का समय था। मरे,राफा और जोकोविच के सामने लगता रहा कि उनका समय समाप्त हो गया है। अब अक्सर उनसे संन्यास के बारे में सवाल किये जाने लगे। पर उन्होंने संयम और धैर्य बनाये रखा,हिम्मत नहीं हारी,खेलते रहे। इस साल शानदार वापसी की। पहले ऑस्ट्रेलियन और अब विंबलडन जीत कर खेल इतिहास की नयी इबारत लिख दी।
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 ओये फेड!तुस्सी रियली रियली ग्रेट हो यार! तेनू लख लख सलाम! 














विंबलडन की नई रानी



विंबलडन की नई रानी 
            


                'इतिहास अपने को दोहराता है' बहुत सारे लोग इस उक्ति को आंशिक सत्य ही मानते हैं क्योंकि ऊपर से समान दिखाई पड़ने के बावजूद दो घटनाएं अपनी मूल प्रकृति में काफी अलग होती हैं। लेकिन आज विंबलडन के सेंटर कोर्ट पर जो कुछ घट रहा था वो इस उक्ति को अक्षरशः सत्य सिद्ध कर रहा था।उस पर संयोग ये कि 23 साल पहले जो कुछ उस्ताद ने किया था उसे आज शागिर्द दोहरा रहा था। याद कीजिये 1994 का विम्बलडन। 37 वर्षीया चेक गणराज्य की मार्टिना नवरातिलोवा ओपन एरा में किसी ग्रैंड स्लैम के फाइनल में पहुँचने वाली सबसे उम्रदराज़ खिलाड़ी थी जो अपना दसवां विंबलडन खिताब जीतने का दावा पेश कर रहीं थीं। उनके सामने थीं 22 वर्षीया स्पेन की कोंचिता मार्टिनेज़। कोंचिता ने नवरातिलोवा की हसरत पूरी नहीं होने दी। उन्होंने नवरातिलोवा को 6-4,3-6 ,6-3 से हराकर उनका सपना चूर चूर कर दिया।अनुभव पर युवा जोश भारी पड़ा था। आज एक बार फिर उसी सेंटर कोर्ट पर 37 वर्षीया अमेरिकी वीनस विलियम्स सबसे उम्रदराज़ खिलाड़ी के रूप में अपना छठवां विंबलडन खिताब जीत कर ना भुला देने वाली रोमानी दास्ताँ लिख देना चाहती थीं।उन्होंने अपना पिछला ग्रैंड स्लैम 9 साल पहले जीता था।उनके रास्ते में एक बाधा थी। एक बार फिर स्पेन की ही युवा 23 वर्षीया बाला गार्बिने मुगुरूजा।एक बार फिर किंवदंती बनाते बनते रह गयी। अनुभव जोश से हार गया और वीनस मुगुरुजा से। संयोग ये भी था कि मुगुरुजा के रेगुलर कोच सैम सुमिक विंबलडन में नहीं थे और उनकी कोच के रूप में काम कर रही थी कोंचिता। उस्ताद की निगेहबानी में शागिर्द उसी का कारनामा दोहरा रहा था। विंबलडन को एक नया चैम्पियन मिला और 'वीनस रोजवाटर डिश' चूमने वाले नए होठ और उठाने वाले दो हाथ। और हाँ ग्रैंड स्लैम के फाइनल में दोनों विलियम्स बहनों-सेरेना और वीनस को हारने वाली पहली खिलाड़ी भी। 
                    दरअसल ये मुकाबला दो आक्रामक शैली वाले दो खिलाड़ियों के बीच था। अंतर उम्र का था। जिस समय वीनस ने पहला विंबलडन जीता था उस समय मुगुरुजा मात्रा 6 साल की थीं। जिस खिलाड़ी को वो खेलता देखते बड़ी हुई थीं आज उनसे दो दो हाथ करने को तैयार थी।दोनों की ताक़त बेसलाइन से तेज आक्रामक वॉली थी हांलाकि दोनों ही नेट पर भी समान रूप से खेल को नियंत्रित करने में सक्षम। पहले सेट में दोनों में कड़ा संघर्ष हुआ भी। 4-4 गेम जीत कर दोनों बराबरी पर। वीनस ने अपनी पांचवी सर्विस बरकरार रखी और मुरगुजा की पांचवी सर्विस पर दो ब्रेक पॉइंट हासिल किए। यहां वीनस चूक गयीं। मौके का फ़ायदा नहीं उठा पाईं। मुगुरुजा ने ना केवल दोनों ब्रेक पॉइंट बचाए बल्कि पांचवां गेम जीत कर 5-5 की बराबरी की। इसके बाद मुरगुजा के शानदार वोली और फोरहैंड शॉट्स और उनकी चपलता का वीनस के पास कोई जवाब नहीं था। अगले दो गेम जीत कर पहला सेट 7-5 से अपने नाम किया बल्कि अगलेसेट में लगातार तीन बार वीनस की सर्विस ब्रेक कर 6-0 सेट जीतकर चैंपियनशिप अपने नाम की। 
                 निसंदेह इस जीत ने स्पेन वासियों की राफा की हार से मिली टीस को कुछ राहत पहुंचाई होगी। मुगुरुजा को बहुत बहुत बधाई। 

Thursday, 13 July 2017

ये दिल


ये दिल


अक्सर 
तुम्हारे 
अहसासों की मखमली दूब पर
विचरते हुए
आँखों से फैले उम्मीद के नूर में 
मासूम खिलखिलाहट से निसृत राग भूपाली 
सुनते हुए 
होठों से झर कर 
यहां वहां बिखरे शब्दों के 
रेशमी सेमल फाहों को 
चुनने में दिन यूँ 
लुट जाता है
कि अभी तो बस एक लम्हा गुज़रा 
और रात घिर आई 
कि दिल के आसमां पर  
तारों से टिमटिमाते सपनों की 
महफ़िल सज गयी है 
ये नादाँ दिल है 
कि डूब डूब जाता है 
बार बार
यादों के समंदर में । 
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ये हसीं रात हो के ना हो 

Thursday, 29 June 2017

उम्मीद का चाँद


उम्मीद का चाँद
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जब जब मैंने चाहा  
कोई एक हो 
सावन बन बरस
भिगा दे तन मन
वो रूठा मानसून बन गया 
जब जब चाहा
कोई एक हो
बन धूप 
ठिठुरन से राहत दे 
वो शीत लहर बन गया
जब जब मैंने चाहा  
कोई एक हो 
छाया बन 
ताप से राहत दे 
वो लू सा चलने लगा 

पर हर नाउम्मीदी के चरम पर 
एक वो आता है 
कि बिन मौसम बरसात सा बरस 
मिटा देता अभाव के हर सूखेपन को 
कि सूरज बन टँक जाता मन के आकाश पर  
उष्मा सा फ़ैल
हर लेता निराशा की ठिठुरन 
कि समीर सा बहने लगता 
और सुखा जाता दुःख के हर स्वेद कण को 

वो जानता है 
कि नाउम्मीदी में उम्मीद का चाँद बन जाने से बेहतर
कहीं कुछ नहीं होता। 
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आ बैठे चल चर्च के पीछे 

Monday, 26 June 2017

ये मोह मोह के धागे



                                 ये मोह मोह के धागे
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                     जब प्रसिद्द डच खेल पत्रिका 'फ़ुटबाल इंटरनेशनल' रोनाल्डो की तो बात ही छोड़िए माराडोना और पेले से आगे लियोनेस मेस्सी को सार्वकालिक महानतम फुटबॉलर बता रही थी तो मैं इस बात को प्रकारांतर से इस तरह समझ रहा था कि मेस्सी आगे आने वाले समय में एक मिथक के रूप में याद किये जाएंगे और उनसे जुडी हर बात किंवदंतियों के रूप में आने वाली पीढ़ी देखेगी और समझेगी। तो क्या भविष्य में उनकी प्रेम कहानी भी पौराणिक या लोक आख्यानों की किसी अमर प्रेम कथा की तरह लोगों के दिलो दिमाग पर कब्जा जमाए होगी।मेस्सी की प्रेम कहानी ? हाँ लियो और अंतोनेला रोक्कुज़ो की प्रेम कहानी।
                 असाधारण प्रतिभा वाले अद्भुत खिलाड़ी के किसी प्रसिद्ध मॉडल या सेलिब्रिटी से प्रेम की कहानी नहीं।आस पड़ोस की गली मोहल्ले के किसी लडके-लड़की की कहानी जो साथ साथ रहते,हँसते,बोलते,खेलते,जीते जन्मती है,पनपती है और एक खूबसूरत आकार में ढल जाती है।हर उस इंसान की अपनी कहानी है जिसमें एक दिल धड़कता है।एक साधारण सी प्रेम कहानी जो असाधारण रूप से साधारण है और इसीलिए असाधारण बन जाती है।एक ऐसी प्रेम कहानी जो एक दूसरी प्रेम कहानी के सामानांतर चलती जाती है एक दूसरे की आँखों में आँख डाले भी और हाथों में हाथ लिए भी। लियो प्रेम के द्वैत को जीता जाता है। बचपन के दो प्रेम एक साथ।फुटबाल से प्रेम और बचपन की साथी से प्रेम।
                          ये कहानी दक्षिणी अमेरिकी देश अर्जेंटीना के मध्य प्रांत सांता फे के मध्यमवर्गीय चेतना वाले सबसे बड़े शहर रोसारियो में जन्मती है। इस कहानी का एक किरदार साधारण से मज़दूर और सफाईकर्मी दंपत्ति के तीन बेटों और एक बेटी में से एक लियोनेल आंद्रेस मेस्सी है तो दूसरा किरदार एक सुपरमार्केट की मालकिन की बेटी अंतोनेला रोक्कुज़ो।लियो प्रतिभा संपन्न था। पांच वर्ष की उम्र में स्थानीय ग्रैंडोली क्लब में शामिल होता है और जल्द ही नेवेल्स ओल्ड बॉयज में। इसी दौरान एक और फुटबॉलर लुकास स्कैग्लिआ से दोस्ती होती है और स्कैग्लिआ के माध्यम से उसकी कजिन अंतोनेला रोक्कुज़ो से। पराना नदी के खूबसूरत पश्चिमी किनारे  पर खेलते कूदते जब दोनों बचपन से किशोरावस्था की और बढ़ रहे थे तो वे एक दूसरे के दिल की और भी कदम बढ़ा रहे थे। पर बाल सुलभ संकोच भी रहा होगा और फिर लियो तो बहुत ही शर्मीले स्वभाव का था। दिल की बात ज़ुबाँ पे आती तो कैसे। फिर हर प्रेम कहानी की तरह एक और मोड़ आना था। विछोह का। लियो को बीमारी होती है-ग्रोथ हार्मोन्स डेफिशिएंसी की। खर्चा बड़ा था जिसे ना परिवार उठा सकता था और ना क्लब। ऐसे में बार्सीलोना के खेल निदेशक कार्ल रिक्सेस ने लियो की प्रतिभा को पहचाना,उसके साथ अनुबंध किया और उसके इलाज का प्रबंध भी। परिवार यूरोप आ गया।ये सन 2000  था। दो दोस्त बिछड़ रहे थे। लियो के मन में अंतोनेला के लिए गहरी आसक्ति थी। वो इसे भले ही जुबां से ना कह पा रहा हो पर उसने एक पत्र लिखा था और उसमें  लिखा 'तुम देखना एक दिन तुम मेरी गर्लफ्रेंड बनोगी'।ये नियति थी। भविष्य में ऐसा होना था और हुआ। दुनिया नई सदी में प्रवेश कर रही थी। तमाम चीजों के साथ दुनिया को अब तक का सबसे बड़ा फुटबॉलर भी मिलना था।
                            लियो और अंतोनेला के रास्ते अलग हो चुके थे। लेकिन जो आकर्षण लियो के मन में अंतोनेला के लिए था उसे उससे कैसे अलग किया जा सकता था। लियो बार बार अपने शहर लौटता रहा। नियति में मिलना था तो था। चार साल बाद 2004 में जब लियो रोसारियो आया तो अंतोनेला अपने मित्र की मृत्यु से अवसाद में थी। लियो ऐसे में उस मित्र से मिलने गया जिसे वो बचपन से चाहता था और अपनी गर्लफ्रेंड बनाने का सपना देखा था। बचपन का वो प्रेम जो मन के किसी कोने में समय की बेरुखी से अलसाया पड़ा था कि दुःख की इस भीगी भीगी धरती पर उछाह लेने लगा। अलसाया प्रेम चैतन्य हो आया था। अब ये किसी के रोके रुकने वाला ना था। अब अंतोनेला भी बार्सीलोना आ जाती है। पराना नदी के किनारे जिस प्रेम नीर का बहाव शुरू हुआ था वो मेडिटेरियन सी के किनारे अपने अंजाम को आतुर था। तरलता ठोस रूप लेने लगी थी।सन 2012 का जून का महीना था। 2 तारीख थी। अर्जेंटीना इक्वेडोर के विरुद्ध खेल रहा था। जैसे ही लियो ने दूसरा गोल किया। उसने गेंद को अपनी शर्ट के अंदर डाला और दुनिया के सामने घोषणा की कि वे जल्द पिता बनने जा रहे हैं। ठीक पांच महीने बाद बेटे का जन्म हुआ।11 सितम्बर 2015  को दूसरे बेटे का जन्म हुआ। बचपन का वो आकर्षण जो छोटे से सोते के रूप में मन में बह निकला था अब समुद्र सा विशाल हो चला था। एक कमज़ोर सा आकर्षण ठोस आकार ग्रहण कर चुका था और परिपक्व भी हो चला। उसे एक नाम मिलना चाहिए था। ना भी मिलता तो कोई बात नहीं थी। दोनों ने शादी के बंधन में बंधने का निश्चय किया। 30 जून को वे शादी के बंधन में बंध जाएंगे। लियो रोक्कुज़ो को शादी बहुत बहुत मुबारक हो।और हाँ हम आगे आने वाले समय में बताएँगे कि ऐसा कुछ हमारे समय में घटित हुआ था। 
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ये इश्क़ नहीं आसाँ ये तो समझ लीजिये 
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है!











Sunday, 18 June 2017

हार जीत

                           
                                             

          

                                       जीत हार 
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                               जब भी आपकी टीम हारती है आप ना केवल निराश होते हैं बल्कि दुखी भी होते हैं। फिर वो आपके क्लब की टीम हो,प्रदेश की टीम हो या देश की टीम हो। साइना या सिंधु हारती हैं तो निराशा होती है,सानिया या पेस हारते हैं तो निराशा होती है,नडाल या सेरेना हारती है तो निराशा होती है,बर्सिलोना या गोल्डन स्टेट हारती है तो निराशा होती है,ब्राज़ील या अर्जेंटीना हारती है तो निराशा होती है। आज जब भारतीय टीम हारी और जिस तरह से हारी उससे घोर निराशा होनी बनती है। लेकिन खेल है और खेल में एक पक्ष कभी भी अजेय नहीं हो सकता। भारत की टीम भी नहीं। आप जीत का जश्न मनाते हैं तो हार का मातम भी मनाइए कोई बुराई नहीं। 
                                  लीग मैच में पकिस्तान की टीम जिस तरह से हारी थी तो यही लिखा था कि ये किसी शेर द्वारा मेमने का शिकार करने जैसा था। ठीक चौदह दिन बाद एक बार वही दृश्य था बस किरदार बदल गए थे। पाकिस्तान की जीत निसंदेह काबिले तारीफ़ है।पिछले कुछ सालों में जाने कितने खिलाड़ी और कप्तान आये और गए। इस बार पाकिस्तान की टीम को सबसे कमज़ोर समझा जा रहा था। उसमे केवल दो ही पुराने और अनुभवी खिलाड़ी थे शोएब मालिक और हफ़ीज़। बाकि सब नए या कम अनुभवी। ये उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी थी थी जो चैंपियंस ट्रॉफी के ख़त्म होते होते सबसे बड़ी ताक़त बन गयी। .नए खिलाडियों ने एकजुटता दिखाई। मतभेदों के लिए पुराने खिलाड़ी थे नहीं।भारत से हार के बाद टीम ने अपने को संगठित किया,शानदार खेल दिखाया और विजेता बने। 
                                      खेल भावना कहती है अपने विपक्षी की सफलता को खुले दिल से सराहे। तो पाकिस्तान को ये शानदार जीत बहुत बहुत मुबारक हो।और हाँ हिन्दुस्तान को भी 7-1 से शानदार जीत पर बहुत बहुत बधाई। 






इंडोनिशया सुपर सीरीज

इंडोनिशया सुपर सीरीज
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                         खेल भले ही युद्ध ना होता हो पर मुक़ाबला तो होता ही है जिसमें एक पक्ष और दूसरा प्रतिपक्ष होता है और आप एक प्रतिभागी,दर्शक या समर्थक के रूप में स्वाभाविक पक्षकार होते हैं। अगर आप तटस्थ हैं तो निश्चित ही या तो आपमें खेल भावना का अभाव है या किसी अतिवाद से प्रभावित हैं। किसी भी टीम का समर्थन उतना ही सहज नैसर्गिक और न्यायसंगत है जितना कोई भी और कार्य हो सकता है।आज के दोनों मुक़ाबलों में जिनमें भारत पकिस्तान के मुक़ाबिल है भारत की जीत को लेकर अति उत्साहित हूँ और जीत की कामना करता हूँ। फिलहाल इस समय जो एक मुकाबला चल रहा है और दूसरा शाम सवा छह बजे शुरू होगा इनके नतीजे आने में अभी देर है। इस बीच एक तीसरे मुक़ाबले में भारत के लिए अच्छी खबर है और ये बैडमिंटन से है। इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आज फाइनल में श्रीकांत किदाम्बी ने जापान के काज़ुमासा सकाई को आसानी से 21-11 और 21-19 से हरा कर इंडोनेशिया सुपर सीरीज ओपन जीत लिया।
                         ये श्रीकांत का दूसरा सुपर सीरीज प्रीमियर ख़िताब है।वे इंडोनिशया सुपर सीरीज के पुरुष एकल फाइनल में पहुँचाने वाले और खिताब जीतने वाले पहले भारतीय शटलर हैं।पहले  महिलाओं में सिंधु और साइना की चुनौती दूसरे ही दौर में समाप्त हो गई। लेकिन पुरुष वर्ग में भारतीय खिलाडियों ने शानदार खेल दिखाया। एच एस प्रणय ने सेमि फाइनल तक का सफर तय किया और इस  उन्होंने 2016 ओलम्पिक स्वर्ण पदक विजेता चेन लॉन्ग और रजत पदक विजेता ली चोंग वेई को हराया लेकिन सेमि फाइनल में जापान के के सकाई से पार ना पा सके /दूसरी और श्रीकांत शानदार फॉर्म में थे। उन्होंने सेमीफइनल में विश्व नम्बर एक दक्षिण कोरिया के सोन वान हो को संघर्षपूर्ण मुक़ाबले में 21-15,14-21 और 24-22 से हराकर फाइनल में प्रवेश किया। आज विश्व नम्बर 47 पर किदाम्बी की जीत लगभग तय थी और उन्हें जीतने में कोई परेशानी नहीं हुई। किदाम्बी पी गोपीचंद के बाद भारत की बड़ी उम्मीद हैं। वे इन दिनों शानदार खेल रहे हैं। वे बहुत आक्रामक खिलाड़ी हैं और अपने ज़ोरदार स्मैशेस के लिए जाने जाते हैं। साथ ही उनके रेफ्लेक्सेस बहुत ही तेज़ हैं। आज फाइनल मैच का खेल उन ऊंचाइयों तक नहीं पहुंच पाया। अक्सर ऐसा होता कि सामने कमज़ोर खिलाड़ी के होने से एक स्वाभाविक ढिलाई आ जाती है। किदाम्बी के साथ ऐसा ही हुआ। उन्होंने धीमी शुरुआत की। स्मैशेस की जगह प्लेसिंग और नेट पर अच्छा खेल दिखाया और पहला सेट 21-11 से जीत लिया। अगर वे बेजा गलतियां(ना करते तो सकाई दहाई अंकों में भी नहीं पहुँच जाते। दूसरे गेम में श्रीकांत थोड़ा कैज़ुअल हुए और सकाई ने 11-6 की बढ़त ले ली। उसके बाद किदाम्बी संभले और स्कोर पहले 17-17 और उसके बाद 19-19 बराबर किया और फिर 21-19 से गेम जीत ख़िताब जीत लिया।
 
                                          आज तीन मुकाबले में पहली जीत की बधाई। 

वारियर्स


वारियर्स
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पिछले तीन सालों से एनबीए के जून में दो ही मुकाम होते हैं ओरेकल एरीना और क्विकें लॉन्स एरीना के सेंटर कोर्ट।बात 2015 की है जब 18 जून की रात को क्लीवलैंड ऑहियो के 'द क्यू' के नाम से प्रसिद्ध क्विकें लॉन्स एरीना के सेंटर कोर्ट में  गोल्डन स्टेट वारियर्स और क्लीवलैंड कैवेलियर्स के बीच एनबीए के फाइनल्स का छठा गेम समाप्त हुआ तो गोल्डन स्टेट टीम के लिए 40 सालों से संजोया सपना उनका अपना बन चुका था।2016 में एक बार फिर ये दोनों टीमें ही फाइनल्स में आमने सामने थीं। वारियर्स 3-1 आगे थी और लैरी ओ ब्रायन ट्रॉफी बैक टू बैक दूसरी बार वारियर्स के होमटाउन ओकलैंड की शोभा बढ़ाने जा ही रही थी कि लेब्रोन जेम्स की अगुआई में कैवेलियर्स की टीम ने अविश्वसनीय ढंग से वापसी की और वारियर्स को 4-3 से हरा कर लैरी ओ ब्रायन ट्रॉफी छीन ली।आहत वारियर्स ने 2014 के एमवीपी केविन डूरंट को ट्रेड किया।ये एक ऐसा परिवर्तन था जिसने वारियर्स को लगभग अपराजेय बना दिया। उन्होंने रेगुलर सेशन में 67-15 के रेकॉर्ड के साथ पोस्ट सेशन में प्रवेश किया और प्रतिद्वंदियों को लगभग रौंदते 12-0 से वेस्टर्न कांफेरेंस का फाइनल जीता।अब  एक बार फिर और  लगातार तीसरे साल कैवेलियर्स की टीम फाइनल्स में वारियर्स के  सामने थी जिसने आसानी से ईस्टर्न कॉन्फरेंस फाइनल जीता था। पिछले दो मुकाबलों में  लेब्रोन और करी के बीच के द्वन्द का आकर्षण  इस बार लेब्रोन और केविन डूरंट के द्वन्द में तब्दील हो गया था। जिस समय केविन डूरंट ने जुलाई 2016 में वारियर्स टीम ज्वाइन की थी तो उस समय निश्चित ही 2012 का फाइनल्स दिमाग में रहा होगा जब वे ओकलाहामा सिटी थंडर्स के लिए खेल रहे थे और लब्रोन मियामी हीट के लिए और लेब्रोन ने उन्हें अपनी पहली रिंग से वंचित कर दिया था। लेकिन इस बार केविन डूरंट वारियर्स से खेल रहे थे जिसे हरा पाना लगभग असंभव था और अंततः अपनी पहली रिंग पाने में सफल रहे। वारियर्स की तीन सालों में ये दूसरी टाइटल जीत थी। वारियर्स की टीम को बधाई तो बनती है। 

Friday, 16 June 2017

जीवन













जीवन 
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हर सुबह नए जोश से 
उमगता सा सूरज मिलने आता 
अपनी प्रियतमा धरती से 
दिन भर अठखेलियां करता 
ओढ़ा सुनहरी धूप की चुनरी 
उष्मा से उसे भरता जाता 
शाम ढले जब वो वापस जाता 
तो चंदा चुपके से 
मंद मंद मुस्काते आता 
हास परिहास कर उससे 
रुपहली चादर शीतल चांदनी से 
दग्ध प्रेमिका को सहला जाता
दूर गगन में हॅसते गाते तारे भी आते 
अपनी खिलखिलाहटों से 
वे भी धरती को कुछ उमगा जाते 
जब तब आवारा बादल भी तो आता 
कर चन्दा सूरज को पीछे 
भर प्यासी धरती को आगोश में 
उसकी प्यास मिटा जाता 
और 
बावली धरती 
इन सब से कुछ कुछ लेकर 
अपनी औरस संतान की खातिर 
खुद को हरा भरा करती जाती 
पर बेगैरत संतान वो उसकी 
कहाँ उसकी ममता का मान है धरती 
पहुंचा अपनी ही माँ को रुग्णावस्था में 
मृत्यु उसकी निश्चित करती 
नहीं जानते पर वे
जिस दिन मृत्यु माँ की होगी
कैसे उठेगी उनकी खुद की अर्थी ।    
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तो क्या मृत्यु ऐसे भी आती है ?













Sunday, 11 June 2017

ला डेसिमा/ए परफेक्ट टेन



ला डेसिमा/ए परफेक्ट टेन 
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आज रविवार की शाम फ्रांस के खूबसूरत शहर पेरिस के रोलां गैरों के फिलिप कार्टियर सेंटर कोर्ट की लाल मिट्टी पर जब राफेल नडाल अपने प्रतिद्वंदी स्टेनिलास वारविंका को मिट्टी की सतह पर टेनिस खेलने का सबक सिखाते हुए 6-2,6-3,6-1 से जीत दर्ज़ कर रहे थे तो वे केवल अपना दसवां फ्रेंच ओपन खिताब ही नहीं जीत रहे थे बल्कि 16 वीं शताब्दी के महान स्पेनिश  लेखक और संगीतकार विंसेंट एस्पिनल की तरह ही एक खूबसूरत 'डेसिमा' कविता लिख रहे थे जिसे एस्पिनल की कविताओं और संगीत की तरह ही उनके देश वासी लम्बे समय तक गुनगुनाते रहेंगे।डेसिमा के दस पंक्तियों वाले स्टेंज़ा को उन्होंने 2005 में लिखना शुरू किया और 2017 में पूरा किया। ओपन एरा में कोई भी ग्रैंड स्लैम 10 बार जीतने वाले वे पहले खिलाड़ी हैं। इस साल के शुरू में जब ऑस्ट्रेलियन ओपन का नडाल और फेडरर के बीच जो फाइनल मैच खेला गया वो केवल फाइनल मैच भर नहीं था बल्कि आधुनिक टेनिस इतिहास के पहले और दूसरे पायदान को निर्धारित करने वाला मैच भी था और उस क्लासिक मैच में फेडरर ने बाज़ी मारी थी। लेकिन आज नडाल ने बताया कि वे भी नम्बर दो नहीं हैं।हाँ सतह का फ़र्क़ हो सकता है। मिट्टी की सतह पर वे सार्वकालिक महानतम हैं इसमें किसी तरह का कोई शक नहीं किया जा सकता है। ये परफेक्ट 10 था-'ला डेसिमा'।इतना भर नहीं पहले मोंटो कार्लो और बार्सेलोना के क्ले कोर्ट पर और अब यहाँ पर दसवां खिताब जीत कर 'ट्रिपल टेन' पूरा किया। 
                       यहां पर याद कीजिये रियाल मेड्रिड फ़ुटबाल क्लब के दसवें यूरोपियन कप को जीतने के उसके ऑब्सेशन को कि 'ला डेसिमा' फ्रेज़ उसके इस ऑब्सेशन का समनार्थी बन गया था। उसने यूरोपियन कप जिसे अब चैम्पियंस लीग के नाम से जाना जाता है,नौवीं बार 2002 में जीता था। उसके बाद उसे 12 सालों तक प्रतीक्षा करनी पडी थी। तब जाकर 2014 में रियाल मेड्रिड की टीम अपना दसवां खिताब जीत सकी थी। लेकिन नडाल को केवल दो वर्ष लगे। 
                   नडाल ने अपना नौवा खिताब 2014 में जीता था। उसके बाद के दो वर्ष चोटों और ख़राब फॉर्म के रहे। एक बारगी लगाने लगा था कि उनकी वापसी की संभावनाएं ख़त्म हो गई हैं।लेकिन उन्होंने चैम्पियन की तरह वापसी की।इस साल वे चोट से उबरे और साल के पहले ही ग्रैंड स्लैम ऑस्ट्रेलियन ओपन के फाइनल में पहुँच कर अपनी फॉर्म की वापसी की घोषणा कर दी थी।और फिर मिट्टी की सतह पर तो वे लगभग अपराजेय से थे। वे इस पूरे सीजन में केवल एक मैच हारे रोम मास्टर्स के फाइनल में डोमिनिक थिएम से। 
                   फ्रेंच ओपन में उनकी जीत क्ले कोर्ट पर उनकी श्रेष्ठता को प्रदर्शित करती है। उन्होंने इस पूरी प्रतियोगिता में एक भी सेट नहीं हारा। इस प्रतियोगिता में उन्होंने ऐसा तीसरी बार किया।सेमीफइनल में थिएम को सीधे सेटों में हराया जिसने नोवाक को हरा कर सेमीफाइनल में प्रवेश किया था और इस प्रतियोगिता से ऐन पहले रोम मास्टर्स के फाइनल में नडाल को हराया था। वारविंका से फाइनल में कड़े संघर्ष की उम्मीद की जा रही थी। इस पूरी प्रतियोगिता में वारविंका भी ज़बरदस्त फॉर्म में थे। उनके पक्ष में कई बातें थी। उनमें गज़ब का स्टेमिना है जो इस समय किसी टेनिस खिलाड़ी के पास नहीं है। 30 डिग्री तापमान में खेलने के लिए वे शारीरिक रूप से सबसे अधिक सक्षम थे। उन्होंने अब तक के तीनों ग्रैंड स्लैम फाइनल जीते थे। और इस बार उन्हें नडाल की चौथी वरीयता के मुक़ाबले तीसरी वरीयता दी गई थी।उनका सबसे शक्तिशाली अस्त्र उनके ज़बरदस्त फोरहैंड शॉट्स थे जिसे वे इस बार बहुत शानदार तरीके से लगा रहे थे। दूसरी और नडाल की भी सबसे बड़ी ताक़त उनके फोरहैंड शॉट्स ही थे।वे दोनों एक दूसरे को फोरहैंड शॉट्स खेलने से नहीं रोक सकते थे। ऐसे में ज़रूरी था कि वे अपने प्रतिद्वंदी को फोरहैंड शॉट्स को पोजीशन ना करने दें। आज नडाल ऐसा करने में सफल रहे। उन्होंने शानदार सर्विस की और इतने ज़बरदस्त क्रॉसकोर्ट और डाउन द लाइन फोरहैंड शॉट्स लगाए कि वारविंका अपने शॉट्स तो दूर की बात थी खुद को भी पोजीशन नहीं कर पाए।
                   दरअसल ये एकतरफ़ा फाइनल था जिसमें एक महान स्पेनिश खिलाड़ी बाल और रैकेट से लाल मिट्टी पर शानदार डेसिमा की रचना कर वहां बैठे हज़ारों दर्शकों को सुना रहा था।खुद उनका प्रतिद्वंदी मंत्र मुग्ध सा उन्हें सुन और देख रहा था और वो था कि टेनिस जगत में एक असाधारण इतिहास लिख रहा था।  

Friday, 9 June 2017

जब ये दिल उदास हो







जब भी ये दिल उदास होता है 
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सुनो 
मत होना उदास 
कि नहीं हूँ मैं 
तुम्हारे आस पास 


बस ज़रा खुद से बाहर आना 
देखना पत्तों पर ठहरी ओस की बूंदें 
और महसूसना मेरे मन का गीलेपन   
सुनना पक्षियों का कलरव  
और महसूसना मेरे दिल की धड़कन 
थोड़ी देर ठहरना ऐसे ही 
लिपटना हवा के झोंकों से  
और महसूसना मेरी साँसों की कम्पन 
थोड़ी सी मिट्टी हाथ में लेना 
घोलना अपनी आँख का पानी  
और महसूसना मेरी देह गंध 
थोड़ी देर बाहर ही रहना 
खुद को हवाले करना 
रिमझिम बरसते
धरती के लिए बादल राग के 
कि खुद ही महकने लगोगी मेरे प्रेम की कस्तूरी से 

और जान जाओगी 
मैं वहीं कहीं हूँ 
वहीं कहीं 
तुम्हारे पास ! 
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जब भी ये दिल उदास होता है 
जाने कौन आस पास होता है !













Monday, 5 June 2017

मेमने का शिकार




                              तमाम कारणों से यूँ तो क्रिकेट में रूचि कम हो रही है। लेकिन जब भी भारत पाक मैच होता है तो दिलचस्पी बढ़  ही जाती है।कारण यही है कि भारत पाक के खिलाड़ी मैदान में जब भी आमने सामने होते हैं,फिर वो चाहे कोई भी खेल हो,दिल से खेलते हैं,जोश जूनून और जज़्बे के साथ खेलते हैं जो खेल की बुनियादी शर्त है। खेल में शारीरिक खेल कौशल ही नहीं बल्कि मानसिक क्षमता का भी संघर्ष होता है और उनके धैर्य और दबाव झेलने की क्षमता का भी। इस सब से खेल उठान पाता है और आपको खेल देखने में आनन्द आता है। भारत और पाक के पिछले मुक़ाबले इस बात के गवाह हैं। फिर ये भारत और पाक के बीच ही नहीं बल्कि किन्ही भी दो पारम्परिक प्रतिद्वंदियों के बीच मुक़ाबलों का सच है। लेकिन कल रात एजबेस्टन में खेला गया मैच निराश करने वाला था। ये शेर द्वारा मेमने का शिकार करने जैसा कुछ था।ये इन दोनों टीमों के बीच खेला गया शायद अब तक का सबसे नीरस मैच था।ये सही है कि भारत की टीम की टीम इस समय दुनिया की सबसे मज़बूत टीमों में से है और पाक की सबसे कमज़ोर टीम। लेकिन जिस तरह से पाक टीम ने हार मानी ये आश्चर्य की बात थी। वे शुरू से ही हारा हुआ मैच खेल रहे थे। उनकी शारीरिक भाषा केवल और केवल नकारात्मक संकेत प्रेषित कर रही थी। दरअसल पाकिस्तानी क्रिकेट की ये दशा पाकिस्तान की अंदुरुनी दशा पर टिप्पणी है। देश बदहाली के दौर से गुज़र रहा है। आतंकवाद और धर्मान्धता से जूझ रहा है।आधुनिकता से दूर दूर तक कोई नाता नहीं,आधुनिक सोच,शिक्षा ,आर्थिक प्रगति किसी से भी। वहां का घरेलु क्रिकेट ख़त्म है और बोर्ड बदहाल स्थिति में है।और ये हाल केवल क्रिकेट का ही नहीं बल्कि हॉकी और स्क्वाश  जैसे खेलों का भी है।यही हाल रहा तो नैसर्गिक प्रतिभा वाले क्रिकेट खिलाड़ियों के देश में क्रिकेट को ख़त्म होने में देर नहीं लगेगी। ये खेल की हार होगी और क्रिकेट की भी !

Sunday, 28 May 2017

प्रतिद्वंदिता के ताप की आंच

           


                             इन गर्मियों मई में ताप को जिस शिद्दत से महसूस कर रहे हैं,जून मेँ उससे कहीं अधिक ताप महसूस करेंगे, ये तय है। और ये ताप प्राकृतिक कारणों के साथ साथ मानवीय कारणों से भी उतना ही बढ़ेगा। दरअसल ये ताप आगामी 01 जून से 18 जून तक चलने वाली तीन बड़ी खेल प्रतियोगिताओं में वैयक्तिक,दलगत और राष्ट्रगत चिर प्रतिद्वंदियों के बीच आपसी टकराहट से निकला ताप होगा। इन टकराहटों से निकली चिंगारियों की आंच आपको वैसे ही उद्वेलित करेगी जैसे रौद्र सूरज का ताप।
                        क्रिकेट की अपनी जन्मभूमि इंग्लैंड में 8 राष्ट्र सीमित ओवरों के खेल में गेंद बल्ले से लैस विकटों के बीच दौड़ लगाकर और चौकों छक्कों की बरसात से खेल में अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे होंगे। भारत-पाकिस्तान,भारत-ऑस्ट्रेलिया,ऑस्ट्रेलिया-इंग्लैंड,इंग्लैंड-दक्षिण अफ्रीका के बीच पारम्परिक प्रतिद्वंदिता को श्रीलंका,न्यूज़ीलैंड और बांग्लादेश की टीमें हवा दे रही होंगी। उधर इंग्लैंड के पड़ोसी देश फ्रांस की खूबसूरत राजधानी रोलां गैरों मैदान की लाल बजरी पर खींचे नेट के आर पार खड़े होकर एक और जहाँ नडाल,जोकोविच और मरे जैसे परिपक्व खिलाड़ी आपस से श्रेष्ठता के लिए तलवार भांज रहे होंगे तो अलेक्ज़ेंडर ज्वेरेव और डोमिनिक थीएम जैसे नए युवा खिलाड़ी संघर्ष को और तीव्र कर रहे होंगे तो वीनस बहनों का कर्बर और अमांडा अनीसिमोवा के बीच टकराहट की चिंगारियों के ताप को सिद्दत से महसूस करेंगे। और फिर सात समंदर पार अमेरिका में ओरेकल एरीना और क्वीकेँ लोन्स एरीना में एनबीए फाइनल्स में गोल्डन स्टेट वारियर्स और क्लीवलैंड कैवेलियर्स की टीमें आपसी प्रतिद्वंदिता को और खेल को भी नयी ऊँचाइयाँ प्रदान कर रहे होंगे। एनबीए का ये लगातार तीसरा सीज़न है कि ये दोनों टीमें फाइनल्स में आमने सामने हैं। 2014-15 में जीएसडब्लू ने 4-2 से जीत हासिल की तो 2015-16 में कैवेलियर्स ने 1-3  से पिछड़ने के बाद 4-3 से जीत दर्ज़ की। 
                             तो दोस्तों यूरोप आपके हवाले और अमेरिका का मोर्चा मेरे हवाले। मेरी रूचि 'पोएट्री इन मोशन' स्टीफन करी और 'सुपर ज्वायंट' लेब्रोन जेम्स के बीच संघर्ष की आंच महसूसने में ज़्यादा है। वैसे बीच बीच में यूरोप में भी आवाजाही लगी रहेगी। विराट कोहली,राफेल नडाल और स्टीफेन करी सबसे पसंदीदा खिलाड़ी हैं और इनकी जीत इस भीषण ताप में मानसून की पहली बौछार का सा आनंद प्रदान करेगी। 










Friday, 19 May 2017

घरौंदा


घरौंदा 
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समय रुका हुआ
अठखेलियां कर रहा है 
धूप के शामियाने में 
छाँव चांदनी सी बिछी है 
ओस  है  कि दूब के श्रृंगार में मग्न  है  
गुलाब अधखिले से बहके है 
सूरज की किरणें पत्तों के बीच से 
झाँक रही हैं बच्चों की शैतानियों सी 
सरसराती सी हवा  है कि महका रही है फ़िज़ां 
मस्ती में झूम रही  है  डाल 
और पत्तों ने छेड़ी हुई है तान 
चिड़ियाँ कर रही  है  मंगल गान
तितलियाँ बिखेर रहीं  है रंग
कि शब्द 
तैर रहे हैं फुसफुसाते से 
कि कुछ सपने बस अभी अभी जन्मे है  
कभी बिलखते कभी खिलखिलाते 
किसी नवजात से 
हाथ पैर चला रहे हैं 
कि बस अभी दौड़ पड़ेंगे 

दरअसल यहां एक घरौंदा है 
और उसमें प्यार रहता है। 
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ये तेरा घर ये मेरा घर 
घर बहुत हसीं है. 






Wednesday, 17 May 2017

वो












वो 
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जिस पल देखा उसे 
एक कतरा मुझसे अलग हुआ  
कतरा बढ़ते बढ़ते 'वो' हुआ 
मैं घटते घटते 'कतरा' . 

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अपना ही अपना ना रहा 




Sunday, 14 May 2017

कम ऑन राफा !



                           

                           यूँ कहने को तो ये मैच साल भर चलने वाले एटीपी मास्टर्स टूर्नामेंट्स में से एक और साल के दूसरे ग्रैंड स्लैम फ्रेंच ओपन से ऐन पहले होने वाले मेड्रिड ओपन टेनिस प्रतियोगिता का रूटीन सेमीफाइनल मैच भर था।  उस लिहाज़ से कोई बड़ा मैच नहीं था। लेकिन किसी मैच को बड़ा कोई इवेंट नहीं बल्कि प्रतिद्वंदी खिलाड़ियों का कद और उनकी प्रतिद्वंदिता की इंटेंसिटी बनाती है। कल मेड्रिड ओपन का पहला सेमीफाइनल मैच हमारे समय के दो महान खिलाड़ियों नोवाक जोकोविच और राफेल नडाल के बीच था। दरअसल ये इन दोनों के बीच होने वाला 50वां मैच था जो टेनिस इतिहास में ओपन युग का किन्ही दो खिलाड़ियों की आपसी प्रतिद्वंदिता के मैचों का पहला पचासा था।आधुनिक टेनिस का इतिहास फेबुलस फोर-फेडरर/नडाल/जोकोविच/मरे-का इतिहास है और उनके बीच प्रतिद्वंदिता का इतिहास है।ये चारों मिलकर 48 ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीत चुके हैं। हमारे समय की टेनिस पर इन चारों के प्रभुत्व का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहली चार प्रतिद्वंद्विताएं आपस में इन चारों के नाम हैं यानी जोकोविच बनाम नडाल 50 मैच,जोकोविच बनाम फेडरर 45 मैच,फेडरर बनाम नडाल 37 मैच,जोकोविच बनाम मरे 36 मैच। तब जाकर पांचवें नम्बर पर इवान लैंडल बनाम मैकनरो (36 मैच) की प्रतिद्वंदिता आती है। 
                          इन चार 'फेबुलस फोर 'को पसंद करने के अपने अपने कारण हो सकते हैं। पहले आप इन चारों के रंग रूप,कद काठी,चहरे मोहरे,उनके अंदाज़,मैदान पर उनके व्यवहार को ध्यान से देखिए। जहां फेडरर,मरे और जोकोविच अभिजात्य से लगते हैं वहीं नडाल अकेले ऐसे हैं जो मध्यम वर्ग के प्रतीत होते हैं। अब चारों के खेलने की शैली को बूझिए। पहले तीनों को कृत्रिम तेज सतह रास आती हैं। ये तीनों तेज सर्व एंड वॉली के पॉवर गेम में अपने को कम्फर्टेबल महसूस करते हैं। वे खेल के दौरान पूरी प्रोसीडिंग पर नियंत्रण रखने में माहिर हैं। इन तीनों को ही धीमी सतह रास नहीं आती। तभी तो फेडरर 18 और जोकोविच अपने 13 ग्रैंड स्लैम में से धीमी मिट्टी की सतह वाले फ्रेंच ओपन को केवल बमुश्किल एक एक बार जीत पाए हैं। जबकि मरे को अभी इसे जीतना बाकी है। इसके विपरीत नडाल को धीमी सतह रास आती है। वे बेसलाइन से टॉप स्पिन से प्रतिद्वंदी को छकाते हैं। फील्ड में हद से ज़्यादा चपल दीखते हैं और ज़्यादा भागदौड़ भी। वे मिट्टी की सतह पर लगभग अपराजेय हैं। उन्होंने अपने 14 ग्रैंड स्लैम खिताबों में से 9 फ्रेंच ओपन की लाल बजरी वाली सतह पर जीते हैं। शायद अपनी पूरी आभा में मध्यम वर्ग के से प्रतीत होने के कारण ही वे ज़मीन के अधिक करीब प्रतीत होते हैं और शायद मिट्टी भी उनको ज़्यादा अपना समझती है और खुद पर उनको अपराजेय बना देती है। और अपनी इसी मध्यमवर्गीय आभा मंडल के कारण अधिक आकर्षित करते हैं और ज़्यादा अपने लगते हैं। 
                                    फिलहाल जोकोविच के विरुद्ध अपने इस ऐतिहासिक 50वे मैच में उन्होंने शानदार खेल दिखाया और सीधे सेटों में 6-2 ,6-4 से हरा कर 2014 में फ्रेंच ओपन के बाद से लगातार सात मैचों के हारने के क्रम को ही नही तोड़ा बल्कि इस साल मिट्टी की सतह पर अपने रिकार्ड को 14-0 कर इस सात मिट्टी की सतह पर तीसरे खिताब को जीतने की तरफ मज़बूती से कदम बढ़ा दिए हैं।  इस समय वे अपनी पुरानी लय में  लौट चुके हैं। जोकोविच के खिलाफ नडाल किस तरह हावी थे ये इस बात से जाना जा सकता है कि पहले सेट के चार गेम में जोकोविच केवल चार पॉइंट जीत सके।  
                 जिस तरह नडाल खेल रहे हैं और जिस तरह की फॉर्म में वे हैं यकीन मानिए 11 जून को रोलां गैरों के मैदान पर एक नया इतिहास लिखा जा रहा होगा। वे कोई एक ग्रैंड स्लैम को दो अंकों में जीतने वाले पहले खिलाड़ी बन रहे होंगे औरपूरी दुनिया उन्हें अपने असाध्य श्रम के बूते दोनों हाथों के बीच फंसी 'कूप दे मस्केटियर'ट्रॉफी को अपने होठों से चूमते देख रही होगी।  
                                                                   कम ऑन राफा !

माँ का दिन_मुख पुस्तिका का हासिल

माँ का दिन_मुख पुस्तिका का हासिल 
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1. स्केच_अपराजिता शर्मा / रंग_रोहित गुसिया 


 







































2 शब्द_हरिश्चंद्र पांडेय सर / चित्र_आशुतोष उपाध्याय 




























2. वसुंधरा पांडेय 

दुनिया को अंगूठा दिखाये थे

माँ की आँखों के ताल में
डुबकी लगाएं ,तैरना सीख जाये
घर ही नही ,माँ तो पूरा गाँव ठहरी

ढोलक की थाप थिरकेँ,मंगल गीत गायें
गाँव ही नही माँ तो पूरा देश ठहरी

इत-उत् जायें
गोद में लेट जायें ,रोधना पसारे
देश ही नही माँ ब्रम्हांड ठहरी... !


2 .विहाग वैभव 


हर जवान लड़के की याद में 
बचपन 
सर्दियों के मौसम में उठता

गर्म भाप सा नहीं होता
रेत की कार में बैठा हुआ लड़का
गुम गया मड़ई की हवेली में
हमारे प्रिय खेलों में
सबसे अजीब खेल था
माँ के सिंगारदान में
उलट-पलट , इधर-उधर
जिसमें रहती थी
कुछेक पत्ते टिकुलियाँ
सिन्दूर से सनी एक डिबिया
घिस चुकी दो-चार क्लिचें
सस्ता सा कोई पाउडर
एक आईना
और छोटी-बड़ी दो कंघी
हम माँ को हमेशा ही
खूबसूरत देखना चाहें
हम नाराज भी हुए माँ से
जैसे सजती थी
आस-पड़ोस की और औरतें
माँ नही सजी कभी उस तरह
माँ उम्र से बड़ी ही रही
हमने माँ को
थकते हुए देखा है
थककर बीमार पड़ते देखा है
पर माँ को हमने
कभी रोते हुए नहीं देखा
हमने माँ को कभी
जवान भी नहीं देखा
बूढ़ी तो बिल्कुल नहीं
मैंने सिंगारदान कहा
जाने आप क्या समझे
मगर अभी
लाइब्रेरी के कोने में
 एक लड़का सुबक उठ्ठा है
मेरी दवाइयों के डिब्बे में
सिमटकर रह गया
माँ का सिंगारदान ।


3. पंकज चतुर्वेदी 

माँ बच्चे के दोष
देखती भी है तो 
उसे अपनी ही

विफलता मानती है


अगर वह भी उसे
क़ुसूरवार ठहराती
तो दुनिया में मनुष्य की
कोई शरण न होती। 


4. अतुल शुक्ल ( भाई पुनीत मालवीय की दीवार से) 


मौजूं था कि माँ पर लिखी जाती एक कविता
मैनें इजाजत मांगी तो स्त्री ने मुंह पर उंगली रखकर चुप रहने का संकेत किया
उसका बच्चा सोने की कोशिश कर रहा था
मैं मुंह बांधे खटिया के पायताने खड़ा रहा
फिर एक वक्फे के बाद मैंने उसकी खिड़की में झांका
वो कटोरे में सानकर दाल-भात खिला रही थी
बच्चा चांद मांगने की जिद पर अड़ा था ,
उसने विनती की
और मैं उस रात चांद बनकर उनकी खिड़की पर टँगा रहा
आखिरी बार इजाजत मांगने की गरज से जब मैं उसके घर गया
उस दिन उसके पास सांस लेने की भी फुर्सत नही थी
उसका बेटा पहले दिन स्कूल जा रहा था और वो हवा के परों पर सवार थी
मेरे बगल से दोनों फुर्र से उड़ गये और बच रही एक सनसनाहट ...
फिर मैंने कविता के विचार को स्थगित किया
अब मेरी आत्मा लिपटी हुयी है एक अदृश्य गर्भनाल में
सीजेरियन का दर्द झेलकर मुस्कुराती हुई ममता ही मुझे छुड़ा सकेगी ....


5. मैं तुम्हें प्यार नहीं करता माँ_देवेंद्र आर्य (रीता नामदेव जी दीवार से) 

तुमने मुझे प्यार किया सिर्फ मुझे
या मेरे बेटे को
मेरी पत्नी को नहीं
उसे तुम घर आई पढ़ी-लिखी नौकरानी ही समझती रही
बिना मूछ का मर्द
जो मेरी अनुपस्थिति में
बाहर की ज़िम्मेदारी भी सम्हाल सकती है
मैं तुम्हें कैसे प्यार कर सकता हूँ माँ
कि तुम्हें उससे काम लेने का हक़ तो याद रहा
प्यार देने की ज़िम्मेदारी नहीं
तुम भूल गयी मां
कि वो भी तुम्हारी तरह एक मां है
मां ने मां को कभी प्यार नहीं किया
मैंने देखा है तुम बहन की रोटी में घी नहीं लगाती थी
और मुझे चपोड़ देती थी
सूखी ही सही
पहली रोटी उसे कभी नहीं मिली
तरस जाती थी बहन खेलने के लिए
मैं अगर कभी शौक में भी गोझिया गढ़वाने लगूँ
तो डांट पड़ती थी - चल हट मेहरकुल्ला
याद है माँ
जब बहन खटपट की खबर लिए घर आई थी
तुमने मुझे अकेले में कहा था
तुम्हारे पापा समझेंगे नहीं
जितनी जल्दी हो इसे वापस ससुराल पहुंचा दो
साम दाम दंड भेद
बहन का दर्द अभी आंसू बन बह भी नहीं पाया था
कि तुमने उसे वेद पुराण लोक-लाज
स्त्री-धर्म की चिता पर सुला दिया
सिर्फ पैदा करना मां होना नहीं होता माँ !
मैं तुम्हें कैसे प्यार कर सकता हूँ
मैंने तुम्हारी ममता को बेनकाब होते देखा है
कई कई स्तर कई कई रंग
झूठ है कि माँ वही जिसमें ममता हो
ममता-विहीन माएं भरी पड़ी हैं
हम उन्हें देखते भी हैं
पर सबके सामने कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते
सामने तो माँ-छाप मुनव्वर के शेर ही दुहराते हैं
अपनी माँ का बोझ पत्नी पर डाल कर सुर्खरू बन जाते हैं
कभी खुद करना पड़े तो नरक याद आ जाये
मैं उसे कैसे प्यार करूँ माँ
जो मुझे सिर्फ इसलिए प्यार करे कि मैं मर्द जात हूँ
उसे सूद लौटने वाला मूल
उसके बुढ़ापे की लाठी
उसे कंधे पर घाट पहुँचाने वाला
सच यह है कि बुढ़ापे की लाठी तो बेटी ही बनती है
या बहू
ममता और खुदगर्जी में भेद करने के लिए
पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी नहीं माँ
काश ! तुमने मेरे भीतर की स्त्री की हत्या न की होती
काश ! तुमने बहन के भीतर के पुरुष को
तिल तिल कर न मारा होता
काश ! तुमने आज़ादी का पगहा मुझे
और गुलामी का ज़ेवर उसे न दिया होता
मैं तुम्हें प्यार नहीं कर सकता माँ
तुमने दूध पिलाया
और दूध का क़र्ज़ मुझसे वसूला
बहू लाने के पहले
जब कभी लोगों को माँ के कसीदे पढ़ते सुनता हूँ
तो लगता है जैसे मैं साहित्य की दिल्ली में
बेगुसराय का निवासी हूँ
पुण्य आत्माओं के बीच पापी मैं
तुम्हें प्यार नहीं करता माँ ! 
6. माँ के लिए एक चप्पल_सुनील (अजय आनंद जी की दीवार से) 

माँ के लिए एक चप्पल लेनी है 
घर से पैरों की नाप लेना भूल गया हूँ 
अब बाज़ार में खड़े होकर 
माँ के पैरों को सोच रहा हूँ 
कल्पना में नहीं अट पा रहे है मेरी 
माँ के पैर। 


7. माँ_अनीता रघुवंशी 

माँ तू अंधेरो मे मुझे रोशनी सी लगती है
तुझसे मिलती हु जिन्दगी-२ सी लगती है
बनावट दिखावे चालाकी भरी दुनिया मे
आज भी तू मुझे ईमानदारी सी लगती है
बारिश हो तूफान हो जैसा भी हो मौसम
मुझे मेरी ओट लेती छतरी सी लगती है
कुछ भी मांगो तुझसे कभी ना नहीं होती
हर वक्त मुझे भरी तिजोरी सी लगती है
कितना भी भटको रिश्तो की दलदल मे
बस एक माँ तू ही तो अपनी सी लगती है
उम्रभर की यादे सिमेटे दरवाजे पर खड़ी
मुझे हर रोज इंतजार करती सी लगती है
चाहे जो भी तरक्की मिली हो इस शहर मे
पर तेरी गोद आज भी जन्नत सी लगती है




8.मोहन कुमार नागर 




शाम की काली चादर तनती जाए है
दिन के सिर !
चोंच में तिनके दाने दाबे लौट चली चिरैंये
सूखते पेड़ों के कोटर
जहां उनके चूजे चिकचिका रहे हैं !

मछलियाँ खोह में अपने अंडों की ओर
जानवर मांदों की ओर लपकते हुए
जहां उनके छौने भूखे अकेले !
शहर गया बेटा कब लौटेगा ?
शाम की काली चादर गहरा रही है
जीवन की शाम की ..
गांव गुठार छूटी बुढ़िया
आंख पर हाथ टिका
शहर की ओर चली एकतरफा
गांव की पगडंडियाँ ताकती है ..
उसकी बर्राहट में -
चिरैयों की चिकचिकाहट है
मछलियों की तड़प
दिन भर छूटे छौनों की अकुलाहट !
शाम की काली चादर तनती जाए है ...