Sunday, 29 January 2017

ऑस्ट्रेलियन ओपन 2017


                                        आज मेलबोर्न क्लब के रोड लेवर एरीना में रोज़र फेडरर और राफेल नडाल के बीच खेला गया मैच 'ऑस्ट्रेलियन ओपन 2017' का एक फाइनल मैच भर नहीं था बल्कि 1968 से शुरू ओपन इरा के दो महानतम खिलाडियों की पहली और दूसरी पायदान निर्धारित करने वाला मैच भी था।यहाँ फ़्लेक्सी कुशन की कृत्रिम नीली सतह पर एक अविस्मरणीय और शानदार यथार्थ घटित हो रहा था जिसे लाखों लोग दम साधे सजीव मैदान पर या अपने टीवी पर देख रहे थे।टेनिस इतिहास के दो सबसे बड़े खिलाड़ी आमने सामने थे।इसीलिये जितना बड़ा मैच था उतना ही शानदार खेला भी गया जिसमें टेनिस खेल अपनी सम्पूर्णता में उपस्थित था अपने हर शॉट के साथ,पूरी कलात्मकता के साथ,संघर्ष और रोमांच के साथ,अपनी परम्परा और खेल भावना के साथ। दोनों खिलाड़ी एक नया इतिहास रचने को तैयार थे। राफा जीतने पर चारों ग्रैंड स्लैम दो दो बार जीतने वाले अकेले खिलाड़ी बनते तो फेड अपने 17 खिताबों की संख्या 18 तक पहुंचा कर अपने रिकॉर्ड को और अधिक अप्राप्य दुष्कर बनाते। अंततः फेड सफल हुए। हांलाकि ये दोनों प्रतिद्वंदी यूरोप से थे लेकिन दोनों दो विपरीत ध्रुवों वाले खिलाड़ी हैं खेल शैली में भी और चरित्र में भी। जहां फेड अपने चेहरे मोहरे,अपने वस्त्र विन्यास और शांत सहज और कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और संयम की प्रतिमूर्ति से किसी कुलीन वर्ग के लगते वही राफा अपने चेहरे मोहरे,वस्त्र विन्यास और अपने चपल,चंचल,अधीर स्वभाव जिसमें हर शॉट पर ज़ोर से आवाज़ करना और हर हारे या जीते पॉइंट पर प्रतिक्रिया करते मुझे मध्य वर्ग के प्रतिनिधि से प्रतीत होते। फेड को तेज़ सतह रास आती तो राफा धीमी सतह के बेताज़ बादशाह थे। फेड सर्व और वोली के खिलाड़ी थे जो खेल को कोर्ट के मध्य भाग से या नेट से नियंत्रित करते तो राफा बेसलाइन के खिलाड़ी थे जो अपनी गति और चपलता से प्रतिद्वंदी को हराते।आज यदि पिछले आंकड़े और उम्र राफा के  साथ थी तो सेमीफाइनल मैच की राफा की थकान और तेज कृत्रिम सतह फेड के साथ। हार जीत इस बात पर निर्भर थी कौन किस के खेल पर नियंत्रण कर पाता है। जब जब राफा ने फेड को कोर्ट पर डीप में धकेला फेड साधारण प्रतीत हुए और तब राफा की टॉपस्पिन सरसराती तेज वोली का फेड के पास कोई जवाब नहीं था और जब जब फेड मध्य कोर्ट से खेलने में सक्षम हुए उनके तीखे कोणीय क्रॉसकोर्ट और डाउन द लाइन शॉट्स का रफा के पास कोई जवाब नहीं था। जो भी हो 35 वर्ष की उम्र में लगभग 5 साल बाद ग्रैंड स्लैम जीतना अपने आप में फेड की असाधारण उपलब्धि है। जरूर ही आज स्विट्ज़रलैंड के ध्वज का सफ़ेद रंग फेड की आँखों से छलके पानी की मिठास से कुछ और शुभ्र और लाल रंग कुछ और रक्तिम हुआ होगा और राफा के मन के अंदर दुःख के समंदर के पानी के नमक से,जो भले ही आँखों के रास्ते बहार ना आया हो,स्पेन के ध्वज का पीला लाल रंग फीका फीका सा हुआ होगा।  

Saturday, 28 January 2017

विलियम्स बहनें



                   
                    आज जब मेलबोर्न पार्क के रोड लेवर एरीना में विलियम्स बहनें फाइनल मैच खेलने उतरी तो वे दरअसल फाइनल मैच  नहीं खेल रही थीं क्योंकि वे अपने अपने फाइनल पहले ही दो संघर्षपूर्ण सेमीफाइनल मैचों में खेल चुकी थीं। आज तो वे दोनों बहनें नीले रंग की प्लेक्सीकुशन सतह पर टेनिस बॉल और रैकेट से काले अमेरिकियों के अपने दुःख दर्द और संघर्षों से उद्भूत जैज संगीत की एक नई धुन रच रही थीं जिसमें उनके अपने संघर्ष थे कोर्ट के अंदर के भी और बाहर के भी। जब भी कोई बहन कोर्ट में अकेली खेल रही होती तो वो केवल अपने प्रतिद्वंदी से ही संघर्ष नहीं कर रही होतीं थीं बल्कि बाहर बैठे हज़ारों दर्शकों से भी जूझ रही होती थीं। लेकिन आज नफासत,प्रेम,करुणा और उदासी भरे बिथोवीन और मोज़ार्ट  के संगीत के चाहने वाले दर्शकों के पास मानवीय संघर्षो जिजीविषा से उद्भूत जैज संगीत को सुनने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।इलीट खेल की मॉडल सरीखी खूबसूरत कमनीय महिला खिलाडियों के बरस्क वे अपने बलिष्ठ शरीर,काले रंग और संघर्षपूर्ण खेल के कारण आउटसाइडर सी प्रतीत होतीं। दरअसल मार्टिना नवरातिलोवा ने नफासत भरे खेल में जिस पावर प्ले का समावेश किया था विलियम्स बहनें उस परम्परा की सबसे बड़ी खिलाड़ी हैं। उन दोनों ने अपने शक्तिशाली खेल से दिखाया कि शक्ति पुरुष खिलाडियों का ही पर्याय नहीं है बल्कि वे भी पावर का ही दूसरा नाम हैं।अपनी दमदार सर्विस शक्तिशाली शॉट्स और गति के बल पर दोनों बहनों ने एक दशक से अधिक समय तक महिला टेनिस में अपना एकछत्र राज कायम रखा।36 साल की उम्र में वीनस ने थकान और जोड़ों के दर्द वाली ऑटो इम्यून बीमारी से जूझते हुए और 35साल की उम्र में सेरेना ने जिस तरह से खेल दिखाया है वो उनकी अदम्य इच्छा शक्ति और संघर्ष करने की क्षमता को दिखाती है। कम से कम सेरेना अभी भी कई मील के पत्थर पार करेंगीं। फिलहाल सेरेना को ओपन एरा में सबसे ज़्यादा 23 एकल ग्रैंड स्लैम खिताब और दोनों बहनों को 30वां एकल ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने की ढेर सारी बधाई तो बनती ही है। 

Tuesday, 24 January 2017

स्वप्न


स्वप्न 
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सुनो
तुम
देखना एक दिन

उधेड़ दूंगा तुम्हारे दुखों की सिवन को

और  बिखेर दूंगा उन्हें कर चिंदी चिंदी सा 

खुशियों को सजा दूंगा गहनों सा 

तुम्हारी आत्मा पर टांक दूंगा
अपने जज़्बातों को सितारों सा
भर दूंगा तुम्हे प्रेम से
कि तुम महका करोगी कस्तूरी सा 

कि बिछ जाएगा प्रेम हमारे दरम्यां

पर्वत पर बर्फ की चादर सा
या फ़ैल जाएगा वनों की हरियाली सा
कभी बहेगा नदी के नीर सा 
तो बरसेगा  सावन की घटाओं सा 
गर झरा तो 
झरेगा हरसिंगार के फूलों सा 
और दौड़ेगा धमनियों में लहू सा 

कि अपने अहसासात के हर्फ़ों से 

रच दूंगा एक प्रेम महाकाव्य 
जिसे पढ़ेंगे   
निर्जन वन प्रांतर में 
बिछा के धरती 
और ओढ़ के आसमाँ  
जोगन जोगी सा 

कि उतर आएंगे किसी किताब के सफे पर 

बन के  
किसी किस्से कहानी के 
हिस्से सा।  
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ये किस्से कहानी क्या सच में सच होते होंगे !














Sunday, 22 January 2017

इंतज़ार




इंतज़ार 
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कुछ सूखे सूखे से हैं पत्ते 
और झुकी झुकी सी डालियाँ

कुछ रूकी रुकी सी है हवा 

और बहके बहके से कदम 

कुछ मद्धम मद्धम सा है सूरज 

और सूना सूना सा दिन 

कुछ फीका फीका सा है चाँद 

और धुंधली धुंधली सी रात 

कुछ खाली खाली सी है शाम  

और खोया खोया सा दिल 

क्यों रोए रोए हैं सब 

क्या कहीं खोया है मेरा सनम  
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अक्सर ये इंतज़ार इतना मुश्किल क्यूँ होता है 

Friday, 20 January 2017

यादों में इक शहर_2

                       



              रामपुर में जिस स्कूल में दाखिला हुआ वो स्कूल था सरस्वती शिशु मंदिर।पर 70-71 के आसपास का समय रहा होगा पिता जी के स्थानांतरण के बाद परिवार एटा आ गया।यहाँ पहली कक्षा में दाखिला हुआ।एक मोंटेसरी स्कूल में। मोहल्ले में ही था। कक्षा 5 तक का। अंग्रेजी माध्यम वाला नहीं था हाँ अंग्रेजी पढ़ाई ज़रूर जाती थी।एक वकील साहब थे जिनका एक बड़ा सा पैतृक घर था। उसी घर के आधे हिस्से में चलता था वो मोंटेसरी। वकील साहब की पत्नी स्कूल की प्रिंसिपल हुआ करती थीं।आज़ादी मिले एक चौथाई सदी बीत चुकी थी। अगर याददाश्त सही है ये वो समय था जब विदेशी चीजों का क्रेज़ चरम पर था। मोंटेसरी स्कूल भी विदेशी ब्रांड था जिसका गज़ब का उन दिनों क्रेज़ हो चला था। जिस तरह आज अंग्रेज़ी माध्यम वाले स्कूल गली मोहल्लों में उग आये हैं वैसे ही उस समय मोंटेसरी स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह उगने शुरू हो गए थे।इन्हीं कुकुरमुत्तों में से एक में हम ने पढना शुरू किया। इन स्कूलों के बारे में और कुछ हो या ना हो एक बात गारंटी से कहता हूँ कि इटली की वो महान शिक्षाविद डॉ मारिया मोंटेसरी जिसने मोंटेसरी शिक्षा पद्धति और स्कूल ईज़ाद किए,गलती से भी यहाँ के किसी मोंटेसरी स्कूल में आ जाती तो निश्चित ही आत्महत्या कर लेती। कम से कम मेरे उस स्कूल में तो दो सौ फीसदी शर्तिया। मेरे स्कूल में तीन चार टीचर थीं। वे 10वीं पास थीं या नहीं आज भी विश्वास से नहीं कह सकता।हर कक्षा में 10से 15 बच्चे होते। टीचर बच्चों को कुछ काम थमा देतीं। बच्चे उसमें मशगूल हो जाते और टीचर जी अपने बैग से एक पतली सी किताब निकालती और उसे उसे पढने में लीन हो जातीं। आज जब सोचता हूँ तो अनुमान होता है किस तरह की किताब वे पढ़ती रही होंगीं। वे किताब को गज़ब की तल्लीनता से पढ़तीं कम से कम उस समय तो ऐसा ही लगता क्योंकि हम बच्चे कुछ भी करते वे बेखबर रहतीं। हाँ बीच बीच में यंत्रचालित सी एक वाक्य दोहरा देतीं 'बच्चों  शोर मत करो अपना काम करो'।बीच बीच में उनकी नज़रें बाहर की और भी देखती रहतीं। उन नज़रों में चौकन्नापन भी होता और इंतज़ार भी। चौकन्नापन प्रिंसिपल के अचानक आ जाने का और इंतज़ार अपने शोहदे नुमा पुरुष मित्रों के आने का।हांलाकि प्रिंसिपल कभी आती नहीं क्योंकि ये समय उनके घर के काम निपटाने का होता और पुरुष मित्र उन बेचैन नज़रों को कभी निराश नहीं करते। वे एक नियत समय के हेर फेर में  आ ही जाते जिन्हें देखते ही उस टीचर के चेहरे पे झिझक युक्त मुस्कराहट फ़ैल जाती जब जिसका मित्र आता। किताब वापस बैग में जाती और टीचर जी मित्र के साथ किसी कोने में दिखाई पड़तीं।  
                                       ये आगंतुक मित्र भी गज़ब के नमूने टाइप होते। इनमें से एक की बड़ी बड़ी ज़ुल्फें पीछे कन्धों तक लहरा रही होतीं और आगे आधे माथे और एक आँख को ढक रही होतीं। माथे के इन बालों को थोड़े थोड़े अंतराल पर बड़ी अदा से गर्दन झटक कर जुल्फें पीछे फेंकते और टीचर जी इस अदा पर निहाल हो हो जातीं। हालांकि उस मित्र की ये अदा हमें भी बहुत सुहाती। हमें भी उस तरह गर्दन झटक कर बाल पीछे फेंकने का बड़ा मन करता। पर हमारी समस्या थी कि हमारे अब्बा हुज़ूर सर पर आधे इंच से ज़्यादा बाल होते ही नाई की दूकान का रास्ता नपवा देते और हमारा बाल झटकने का अरमान नाई की केंची से कटकर उसकी झाड़ू से बुहरता हुआ नाली की शोभा बढ़ा रहा होता। लेकिन हम भी कहाँ मानने वाले। हम उन छोटे बालों को ही लंबे समझकर गर्दन में गाहे बगाहे झटका मार कर अपने अरमान पूरे करते रहते। एक दूसरे मित्र के बालों से तेल बहता सा प्रतीत होता। तीसरे सज्जन बाकी दो से उम्र में थोड़े बड़े प्रतीत होते क्योंकि उनके आगे के बाल थोड़े कम हो चले थे। बाकी लंबे बाल उन दिनों फैशन में थे ही। इन तीसरे वालों के बाल भी काफी लंबे होते और दोनों और कानों तक पहुँच कर ऊपर की और मुड़े होते। प्राय तीनों ही छींटदार शर्ट पहनते जिनके बड़े बड़े कॉलर होते। पेंट एकदम  टाईट सी पैरों पे चिपकी होती। उस समय तक सड़क पर घिसटने वाले बड़े बड़े पोहचों वाले बेलबॉटम का समय नहीं आया था। वे उस समय अपना अवतार लेने से छह  सात साल की दूरी पर थे। टीचर जी ऊंचे स्लिम फिट कुर्ते और स्लैक्स पहनती।पढ़ाई या संस्कारों की कोई ऐसी बात स्मृति पटल पर नहीं नहीं उभरती जिसका उल्लेख किया जा सके। भला हो माँ का जिसने भटकने नहीं दिया। इस दौरान जो कुछ सीखा माँ की बदौलत। वे रोज़ नियम से पढ़ाती। वे केवल हिंदी-अंग्रेजी की वर्णमाला ही नहीं सिखाती बल्कि संस्कारों की बारहखड़ी भी सिखाती। स्कूल के संचालक उस समय भी आज की तरह ही होते। प्रचार के महत्त्व को उन्होंने शिद्दत से समझा था। दिखावा खूब करते और इसका सबसे बड़ा टूल था स्कूल का वार्षिकोत्सव। ये वार्षिकोत्सव हर साल ज़ोर शोर से मनाया जाता। स्कूल के पेरेंट्स के आलावा मोहल्ले की वरिष्ठ लोगों को आमंत्रित किया जाता। ये सारा आयोजन पूरा फ़िल्मी होता। याद पड़ता है दो अलग अलग सालों में दो डांस आइटम में भाग मैंने भी लिया।वे गाने थे - दाग का 'अब चाहे बाबा रूठे या ....' और पूरब और पश्छिम का '. पुरवा सुहानी आई रे........ इस स्कूल में जीवन निर्माण के सबसे महत्वपूर्ण पांच साल जाया हुए। इसका यहां इन अध्यापिकाओं की जो स्मृतियाँ दिमाग में टंगी हैं उस से अंदाज़ा लगाया जा सकता है।प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में इतने सालों बाद भी कुछ ख़ास नहीं बदला है।इस तरह के माहौल के बाद भी अगर आप थोड़े बहुत इंसान बने तो निश्चित ही माँ बाप की मेहनत और ऊपर वाले इनायत ही समझा जाना चाहिए। हाँ मोंटेसरी स्कूल में पढ़ने का एक परिणाम ये ज़रूर हुआ कि आपने अंग्रेजी की वर्णमाला के साथ कुछ शब्द उनकी स्पेलिंग और उनके अर्थ रट लिए थे जिसकी बदौलत छठवीं कक्षा में आने पर बाकी छात्रों से अपने को कुछ अलग,उनसे श्रेष्ठ समझने की ग्रंथि प्रस्फुटित हो गयी। इसने टीचरों की नज़रो में तो चढ़ा दिया लेकिन सीधे सच्चे उन बच्चों से बहुत दूर कर दिया जो आपके सही मायने में दोस्त हो सकते थे,लंगोटिया यार बन सक़ते थे। कुल मिला कर अलग थलग रहा बिना किसी दोस्त के। 
                      मेरा पहला स्कूल सरस्वती शिशु  मंदिर था  रामपुर में। रामपुर एक मुस्लिम बहुल शहर है जहां मुस्लिम जनसँख्या हिन्दुओं से काफी ज़्यादा थी ,अब भी है। नगर में हिन्दू अल्पसंख्यक थे। तो क्या यहां इस स्कूल में दाखिला  माँ बाप के मन में एक अल्पसंख्यक होने के कारण उपजा भय था। क्योंकि एटा में उस स्कूल की सुविधा होने के बावज़ूद दाखिला घर के पास वाले मोंटेसरी स्कूल में करा दिया गया। कहाँ शुद्ध देशी हिंदु ब्रांड स्कूल और कहाँ विदेशी ब्रांड मोंटेसरी स्कूल। क्या यहां दूसरी तरह की सोच और चिंतन प्रक्रिया चल रही थी माँ बाप के मन में। क्या वहां उनके अंतस में अल्पसंख्यक होने के कारण उपजा भय और असुरक्षा  ही स्कूल चुनने का मुख्य कारण रहा होगा। लेकिन एक ऐसे शहर में जहाँ वे बहुसंख्यक हो गए थे अर्थ जैसी चिंताएँ  मुख्य आधार रही होंगी अपने बच्चों के स्कूल को चुनने की। निश्चित ही शिक्षा का स्तर तो उस समय मुख्य आधार नहीं ही रहा होगा। ऐसा मुझे लगता है। यहां समझ आता है कि किस तरह से अल्पसंख्यकों के मन में भय और असुरक्षा की भावना उनकी गतिविधियों के सञ्चालन का प्रमुख प्रेरक शक्ति होती है। उस भय के कारण वे अधिक संगठित होने का प्रयास करते हैं और संगठित होने के लिए विभिन्न धार्मिक गतिविधियां और कार्य कलाप करते हैं। इस क्रिया की एक प्रतिक्रया बहुसंख्यक समुदाय में होती है। फलस्वरूप भय और अविश्वास का वातावरण बनाता है और सामाजिक ताने बाने में एक तनाव का माहौल बन जाता जाता है। रामपुर में हिंदुओं की कई तरह की धार्मिक गतिविधियां चलती थी। मुझे याद है कि एक बार वहां पर बहुत बड़ा यज्ञ का आयोजन किया गया। उसमें माँ समय निकाल कर रोज़ जातीं। मैं भी अक्सर उनके साथ जाता। कई बार पिताजी भी जाते। वहां पर एक बहुत बड़ा अग्निकुंड था जिसमें हर समय अग्नि जलती रहती। उसकी लोग लगातार परिक्रमा करते रहते और हर परिक्रमा पर एक पैसा दान में देते । वहीं से नैतिक शिक्षा की  बहुत सारी पुस्तकें पिताजी ने हम भाई बहन को दिलाई थीं। लेकिन एटा में इस तरह के किसी बड़े धार्मिक आयोजन की मुझे याद नहीं पड़ती। सिवाय इसके कि माँ महीने में कभी कभार मकान मालकिन के साथ श्रीराम मंदिर चली जातीं।  (जारी )



Tuesday, 17 January 2017

यादों में इक शहर_1

                     
                           ये यादें भी कितनी दिलचस्प होती हैं और अजीब भी।कितने रंगों में,कितने रूपों में हमारे ज़ेहन में बिखरी होती हैं।कितना भी हटाने की कोशिश करो पर जस की तस बनी रहती हैं।किसी ऊँचे पर्वत सी हो जाती हैं जमा होते होते जिनसे गुज़रना उस पर्वत की चोटी को जीत लेना है। कुछ रुलाती हैं तो कुछ हँसाती हैं ।कुछ जुगनुओं सी चमकती बुझती रहती हैं तो कुछ स्ट्रीट लाइट सी स्थायी तौर पर जली रहती हैं।कुछ सर्द हवाओं सी चुभन देती हैं कुछ नरम मुलायम धूप सी मरहम लगाती हैं।  कुछ आपकी आत्मा पर जोंक सी चिपकी हुईं होती हैं जिनसे दर्द रिसता रहता है तो कुछ दिल पर तितली सी बैठी रहती हैं जो अपने रंगों से जीवन को उल्लास से भर देती हैं।
                      इन्ही यादों में दूर तक पसरा है एक छोटा सा शहर। एक ऐसा शहर जिसमें गांव की आबोहवा थी, उसकी सौंधी महक थी,गंवईपन था।वो शहर जिसमें गाँव का अल्हड़पन तो था ही पर शहर की थोड़ी सी नफासत भी मिली थी । वो शहर होने भर को शहर था।शहर होने के लिए ज़रूरी कुछ थोड़ी सी सुविधाओं से लैस शहर।शांत ठहरा सा। बस शहर होने के एहसास भर से संतुष्ट शहर। ऐसा शहर जिसमें आगे बढ़ने की जल्दबाज़ी ना थी। वो शहर जो कुछ कुछ मखमली सा था और कुछ कुछ खुरदुरा सा भी।वो शहर जिसमें बचपन बीता, तरुणाई बीती और यौवन की दहलीज़ तक आमद हुई।वो शहर जो हम में रचा बसा है और जिसमें हम रचे बसे हैं।वो शहर जिसकी गली कूँचों में हमारी यादें बिखरी पड़ी हैंऔर हमारी यादों में उसकी गली कूँचे। वो शहर जिसमें हम जिए। वो शहर जिसे हमने जिया। वो शहर जिसमें ख्वाबों को देखना सीखा, जिसमें ख्वाब देखे और उन ख्वाबो के लिए कुछ करने गुज़रने की सलाहियत पाई।वो शहर जिसमें क ख ग सीखा पढ़ाई का भी और ज़िन्दगी का भी। (जारी )
                  
                 

Sunday, 8 January 2017

महेंद्र सिंह धोनी

                       

                        अंततः महेंद्र सिंह धोनी ने क्रिकेट के संक्षिप्त संस्करण की कप्तानी छोड़ दी।हांलांकि वे खिलाड़ी के रूप में चयन के लिए उपलब्ध हैं और इंग्लैंड के विरुद्ध एक दिवसीय मैचों की श्रृंखला के लिए चुन भी लिए गए हैं। इसी के साथ भारतीय क्रिकेट इतिहास के एक युग की समाप्ति हो गयी। निःसंदेह वे एक शानदार खिलाड़ी हैं और एक महान कप्तान भी जिनके नेतृत्व ने भारत को असाधारण उपलब्धियां दिलायी। उनकी कप्तानी में भारत ने 2007 में पहला टी ट्वेंटी विश्व कप(इंग्लैंड),2011 में विश्व कप(भारत),2013 में चैंपियन ट्रॉफी(दक्षिण अफ्रिका)जीती और 2009 में टेस्ट क्रिकेट में भारत को नंबर एक बनाया।वे भारत के सबसे सफल कप्तान हैं।उन्होंने 50 टेस्ट मैचों में कप्तानी की जिसमे से 27 में जीत 17 में और 15 अनिर्णीत रहे,199 एक दिवसीय में से 110 में जीते और 74 हारे जबकि 72 टी ट्वेंटी मैचों में से 42 जीते और 28 हारे।उन्होंने कप्तान के रूप में एक दिवसीय मैचों में 54 की औसत और 86 की स्ट्राइक रेट से 6633 रन,टी ट्वेंटी में 122 की स्ट्राइक रेट से 1112 रन और टेस्ट क्रिकेट में 41 की औसत से 3454 रन बनाए हैं। ये आंकड़े उनकी सफलता की कहानी कहते हैं और ये बताने के किये पर्याप्त हैं कि वे एक बड़े खिलाड़ी और महान कप्तान भी हैं।उनकी शान में कसीदें पढ़ा जाना स्वाभाविक है,इसलिए पढ़े भी जा रहे हैं क्योंकि ऐसा किए जाने का मौक़ा भी है और दस्तूर भी। ऐसे में उनकी शान के खिलाफ कुछ भी लिखना कहना जोखिम का काम है। लेकिन उसके बाद भी मैं कहता हूँ कि धोनी मेरे पसंददीदा खिलाड़ी नहीं रहे और ना ही मेरे लिए वे गावस्कर,कपिल या सचिन जैसे खेल आइकॉन रहे हैं। आखिर आप इतने बड़े खिलाड़ी के मुरीद क्यों नहीं हो पाए। क्यों उस खिलाड़ी के फैन नहीं हो पाए ?
                       दरअसल आप किसी खिलाड़ी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व से प्रभावित होते हैं। आप जब उसका अनुसरण करते हो तो केवल खेल के मैदान में ही नहीं उसके बाहर भी उसे देखते हो और खेल के मैदान में भी सिर्फ उसका खेल भर नहीं देखते हो बल्कि खेल से इतर उसकी गतिविधियों को भी उतनी सूक्ष्मता से देखते हो। 2004 में जब धोनी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट में पदार्पण करते हैं तो कंधे तक फैले लंबे बालों की तरह स्वाभाविकता उनके व्यक्तित्व पर पसरी हुई दिखती थी। उस समय वे एक मध्यम दर्ज़े के शहर और निम्न मध्यम वर्ग के परिवार के एक बहुत ही प्रतिभा वाले सच्चे,सरल,स्वाभाविक और उत्साही खिलाड़ी होते हैं।धीरे धीरे उनका रूपांतरण होता है। वे एक नवोदित खिलाड़ी से बड़े खिलाड़ी बन जाते हैं। फिर 2007 में टीम की कमान उनके हाथ में आती है। क्रिकेट प्रबंधन से उनके बहुत मज़बूत सम्बन्ध बनते हैं।अब वे बहुत शक्तिशाली हो जाते हैं। वे सत्ता के केंद्र में होते हैं और खेल के सर्वेसर्वा बन जाते हैं।यहां केवल एक नवोदित खिलाड़ी का खेल के सबसे बड़े खिलाड़ी बनने का सफर ही पूरा नहीं होता बल्कि पूरे व्यक्तित्व का रूपांतरण भी साथ साथ होता चलता है।वे जैसे जैसे कद में बड़े होते जाते हैं वैसे वैसे उनके बाल छोटे होते चले जाते हैं और उसी अनुपात में उनकी सरलता ,स्वाभाविकता ,अल्हड़पन और सच्चाई भी कम होती चली जाती है। वे अब सरल नहीं रहते जटिल हो जाते हैं,स्वाभाविक नहीं रहते कृत्रिमता उन पर हावी हो जाती है,वे हसंमुख और अल्हड़पन की जगह गंभीरता का आवरण ओढ़ लेते हैं,स्वाभाविक अभिमान अहंकार में बदल जाता है और एक साधारण आदमी अचानक से आभिजात्य वर्ग का प्रतिनिधि लगने लगता है।अभिजात्य उनके पूरे व्यक्तित्व पर पसर जाता है। उनके हाव भाव, चाल ढाल हर किसी पर।

                          अपनी सफलताओं और प्रबंधन के साथ संबंधों के बल पर सर्वेसर्वा बन जाते हैं।आदमी जैसे जैसे सत्ता और ताक़त पाता जाता है वैसे वैसे वो मन में अधिक और अधिक सशंकित होता जाता है और सबसे पहले उन लोगों को ख़त्म करने का प्रयास करता है जो उसके लिए यानी उसकी सत्ता के लिए ख़तरा हो सकते हैं। धोनी एक एक करके सारे सीनियर खिलाड़ियों को बाहर का रास्ता दिखाते हैं चाहे वो गांगुली हो,लक्ष्मण हो, द्रविड़ हो, गंभीर हो, हरभजन हो, सहवाग हो या फिर सचिन ही क्यों ना हो। इनमें से ज़्यादातर खिलाड़ी अपने खेल के कारण नहीं बल्कि धोनी की नापसंदगी के कारण ही हटे। वे इतने शक्तिशाली थे कि टीम में वो ही खेल सकता था जिसे वे चाहते। तभी तो रविन्द्र जडेजा जैसे औसत प्रतिभा वाले खिलाड़ी टीम में लगातार बने रहे और अमित मिश्र जैसे कई खिलाड़ी टीम में अंदर बाहर होते रहे। जब मोहिंदर जैसे बड़े कद के चयनकर्ता उनके विरुद्ध हुए तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। अक्सर ये कहा जाता है कि टीम की एकता के लिए सीनियर खिलाडियों को बाहर किया जाना समय का तकाज़ा था। वे टीम में राजनीति कर रहे थे और फूट डाल रहे थे।इस तर्क़ के आधार पर आज उनकी टीम में जगह नहीं बनती है। क्या गारंटी है वे अब टीम में वही सब नहीं करेंगे।वे या तो उस समय गलत थे या अब।यहां पर पाकिस्तान के इमरान याद आते हैं। जिस समय उनके हाथ में पाकिस्तानी टीम की कमान थी वे एकदम तानाशाह की तरह व्यवहार करते थे। यहां तक कि लोकल स्तर पर खेलते खिलाड़ी को देखते और राष्ट्रीय टीम में शामिल कर लेते। अपनी प्रतिभा के बल पर उन्होंने अपनी कप्तानी में पकिस्तान को विश्व कप जिताया और  टीम को नई ऊंचाईयां भी प्रदान की लेकिन उन्होंने पाकिस्तानी क्रिकेट के ढांचे को ही नष्ट कर दिया कि उनके जाते ही पाकिस्तानी क्रिकेट अपने रसातल में चली गयी और आज तक नहीं उबर सकी। आप ध्यान से देखेंगे तो धोनी भी अक्सर इमरान की तरह व्यवहार करते प्रतीत होते हैं। बस गनीमत ये रही कि भारतीय क्रिकेट का ढांचा इतना मज़बूत है कि नुक्सान ना के बराबर या बिलकुल नहीं हुआ।  
                   उनका ये व्यवहार केवल टीम के स्तर पर ही नहीं दीखता है बल्कि मैदान में भी दिखाई देता है। वे मैदान में अब एक तरह की कृत्रिम गंभीरता ओढ़े नज़र आने लगे। जैसे जैसे वे सफल होते गए  उनकी 'कैप्टन कूल' की छवि मज़बूत हो गई। ये सही है कि आज खेल भी बहुत कॉम्प्लिकेटेड हैं और प्रतिद्वंदिता बहुत ज़्यादा हो गयी है और ऐसे में किसी भी खिलाड़ी और विशेष रूप से कप्तान का 'कूल' होना बनता है। लेकिन कूल होने का मतलब इतना ही है कि विषम परिस्थितियों में भी खिलाड़ी धैर्य और संयम बनाये रखे और कठिन समय में शांत दिमाग से परिस्थितियों के अनुसार ले सके। इसका ये मतलब ये कतई नहीं हो सकता कि आप जीत में उत्तेजित और उल्लसित ना हों और हार में दुखी। खेल तो नाम ही जोश और जूनून का है। आप भावनाओं को काबू में रख ही नहीं सकते।आप मशीन नहीं हो ना। आप भाव रहित यंत्रवत कैसे हो सकतेहो। धोनी अक्सर जीत हार के बाद निष्पृह से दिखाई देते हैं मानो जीत हार का कोई असर उन पर हुआ ही ना हो। क्या वे खेल नहीं रहे थे ?क्या वे पैसा कमाने के लिए काम भर कर रहे थे ?
                               उनकी बैटिंग का अंदाज़ बड़ा अनाकर्षक था। उनका रक्षात्मक शॉट देखिये। वे सीना आगे निकाल कर पैरों पर झुकते हुए बड़े ही अजीबोगरीब ढंग से गेंद को धकेलते थे। ऐसे ही हेलीकॉप्टर शॉट कहीं से भी आकर्षक नहीं लगता। एक बात और जब कोई बॉलर विकेट लेता है तो वो बैट्समैन की और एक खास भाव से देखता है  या कुछ हाव भाव प्रकट करता है। ठीक उसी तरह से जब बल्लेबाज़ चौका या छक्के लगाता है तो या तो बॉलर की और देखता है या हाव भाव प्रकट करता है जो बैट्समैन या बॉलर  को चिढ़ाए और उसमें  खीज़ पैदा करे। दरअसल ये हाव भाव केवल अपनी योग्यता दिखाने के निमित्त मात्र ही नहीं होते  बल्कि प्रकारान्तर से अपने विपक्षी की काबिलियत की स्वीकृति भी होती है। लेकिन धोनी चौके छक्के लगाकर भी भावहीन बने रहते हैं,कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हैं,जैसे ये कोई बड़ी बात नहीं है।प्रकारान्तर से वे बॉलर की काबिलियत को नकारते हैं।ऐसा करके वे एक खास किस्म का अहंकार प्रदर्शित करते हैं।जैसे जैसे उनका कद बड़ा होता गया वैसे वैसे उनमें सरकाज़्म(sarcasm) की मात्रा बढ़ती गई। आप उनकी प्रेस वार्ताए देखिए। उनके जवाबों में हमेशा एक खास किस्म का व्यंग्य लक्षित करेंगे। ये अपने को श्रेष्ठ मानने के अहंकार से उपजा था जिसमे वे मीडिया को कुछ भी बताना ज़रूरी नहीं समझते थे।                                                                                                                          
                                  फिर  उनकी ये घोषणा उतनी अप्रत्याशित नहीं है जितनी कही जा रही है। अप्रत्याशित तब होती है जब कोई अपने चरमोत्कर्ष पर से जस्ट ढलान पर होता है। धोनी से तो विश्व कप में हार के बाद  ही कप्तानी छोड़ने की उम्मीद की जा रही थी। ये बात तय है कि कप्तान के रूप में उनकी काबिलियत में विश्वसनीयता लगातार कम होती गयी है। ऑस्ट्रेलिया में खेले गए विश्वकप की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के साथ खेली गई त्रिकोणीय श्रृंखला में भारत ने एक भी मैच नहीं जीता।विश्वकप के सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के हाथों बुरी तरह हारे। इसके बाद वे बांग्लादेश इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया से सीरीज हारे। दोस्सरी और एक मैच फिनिशर के रूप में भी वे लगातार असफल रहे हैं।अमेरिका में खेले गए वेस्टइंडीज के विरुद्ध टी ट्वेंटी मैच में ड्वेन ब्रावो ने उन्हें आखरी ओवर में मैच नहीं जीतने दिया। ज़िम्बाब्वे दौरे में भी दोयम दर्ज़े की टीम के विरुद्ध भी आखरी ओवर में ज़रूरी 8 रन नहीं बना सके। इसी तरह कानपूर में दक्षिण अफ्रिका के खिलाफ एक दिवसीय मैच में जीत के लिए ज़रूरी 11 रन नहीं बना सके। 
                                           और अंत में एक बात और। वे आई पी एल में एक ऐसी टीम से जुड़े थे जिसके मालिक सट्टेबाज़ी से जुड़े थे। ये सभी जानते कि किस तरह से मामले को थोड़े बहुत कार्यवाही करके रफा दफा किया गया। एक टीम के मालिक इतने गहरे से सट्टेबाज़ी में संलिप्त हो और टीम के कप्तान को कोई जानकारी ना हो ऐसा संभव नहीं लगता वो भी जब उसके मालिक के साथ उनके आर्थिक हितों में साझेदारी हो। कुछ छींटे धोनी पर भी पड़े थे। हांलांकि सीधे तौर पर उनकी भागीदारी का कोई सबूत नहीं मिला। लेकिन उस टीम के कप्तान के तौर पर भी और एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर उनकी नैतिक ज़िम्मेदारी तो बनती ही है और इस मामले में उन्होंने अपनी ज़िमेदारी नहीं निभायी। आप जान सकते हैं कि इस तरह के आरोप किस तरह से आपकी छवि धूमिल करते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अज़हरुद्दीन हैं। वे धोनी से बड़े खिलाड़ी थे और निसंदेह उन्ही की तरह सफल कप्तान भी। यही सब कारण हैं कि धोनी के कप्तानी छोड़ने की घोषणा करने के कई दिन बाद भी कुछ खालीपन सा नहीं लगा और अगर वे खेल से संन्यास लेने की भी घोषणा करते तो भी शायद ऐसी ही प्रतिक्रिया होती। 

              

Saturday, 7 January 2017

उरूज पर जो हैं ना




उरूज पर जो हैं ना
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एक शोख़ शरारत करने का दिल करता  है 
ये जो तुम्हारे खूबसूरत से पाँव हैं ना 
चुपके से छूकर 
दिल की धड़कनें बढ़ाने का  दिल करता है 

एक शोख़ शरारत करने का दिल करता  है 
ये जो तुम्हारे नरम मुलायम से हाथ हैं ना 
चुपके से छूकर 
दिल के जज़्बात बेकाबू करने का दिल करता है 

एक शोख़ शरारत करने का दिल करता  है 

ये जो तुम्हारी झील सी ऑंखें हैं ना 
चुपके से छूकर 
खुद को तुम में समा देने का दिल करता है 

एक शोख़ शरारत करने का दिल करता  है 

ये जो तुम्हारे गुलाबी से होंठ  हैं ना 
चुपके से छूकर 
तुममें घुल जाने का दिल करता है 

ये जो मेरा ख्वाहिशों से भरा दिल है ना 

और दिल में जो शोख शरारतें हैं ना
आखिर उरूज पर  हैं ना
इसलिए कुछ करने का दिल करता है 
कुछ होने का दिल करता है। 

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ये दिल आखिर ख्वाहिशों से भरा क्यूँ होता है।